विचार

विरोध, गरिमा और चुप्पी, विश्वविद्यालयों में संवाद की टूटती परंपरा

विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है। किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है। जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर 

छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने जो अभद्र बर्ताव किया, उसकी उचित ही निंदा हो रही है। कुलपति चक्रवाल साहब अपने विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी द्वारा हिन्दी कहानी पर आयोजित एक संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस प्रसंग का जो वीडियो प्रसारित हुआ है, उसमें वह कुछ हल्की-फुल्की बातें करते सुनाई दे रहे हैं।

उनकी निगाह सामने बैठे श्रोताओं की तरफ जाती है और किसी को कहते सुनाई देते हैं कि आप असहज मालूम दे रहे हैं। सामने से आता जवाब शायद यह था कि आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं या विषय पर बोलिए। फिर कुलपति कहते हैं कि अगर आप असहज हैं, तो बाहर जा सकते हैं। आपको कुलपति से बात करने का तरीका नहीं मालूम है, आदि, आदि।

फिर मनोज रूपड़ा खड़े होते हैं और कमरे से निकल जाते हैं। बाद में कुलपति अपने अधिकारियों से पूछते हैं कि इनको किसने बुलाया। अपने आचरण को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि वह काफी देर से देख रहे थे कि ये सज्जन सहज नहीं थे। जो सहज नहीं है, उसे कमरे में नहीं रहना चाहिए।

चतुर्दिक निंदा के बाद भी कुलपति को अपने आचरण में कोई गलती नहीं दिखलाई पड़ रही है। मुनासिब होता कि वह पूरे प्रकरण पर खेद प्रकट करते और रूपड़ा जी से माफी मांग लेते। लेकिन वह अपने आचरण को उचित ठहराने पर तुले हैं। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि उनसे कुछ और गलतियां हुई हैं। जब उन्होंने इस संगोष्ठी में आना स्वीकार किया, उसी समय उन्हें अपने दफ्तर से गोष्ठी के संबंध में सूचना ले लेनी चाहिए थी। गोष्ठी किस विषय पर है, उसमें कौन-कौन भाग लेंगे, इन सबके बारे में संबंधित विभाग से जानकारी लेकर उन्हें कमरे में आना चाहिए था।

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उनका यह पूछना कि इनको किसने बुलाया, हद दर्जे की अभद्रता थी। बुलाया उनके संस्थान ने था, और जब तक अतिथि कोई अभद्र आचरण न करे, उसके सम्मान की रक्षा का दायित्व संस्थान का और उसके प्रमुख के नाते उनका था।

कुलपति को अलग-अलग विषय के कार्यक्रमों में संस्थान का प्रमुख होने के नाते जाना पड़ता है। हर विषय की जानकारी होना किसी के लिए संभव नहीं। ऐसी स्थिति में आम तौर पर कुलपति को बात करने के लिए कुछ बिन्दु विभाग की तरफ से दिए जाते हैं। उनकी भूमिका प्रायः औपचारिक रूप से संस्थान का प्रतिनिधित्व करने की होती है। चक्रवाल साहब का क्षेत्र वाणिज्य का है। साहित्य के बारे में उनकी जानकारी सीमित ही होगी। उन्हें अपने पद की गरिमा की रक्षा के लिए विषय के अनुरूप तैयारी करके जाना चाहिए था।

लेकिन कई दूसरे लोगों की तरह उन्होंने सोचा होगा कि चूंकि कहानी हर कोई पढ़ सकता है, तो उस पर हर कोई बोल भी सकता है। वह जिस तरह की बात कर रहे थे, उससे संगोष्ठी की गंभीरता नष्ट हो रही थी। विश्वविद्यालय ऐसी जगह है, जहां हम सड़क पर चलताऊ तरीके से की जा रही बातचीत से अलग एक सुव्यवस्थित विचार-विमर्श करते हैं। कुलपति क्या इस अपेक्षा के अनुसार बोल रहे थे?

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अफसोस! आज के कुलपतियों को खुद अपनी गरिमा का ध्यान नहीं है। चक्रवाल साहब यह नहीं सोच पाए कि भले बाकी लोग उठकर न गए हों, लेकिन उनके वक्तव्य के बारे में उनकी राय मनोज रूपड़ा से अलग न होगी।

यह लेकिन सिर्फ चक्रवाल साहब ही कर रहे हों, ऐसा नहीं। अधिकतर संस्थान प्रमुख अब अपने पद की गरिमा का ध्यान न रखकर मंच से चुटकुलेबाजी करते देखे जाते हैं। प्रायः श्रोता सिर झुकाए इस मूर्खता को झेलते रहते हैं। ‘समझदार’ लोग किसी तरह कुलपति-क्षण के टल जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दी गई अपनी सफाई में कुलपति महोदय ने कहा कि वह बोलते वक्त देर से देख रहे थे कि मनोज रूपड़ा का ध्यान कहीं और है और वह लगातार मोबाइल देख रहे थे। मैं उनसे अदब से पूछा कि क्या वह बोर हो रहे हैं। इस पर उन्होंने मुझसे विषय पर बोलने को कहा। यह मंच का अपमान था, इसलिए मैंने उनसे कमरे से जाने को कहा। अखबार को उन्होंने कहा कि इसके बाद मुझे फोन पर गालियां दी जा रही हैं और मेरे खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। क्या यही हमारी संस्कृति है?

