विचार

विष्णु नागर का व्यंग्य: हरा देखो, ये भी हरा और वो भी हरा देखो, लेकिन तिरंगे वाला हरा नहीं...

हमारी आंखें हैं मगर देखने के लिए नहीं, दिखाने के लिए हैं कि देखो, हमारी तरह देखना सीखो। भगवा देखो। हरा देखो। ये भी हरा और वो भी हरा है, देखो। यहां भी हरा, वहां भी हरा है। हरा ही हरा है। तिरंगेवाला हरा नहीं, अंबानी अडानीवाला हरा। पढ़ें विष्णु नागर का व्यंग्य...

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

यह लोकतंत्र है न, सब कहते हैं न यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है! है न? एकदम पक्के तौर पर है! किसी को शक तो नहीं है? वैसे शक हो तो वो भी हम दूर कर देंगे मगर यह हम पर छोड़ो कि हम किस तरह यह दूर करेंगे। हो सकता है, हम तुम्हारी शंकाएं, तुम्हें अर्बन नक्सल मान कर दूर कर दें या सीबीआई, ईडी आदि-आदि लगवाकर दूर कर दें मगर हमारा वादा है, शंका जरूर दूर करेंगे। 

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हमारे यहां सरकार वोट से चुनी जाती हैं, यह सब देख रहे हैं। अदालतें यहां हैं। यह आयोग और वह आयोग भी यहां है। यहां तक कि भाइयों-बहनों, मानवाधिकार आयोग भी यहां है! यह जांच एजेंसी और वह जांच एजेंसी भी यहां है। मंत्रिमंडल है। उसमें ढेर सारे मंत्री हैं। अखबार हैं, टीवी चैनल हैं, सोशल मीडिया है और सबके सब ढेर सारे हैं। सब कुछ-जो एक लोकतंत्र में होना चाहिए-है। कोई कमी नहीं है। कहो तो दो-चार-दस और भी बनवा दें! हमारे पास लोगों की कमी नहीं। वहां भी पचास-सौ बैठा देंगे।

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और सब है, इसलिए जिसको जहां जाना हो राहत पाने, जाए। जो शिकवा -शिकायत करनी हो, जो गड़बड़ी दिखानी हो , जो-जो प्रमाण प्रस्तुत करना हो, करे। चुनाव आयोग जाना चाहता है, जाए। एक बार नहीं, पचास बार जाए। अदालत जाना चाहे, जाए। प्रधानमंत्री को प्रार्थना पत्र लिखना चाहे, लिखे। राष्ट्रपति से प्रतिनिधि मंडल बनाकर मिलना चाहे, मिले। अडानी के खिलाफ बोलना चाहे, बोले। मतलब सब है, फुल लोकतंत्र है! लोकतंत्र में जेलें भी होती हैं,वे भी हैं। पुलिस भी होती है, वह भी है। हथकड़ियां-बेड़ियां भी होती हैं, वे भी हैं। कोई कमी नहीं है। सब भरपूर है।

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हां सब है मगर होकर भी नहीं है। देखो। ठीक से देखो। दिख रहे हैं न, हमारे कान! एक नहीं बल्कि दोनों कान! कान में तुम्हें मैल दिख रहा है? नहीं न! देख लो, ठीक से जांच लो। डाक्टर को बुलवा कर दिखवा लो। फिर न कहना,  हमने ठीक से देखा नहीं था! ये सुनने के लिए हैं मगर हम  किसी की सुनते नहीं क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है! लोकतंत्र इसलिए नहीं होता कि सुनें,  इसलिए होता है कि सुनाएं, जैसे प्रधान जी ने संसद में सुनाया और पूरे नब्बे मिनट सुनाया। इसमें विपक्ष होता है मगर वह ' झूठ ' बोलने और ' गालियां ' देने के लिए होता है।

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हां हम फिर से कहते हैं, कोई बड़ा से बड़ा फन्ने खां हो, हम उसकी भी नहीं सुनते और लोकतंत्र है, इसीलिए नहीं सुनते। संसद में विपक्ष की नहीं सुनते। किसी ने कभी सुना, पढ़ा, देखा कि हमने विपक्ष की कोई बात कभी सुनी? किसी ने देखा-सुना-पढ़ा कि हमने आंदोलनकारियों, धरना-प्रदर्शनकारियों, नारे लगानेवालों, काले झंडे दिखानेवालों की बात कभी सुनी? दिल्ली की सीमा पर किसान सालभर से ज्यादा धरना दिए रहे, तब कुछ सुनी पर क्या आपको लगता है वाकई सुनी?अरे हम तो अपने मंत्री की नहीं सुनते, जनता-फनता, विपक्ष-फिपक्ष लगते क्या हैं हमारे सामने ?

