विचार

राम पुनियानी का लेख: आरएसएस-बीजेपी और अमेरिका की दासता की ओर बढ़ता भारत

अब ऐसा लगता है कि आरएसएस-बीजेपी का पाकिस्तान के प्रति रूख बदल रहा है. आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने हाल में कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले रहने चाहिए।

फोटो: Getty Images
फोटो: Getty Images Hindustan Times

स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित थी और वह शीत युद्ध के दोनों प्रमुख पात्रों - अमेरिका और सोवियत संघ - में से किसी के सामने नहीं झुकता था। पाकिस्तान शुरू से ही अमेरिका के इशारों पर नाचता रहा और वहां लोकतंत्र का गला घोंटकर मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला स्थापित होने में अमेरिकी राजदूत, मुल्लाओं और सेना की भूमिका सबके सामने साफ थी। आज भी इस्लाम के नाम पर वहां कट्टरपंथियों का बोलबाला है और सेना बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वहां एक के बाद एक सेना के जनरल सत्ता पर काबिज रहे या राजनैतिक मामलों में उनका जबरदस्त हस्तक्षेप रहा। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर को भोज का आमंत्रण दिए जाने से पाकिस्तान के हालात क्या हैं, यह अच्छे से समझा जा सकता है। वैसे पाकिस्तान की विदेश नीति के अन्य पक्ष भी हैं, लेकिन उसका अमेरिका की ओर झुकाव एकदम स्पष्ट रहा है। मजाक में यह कहा जाता था कि पाकिस्तान पर तीन ‘ए‘ का राज है - अल्लाह, अमेरिकी राजदूत और आर्मी। यह कथन संभवतः अतिशयोक्तिपूर्ण हो लेकिन यह साफ है कि जब समाज में धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति का बोलबाला हो जाता है, तब वैसे ही हालात बन जाते हैं जैसे हमारे पड़ोसी मुल्क में हैं।

Published: undefined

भारत किसी भी महाशक्ति के सामने न झुकने की राह पर चला और विभिन्न राष्ट्रों के सहयोग से बहुआयामी विकास करते हुए उसने तकनीकी, औद्योगिक और शिक्षा के क्षेत्र में तरक्की हासिल की। इसका एक उदाहरण है वे पांच आईआईटी, जिनमें से प्रत्येक अलग-अलग बड़े देशों की मदद से बनाए गए थे। भारत महाशक्तियों दबाव के सामने नहीं झुका, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश की स्थापना के पहले की घटनाएं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत से कहा कि वह पूर्वी पाकिस्तान के घटनाक्रम में हस्तक्षेप न करे। उस समय पाकिस्तान की सेना वहां कहर ढ़ा रही थी, जिसके नतीजे में बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आ रहे थे। इंदिरा गांधी ने निर्भीकता का परिचय देते हुए न केवल निक्सन की सलाह मानने से इंकार कर दिया बल्कि सोवियत संघ के साथ ‘मैत्री संधि‘ कर ली और बंगाल में अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े की मौजूदगी के बावजूद भारतीय सेना ने वहां हस्तक्षेप किया और मुक्ति वाहिनी की पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त कराने में मदद की, जो पूर्वी पाकिस्तान में तरह-तरह की ज्यादतियां कर रहा था। यहां तक कि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू को पूर्वी पाकिस्तान पर लादने का प्रयास किया जा रहा था। बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान ने बगावत कर दी। भारत ने अमेरिकी धमकियों की परवाह न करते हुए पूर्वी पाकिस्तान की जनता को मुक्ति दिलवाई।

Published: undefined

लेकिन 2014 के बाद से भारत की विदेश नीति में धीरे-धीरे बदलाव होता गया और उस पर अमेरिका का प्रभुत्व कायम होता गया। भारत, इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध स्थापित कर रहा है> सत्ता पर काबिज दल की नीतियों के अनुरूप ईरान और फिलीस्तीन से हमारे परंपरागत रिश्तों को कुर्बान कर दिया गया है। आपरेशन सिंदूर में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच टकराव हुआ। जहां भारत ने दावा किया कि युद्धविराम पाकिस्तान के अनुरोध और दोनों देशों के बीच हुई वार्ताओं की वजह से हुआ, वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार यह शेखी बघारी कि उनके प्रशासन से आर्थिक मामलों में नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर दोनों देशों के बीच युद्धविराम करवाया।