कुलपति को अब संस्कृति की याद आ रही है! लेकिन कुलपति कुछ हद तक सही भी हैं। सोशल मीडिया पर कई लेखक जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, उस पर उन्हें विचार करने की जरूरत होगी। कितनी आसानी से उन्हें कुलकलंक कहा जा रहा है! ऐसा लिखने वाले इस शब्द के पीछे की जातिवादी और पुरुष सत्तात्मक मानसिकता के बारे में सोच नहीं पाए। चाहें तो कह सकते हैं कि यह शब्दों का खेल है।

कुलपति को कुलकलंक कहने में एक विनोद है। लेकिन कुलकलंक के पीछे कुल और कलंक की अवधारणा भी है। किसी के लिए ऐसे शब्द का प्रयोग कितना उचित है, इस पर सोचने की जरूरत है। इसी तरह दूसरे विशेषणों के प्रयोग का मसला है। अगर हमारे विरोध की भाषा भी सड़क छाप हो, तो एक तरह से हम उसी संस्कृति को खाद-पानी दे रहे हैं, जिसका हम विरोध करना चाहते हैं।

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इस घटना में एक दूसरी बात की तरफ ध्यान गया। मनोज रूपड़ा जब उठकर गए, तो हॉल में कोई हलचल नहीं दिखलाई पड़ी। बाद में लोगों ने बताया कि वहां अन्य लेखक भी थे, जो बैठे रहे। लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। मैंने खुद बड़े बुद्धिजीवियों को सभा में न सिर्फ कुलपतियों या ‘सम्माननीयों’ का अनर्गल प्रलाप बर्दाश्त करते, बल्कि उनकी मुसलमानों के बारे में घृणा भरी बातों को चुपचाप सुनते देखा है। बाद में निजी बातचीत में वे जरूर अफसोस जाहिर करते हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर उसी समय विरोध प्रकट करना हमारा सामाजिक स्वभाव नहीं है।

इसका सिर्फ एक कारण है। वह है हमारे समाज में जातिवादी अभ्यास के कारण ‘बड़ों के लिहाज’ की संस्कृति। बड़ा कितना भी असभ्य और अभद्र हो, उसका विरोध करना ही बदतमीजी माना जाता है। जाति पदानुक्रम में ब्राह्मण या ‘ऊंची जाति’ के लोग बड़े होते हैं, घर में ये बड़े मां-बाप, बड़े भाई होते हैं, क्लास में अध्यापक होते हैं, संस्थाओं में पदाधिकारी होते हैं। आखिर कुलपति का विरोध किया ही कैसे जा सकता था?

इस लिहाजी संस्कृति में विरोध का स्वर विसंवादी व्यवधान मालूम होता है। लेखकों से उम्मीद करना कि वे इस लिहाजी संस्कृति में कोई भिन्न आचरण करेंगे, उनके साथ ज्यादती है!

अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्वायत्तता की, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करेंगे और सतहीपन का विरोध करेंगे। इस विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है। किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है। जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?

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इस प्रसंग में साहित्य अकादमी की भागीदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई संस्थान अपनी गोष्ठियों के लिए अकादमी से आर्थिक सहयोग लेते हैं। इससे आगे आयोजन में अकादमी की भूमिका प्रायः न के बराबर होती है। मालूम नहीं कि क्या वह वक्ताओं के नाम तय करने में भी दखल देती है या नहीं। जो हो, चूंकि इस आयोजन से अकादमी का नाम जुड़ा है, इस प्रसंग पर उसकी चुप्पी से उसका सम्मान नहीं बढ़ता।

वैसे, कोई यह कह सकता है कि उसकी परवाह किसे है! जब मंत्रालय ने अकादमी को वार्षिक पुरस्कार घोषित नहीं करने दिया, उसी वक्त सारे पदाधिकारियों को इस्तीफा दे देना था। आखिर वे अकादमी के नौकर नहीं हैं। अभी भी वे लेखकों के द्वारा चुनकर वहां भेजे गए हैं। वे लेखकों के प्रतिनिधि हैं। लेकिन बर्ताव वे सरकार के नौकर की तरह का कर रहे हैं। फिर उनसे इस प्रसंग में कुछ भी बोलने की उम्मीद कैसे करें?

साहित्य अकादमी को आज भी स्वायत्त मानने वाले भोले ही कहे जाएंगे। वैसे ही जैसे गुलज़ार और विनोद कुमार शुक्ल ने जब ज्ञानपीठ पुरस्कार स्वीकार किया, तो उसे उनका भोलापन कहा गया था। उनके ठीक पहले यह पुरस्कार एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया था, जो खुलेआम जातिवादी घृणा और मुसलमानों के खिलाफ घृणा का प्रचार करता है। गुलज़ार और विनोद कुमार शुक्ल से राजनीतिक मुखरता की मांग नहीं की जा रही थी। वे उस पुरस्कार को नामंज़ूर करके उस सामाजिक संस्कृति के प्रति अपना विरोध जाहिर कर सकते थे जो घृणा पर आधारित है। पुरस्कार लेते वक्त भी वे यह कर सकते थे। इसके लिए बहुत साहस की जरूरत न थी, मात्र संवेदनशीलता की थी। जो किसी हत्यारे को माला पहनाए, उससे माला पहनना हत्या की संस्कृति को विस्तृत करना है।

मुसलमानों का अपमान, दलितों का अपमान अगर हम सबका अपमान नहीं है, तो हम कौन हैं? चूंकि यह संवेदनशीलता हमारे भीतर नहीं है, मनोज रूपड़ा का अपमान भी उनके साथ बैठे लेखकों को उन्हीं का अपमान लगा, उससे उन्हें खुद कोई चोट नहीं पहुंची।

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(अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।)

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