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हम अदालतों की नहीं सुनते, अलबत्ता उन्हें सुनाते रहते हैं और रोज सुनाते हैं। यही सुनाते हैं कि हम तुम्हारी नहीं सुनेंगे। कानून मंत्री की रोज की ड्यूटी है कि वह अदालत को प्रतिदिन बताता रहे कि सुनो, हम तुम्हारी नहीं सुनेंगे। तुम से जो बने,कर लेना। जिन राज्यों में हमारी पार्टी की सरकार नहीं है, वहां हमारे राज्यपाल,  मुख्यमंत्री की नहीं सुनते, विधानसभा की नहीं सुनते। वे केवल मन की बात सुनते हैं और जानते हैं न, किसके मन की बात? आकाशवाणी वाले मन की नहीं, वह तो जनता के मुफ्त कंजंप्शन के लिए है। असली वाले मन की बात, असली वाले दिल की बात। हम अपने बनाए नीति आयोग की नहीं सुनते। और मामला अडानी का हो तो हम अपने वित्त मंत्रालय की नहीं सुनते! संसद में विपक्ष अडानी-अडानी करता रहा, प्रधानमंत्री ने उसकी एक सुनी? नाम तक लिया उसका? हम किसी की नहीं सुनते, भाई, किसी की नहीं। हमारे कान सुनने के लिए बने हैं लेकिन वही सुनते हैं, जो हम सुनना चाहते हैं। कभी-कभी यह भ्रम बनाए रखना होता है कि सरकार बहरी नहीं है, सुनती है पर आपको मालूम है वह क्या सुनती है। कभी किसी तरफ से हमारे कानों को प्रिय लगने वाला संगीत आता है तो हम सुन लेते हैं। अदालतें भी ऐसा संगीत सुना देती हैं, तो सुनते हैं। वाह वाह भी करते हैं वरना हमारे लोग उसे सुप्रीम कोठा कहने से भी नहीं चूकते!

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वैसे आपसे क्या छिपाना बेसिकली हम सुनने के लिए बने ही नहीं हैं। सुननेवाले, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाया करते मगर हम बना रहे हैं। वे नफ़रत का व्यापार नहीं करते, हम करते हैं। सुननेवाले, प्रिय हो या अप्रिय, कर्णप्रिय हो या कर्णकटु, सब सुनते हैं। हम सब नहीं सुनते। न्यू इंडिया के लोकतंत्र में सरकार सुनने के लिए नहीं, बोलने के लिए होती है।

और बता दें कि सुनने तक बात सीमित नहीं है। हमारी आंखें हैं मगर देखने के लिए नहीं, दिखाने के लिए हैं कि देखो, हमारी तरह देखना सीखो। भगवा देखो। हरा देखो। ये भी हरा और वो भी हरा है, देखो। यहां भी हरा, वहां भी हरा है। हरा ही हरा है। तिरंगेवाला हरा नहीं, अंबानी  अडानीवाला हरा। हाथ भी हैं हमारे मगर थप्पड़ जड़ने के लिए हैं, ताकि जिसे पड़े, उसका मुंह हमेशा के लिए टेढ़ा हो जाए! हाथ विरोधियों के हाथों में हथकड़ियां- बेड़ियां डालने के लिए हैं। पैर हैं मगर पीछे चलने के लिए हैं। और पेट तो खाने के लिए ही बना है और हम खाते हैं, खूब खाते हैं। बीच में पानी पीने में समय बर्बाद नहीं करते।

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अब तो समझ में आया न ,यहां सब है और सब नहीं है। लोकतंत्र है मगर नहीं है। धर्मनिरपेक्षता है मगर नहीं है। मीडिया है मगर नहीं होने के लिए है। जो नहीं है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है और जो है, वह तो सबको दिख रहा है। हत्या और बलात्कार के अपराधियों को माफी देना सबको दिखा, बीबीसी की रिपोर्ट में 2002 का गुजरात भी दिखा और अडानी मामले में हिंडनबर्ग रिपोर्ट भी दिखी। उसे क्या दिखाना! बाकी आप सब समझदार हो और आप जितनी ज्यादा समझदारी दिखाओगे, उतने अधिक फायदे में रहोगे क्योंकि यह है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और हम हैं,जो इसे चला रहे हैं।

बाकी सब जयश्री राम ही, जयश्री राम है।

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