
पूरी दुनिया इतिहास के किसी भी मोड़ पर आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संदर्भों में एकाकार नहीं रही है, पर अब यह स्थिति सामने आ गई है। पूरी दुनिया में कट्टर दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी ताकतें सत्ता में विराजमान हो रही हैं या फिर जल्दी ही होने वाली हैं, सामाजिक ध्रुवीकरण हरेक देश में चरम पर है, गरीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ती जा रही है और पर्यावरण विनाश हरेक देश में किया जा रहा है।
दुनिया के हरेक देश में बिल्कुल एक जैसी स्थिति पहले कभी नहीं रही है। लोकलुभानवादी और निरंकुश तानाशाही का विस्तार हरेक जगह है और हरेक देश की जनता ऐसी शक्तियों का समर्थन कर रही है। वैश्विक राजनीति में परंपरागत तौर पर हाशिये पर रहने वाले देश अब राजनैतिक मुख्यधारा में हैं। इन सभी समस्याओं की जड़ में वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती हरेक प्रकार की असमानता है – यह अब इतना विकराल स्वरूप ले चुकी है कि अब इसे वैश्विक आपातस्थिति कहा जाने लगा है।
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अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण ने गरीबों का खूब शोषण किया है और डॉलर के संदर्भ में करोड़पतियों और अरबपतियों का मुनाफा बढ़ता जा रहा है। यह पूरे विश्व में हो रहा है– अमीर हो या गरीब, सभी देशों की अर्थव्यवस्था का बुनियादी ढांचा बिल्कुल एक जैसा हो गया है और आर्थिक असमानता हरेक देश में बढ़ रही है। एक नए अध्ययन से यह स्पष्ट है कि असमानता और लोकलुभावनवादी राजनैतिक विचारधारा में गहरा संबंध है। जनता में आर्थिक असमानता की अनुभूति ऐसी राजनैतिक विचारधारा का समर्थन करती है।
जर्मनी के हुमबोलडट यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्रियों के नेतृत्व में इस अध्ययन को यूरोपियन जर्नल ऑफ पोलिटिकल रिसर्च में प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार कुछ वर्ष पहले से यह संभावना जताई जा रही थी कि आर्थिक और सामाजिक असमानता जीवंत प्रजातन्त्र को प्रभावित करती है, पर इसके कारणों पर चर्चा नहीं की जाती थी। इस अध्ययन के अनुसार, केवल आर्थिक असमानता से ही लोकलुभावनवादी विचारधारा सत्ता तक नहीं पहुंचती, बल्कि इसका मुख्य कारण असमानता के बारे में जनता की सोच, विश्लेषण और अनुभूति है। जब जनता को स्पष्ट तौर पर आर्थिक असमानता के बारे में बताया जाता है, तब जनता को समझ आता है कि संपदा केवल कुछ अमीरों के हाथ में है और अमीरों की संपदा सामान्य आबादी के संपदा की लूट है।
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असमानता की समझ और अनुभूति जनता को लोकलुभानवादी विचारधारा के करीब ले जाती है। इस अध्ययन में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि अर्थव्यवस्था के संगठन से अधिक इसकी अनुभूति राजनैतिक विचारधारा का कारण है। असमानता के बारे में चर्चाओं के बाद जनता को समझ आता है कि समाज में बराबरी नहीं है और सत्ता में बैठ लोग केवल अमीरों के हितों के लिए काम कर रहे हैं। जनता के इसी विचारधारा को लोकलुभावनवादी राजनीतिक दल भुनाते हैं और फिर सत्ता तक पहुंच जाते हैं। इस मामले में दक्षिणपंथी विचारधारा वाले राजनैतिक दल पूरी दुनिया में सबसे आगे हैं।
इस अध्ययन के लिए दो सर्वेक्षण किए गए। पहला सर्वेक्षण यूरोप के 20 देशों के 40,000 प्रतिभागियों के साथ किया गया। इस सर्वेक्षण के अनुसार, जिन प्रतिभागियों को आर्थिक असमानता की पूरी जानकारी थी, उनकी लोकलुभावनवादी विचारधारा में आस्था दूसरे प्रतिभागियों की तुलना में 2.7 प्रतिशत अधिक थी। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि भले ही यह अंतर मामूली नजर आता हो पर वास्तविक मतदान में जब मतदाताओं की संख्या अधिक रहती है तब यह परिणाम प्रभावी होता है। यह अंतर तब और प्रभावी हो जाता है जब राजनैतिक दल इसे प्रमुख मुद्दा बना लेते हैं, अधिकतर दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी राजनैतिक दल इसी स्थिति को भुनाते हैं।