Published: undefined

अब तक भारत में पाकिस्तान को देश का दुश्मन नंबर 1 बताया जाता रहा है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच इंडो-पाक फोरम व 'अमन की आशा' जैसी महत्वपूर्ण पहलों के जरिए संपर्क-संबंध स्थापित करने के प्रयास होते रहे हैं। अमन की आश अभियान की शुरूआत भारत के टाईम्स ऑफ़ इंडिया एवं पाकिस्तान के अग्रणी समाचारपत्र जंग ने की थी। निःसंदेह दोनों देशों की सरकारें एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती रही हैं। कश्मीर हमेशा से दोनों देशों के बीच एक मुद्दा रहा है। कश्मीरियों को एक ओर पाकिस्तान से आने वाले उग्रवादियों और आतंकियों से मुकाबला करना पड़ा तो दूसरी ओर नागरिक इलाकों में भारतीय सेना की भारी मौजूदगी ने उनका जीवन हराम कर दिया।

Published: undefined

अब ऐसा लगता है कि आरएसएस-बीजेपी का पाकिस्तान के प्रति रूख बदल रहा है। आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने हाल में कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले रहने चाहिए। संघ परिवार लगातार कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है और नेहरू को कश्मीर की स्थिति के लिए दोषी ठहराता रहा है। इस बीच कश्मीर में अफरातफरी जारी रही। अटलबिहारी वाजपेयी ने दोनों देशों के बीच विवाद को सुलझाने के प्रयास में लाहौर तक बस यात्रा की। इसके बाद पाकिस्तान के तानाशाह परवेज मुशर्रफ भारत पहुंचे। लेकिन इसके बावजूद भी गतिरोध बना रहा। इस सबके बीच होसबोले का वक्तव्य हवा के एक ताजे झोंके की तरह है। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत पाकिस्तान और भारत के रिश्तों को अखंड भारत की संकल्पना से जोडते रहे है। बीजेपी सरकार ने सार्क को बढ़ावा देने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। सार्क दक्षिण एशियाई देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में एक शानदार कदम था।

Published: undefined

होसबोले का दावा है कि संघ की नीति हमेशा से यही रही है, हालांकि सच यह है कि बातचीत के द्वार खुले रखने की बात एकदम नई है। होसबोले ने यह वक्तव्य अपनी हालिया अमरीका यात्रा के बाद जारी किया है मगर कई लोगों को संदेह है कि उन्होंने अमेरिका के दबाव में ऐसा कहा है। इस दावे की सच्चाई का पता लगाना मुश्किल है मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत अमेरिका को अपना आका मान चुका है। अमेरिका ने जब भारत पर आयात शुल्क 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया और उसे फिर 18 प्रतिशत तक घटा दिया तब भारत ने इसका कोई विरोध नहीं किया। भारत ने बिना ना-नुकुर के अमेरिका के इस निर्देश का भी पालन किया कि वह रूस से कच्चा तेल न खरीदे।

इसकी दुबारा पुष्टि राम माधव के उस वक्तव्य से हुई जिससे वे बाद में पीछे हट गए. वे आरएसएस-भाजपा के प्रमुख नेता हैं। वाशिंगटन में हडसन इंस्टीट्यूट में बोलते हूए उन्होंने कहा कि भारत टैरिफ बढ़ाने और रूस से तेल न खरीदने जैसे अमेरिका के फैसलों और मांगों के सामने झुका। इसके बाद उन्होंने कहा कि ‘‘भारत ने अमेरिका के साथ सहयोग करने के लिए आखिर क्या नहीं किया‘‘। जब उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा तो उन्होंने अपना यह वक्तव्य वापिस ले लिया मगर पोल तो खुल चुकी थी।

Published: undefined

आरएसएस हमेशा से अमेरिका का पिछलग्गू रहा है। यहां तक कि उसने अमेरिका के वियतनाम पर हमले का भी समर्थन किया था। संघ की राजनैतिक शाखा भारतीय जनसंघ सहकारिता और सार्वजनिक क्षेत्र के उस मॉडल के खिलाफ थे जिसकी मदद से भारत का औद्योगिकरण हुआ। पाकिस्तान हर चीज में अमेरिका की मदद के प्रति इतना आश्वस्त था कि उसने अपनी औद्योगिक, शैक्षणिक और शोध अधोसंरचना विकसित ही नहीं की। भारत की वर्तमान सरकार का फोकस पहचान से जुड़े मुद्दों, गाय-बीफ आदि पर है. वह डार्विन के सिद्धांत को खारिज करती है और मेंडलीफ की आवर्त सारणी को विज्ञान के पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है। यह सरकार धीरेन्द्र शास्त्री जैसे बाबाओं की गिरफ्त में है और अंधश्रद्धा को बढ़ावा दे रही है। इसके साथ ही वह अमेरिका की पिछलग्गू भी बनी हुई है। यही वह राह है जिस पर पाकिस्तान भी चला था जिसके चलते वहां न तो प्रजातंत्र जड़ पकड़ सका और न ही देश का विकास हो सका।

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

Published: undefined

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

Published: undefined