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दूसरे सर्वेक्षण में जर्मनी, डेनमार्क और इटली के 3000 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इसमें दो वर्ग बनाए गए– एक में शामिल प्रतिभागियों को असमानता के बारे में कुछ नहीं बताया गया जबकि दूसरे वर्ग में शामिल प्रतिभागियों को उनके संबंधित देश में आर्थिक असमानता के विस्तार की वास्तविक जानकारी दी गई। वास्तविक जानकारी वाले वर्ग में लोकलुभानवादी विचारधारा के लिए समर्थन पहले वर्ग से अधिक रहा, पर ऐसे राजनैतिक दलों को वोट देने के मामले में प्रतिभागी बहुत निश्चित नहीं थे। इस अध्ययन में बताया गया है कि असमानता की अनुभूति विचारधारा तो बदल देती है पर लोग अपने परंपरागत राजनैतिक दल को छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल का समर्थन करने में कुछ समय लेते हैं। इस समय को कम करना और समर्थन को वोट में बदलने का काम राजनैतिक दलों की नीतियां, चुनावी रणनीति और कुछ दूसरे कारक करते हैं।
जी20 समूह के एक स्वतंत्र पैनल ने आर्थिक असमानता की वैश्विक स्थिति पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस पैनल के अध्यक्ष नोबेल प्राइज़ से सम्मानित अमेरिका के अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज़ थे और भारत की अर्थशास्त्री जयति घोष भी इसकी सदस्य थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक असमानता पूरे विश्व में लगातार गहरी हो रही है। वैश्विक स्तर पर सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी के पास वर्ष 2000 से 2024 के बीच वैश्विक संपदा में वृद्धि का 41 प्रतिशत से भी अधिक है, जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी के हिस्से महज 1 प्रतिशत संसाधन हैं।
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इतनी गहरी असमानता में किसी भी समाज का विकास असंभव है। संख्या की दृष्टि में बहुतायत में गरीब हैं पर राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। दूसरी तरफ दुनिया की सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी देश की अंदरूनी और बहुराष्ट्रीय दशा और दिशा का निर्णय लेती है। दुनिया की बड़ी आबादी का राजनैतिक और आर्थिक संदर्भ में हाशिये पर धकेले जाने के कारण प्रजातंत्र खतरे में है, यह पूरी तरीके से समाप्त होने के कगार पर है।
हमारे देश में जनता पूरी तरह उपेक्षित है, उसे बस जिंदा रखा जा रहा है। हमारे देश में आर्थिक असमानता जितनी है उतनी दुनिया में कहीं भी नहीं है। वैश्विक स्तर पर सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के पास 41 प्रतिशत संपदा है पर हमारे देश में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हैं। गरीब इसे सुनकर जोर से तालियां बजाते हैं पर उन्हें शायद मालूम नहीं है कि अर्थव्यवस्था के बढ़ते आकार के साथ ही अरबपतियों का मुनाफा और बढ़ता है। गरीब पहले से अधिक गरीब होते जाते हैं। गरीबी के साथ ही एक बड़ी आबादी समाज और अर्थव्यवस्था के ढांचे से बाहर पहुंच जाती है। गरीब आबादी के हिस्से का संसाधन अमीरों की जेब में पहुंचता है और गरीबों की कीमत बस 5 किलो अनाज रह जाती है।
इस अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि आने वाले लंबे समय तक दुनिया में लोकलुभावनवादी राजनैतिक दलों का वर्चस्व बना रहेगा क्योंकि आर्थिक असमानता की बुनियाद इतनी मजबूत हो चुकी है कि इसमें कमी के कोई आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते। जीवंत प्रजातंत्र अब इतिहास हो चुका है।
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