विचार

अशोक वाजपेयी / क्षत-विक्षत लोकतंत्र में बुद्धिजीवियों की अप्रासंगिकता

बुद्धिजीवी विभिन्न सार्वजनिक मंचों का इस्तेमाल अपनी ‘असहमत’ अभिव्यक्ति को मुखर करने के लिए कर रहे हैं। आज के दुर्व्‍याख्या और विस्मृति के दौर में भी कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्‍याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं।

असहमतियां पहले भी होती थीं। पर अब शासन-प्रशासन के विरुद्ध कुछ भी कहना, सुनना लगभग असंभव है। ऐसे में इतिहासकार रोमिला थापर और हरबंस मुखिया जैसों को इस तरह सुनना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है
असहमतियां पहले भी होती थीं। पर अब शासन-प्रशासन के विरुद्ध कुछ भी कहना, सुनना लगभग असंभव है। ऐसे में इतिहासकार रोमिला थापर और हरबंस मुखिया जैसों को इस तरह सुनना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है 

भारत के नए निज़ाम ने यह बार-बार स्पष्ट किया है कि उसके द्वारा कल्पित हिन्दू राष्ट्र में मंत्रोच्चार आदि करने, विभिन्न अनुष्ठानों में दक्ष ब्राह्मणों के अलावा किसी तरह के बुद्धिजीवियों की कोई दरकार नहीं होगी। कुछ शायद विरुद्ध लिखने, हिन्दू नायकों पर महाकाव्य आदि लिखने के लिए भी जरूरी हों।

इसके अलावा जो बुद्धिजीवी शिक्षकों आदि के रूप में होंगे, उनका बुनियादी काम एक आज्ञापालक समाज लगातार शिक्षित-दीक्षित और तैयार करना होगा। शायद कुछ और जरूरी हों, जो टेलीविजन आदि में वाक्पटु हों और जिन्हें झूठ बोलने, दुर्व्‍याख्या करने आदि करने में आत्मविश्वास हो।

यह अकारण या आकस्मिक नहीं है कि बाकी बुद्धिजीवियों को सत्ता के उच्चतर स्तरों से ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ आदि कहकर लगातार लांछित किया जाता रहा है। निज़ाम के लिए उपयोगी और वांछनीय विप्रों की जमात लगातार बन और विकसित हो रही है। स्वतंत्र अध्यवसाय, शोध, जिज्ञासा, तर्कसंगति, वैचारिक संवाद, वस्तुनिष्ठता आदि सर्वथा अनावश्यक हैं। अवांछनीय भी।

ऐसा माहौल हिन्दुत्व की शक्तियों और प्रचारकों ने बहुत सुनियोजित ढंग से बनाया है जिसमें बुद्धिजीवी सिरे से अप्रासंगिक हो या मान लिए गए हैं। बुद्धि का अर्थ ज्यादातर जुगाड़, तिकड़म आदि हो गया है। ज्ञान की खिल्ली उड़ाई जाती है और अज्ञान का शिखरों से महिमामंडन हो रहा है। ज्ञान-विज्ञान, शोध आदि की संस्थाओं का इस कदर ब्यूरोक्रेटाइजेशन किया गया और किया जा रहा है कि अब भी बचे स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवियों के लिए काम करना, जीना तक मुहाल हो गया और हो रहा है।

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अगर बेहद सक्रिय राजनीतिक भारत को ही भारत का सबसे निर्णायक अंग माल लें, तो वह ऐसा भारत है जिसे ज्ञान, बुद्धि, विचार, संवाद की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है। राजनीतिक भारत और भारतीय राजनीति में, हमारे क्षत-विक्षत लोकतंत्र में बुद्धिजीवी की कोई जगह नहीं रह गई है।

अपनी इस अनर्जित अप्रासंगिकता में भारतीय बुद्धिजीवी क्या कर रहे हैं, इसका आकलन या विश्लेषण करना कठिन है। उसकी योग्यता भी नहीं है। फिर भी, मोटे तौर पर लगता यह है कि अब भी ऐसे बुद्धिजीवियों की संख्या कम नहीं है जो ईमानदार बौद्धिक प्रयत्न कर रहे हैं, भले उनके लिए अवसर और मंच, सुविधाएं और संवाद की संभावनाएं लगातार सिकुड़ रही हैं। इनमें अच्छी संख्या युवा बुद्धिजीवियों और अध्येताओं की है।

ऐसे में बुद्धिजीवी ही हैं जो विभिन्न सार्वजनिक मंचों का इस्तेमाल अपनी ‘असहमत’ अभिव्यक्ति को मुखर करने के लिए कर रहे हैं। ऐसे भी कुछ हैं जिनका राजनीति में तथाकथित प्रतिपक्ष से संवाद है और जो उसे वैकल्पिक अवधारणाएं और युक्तियां सुझा पा रहे हैं।

दुर्व्‍याख्या और विस्मृति के दौर में, सौभाग्य से, कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्‍याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं। वे स्मृति का आग्रह कर रहे हैं।

इस सबमें जोखिम है। देर-सबेर हो सकता है कि ऐसे बुद्धिजीवियों पर बजरंग दल, पुलिस आदि के हमले हों। हमारे समय के ये बुद्धिजीवी रक्तबीज हैं: उन्हें हटा या नष्ट भी कर दिया जाए या हाशिये पर डाल दिया जाए, तो नए युवा बुद्धिजीवी पैदा होंगे जो उनके बौद्धिक सत्याग्रह को जारी रखेंगे, आगे ले जाएंगे। यह उम्मीद इस शायद अबोध विश्वास से निकलती है कि भारतीय राजनीति को न सही, भारतीय जन को हमेशा बुद्धिजीवियों की जरूरत रहेगी।

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जंग के वक्त

हमारा समय, दुर्भाग्य से, कई जंगों से घिरा समय है। गाज़ा, यूक्रेन में जंग चलते कई साल हो गए और ताजा जंग ईरान को लेकर हो रही है। इस गिनती में वे जंग शामिल नहीं हैं जो हम अपने देश में रोजाना स्त्रियों, बच्चों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों, किसानों आदि के खिलाफ सत्ताधारी शक्तियों को झूठ-नफरत-हिंसा-हत्या का एक अभियान चलाकर लड़ते देख रहे हैं।

हम पर कोई हमला नहीं हुआ है: हम ही अपने वंचित-शोषित वर्गों पर हमला कर रहे हैं। ऐसे में कामकाजी स्त्रियों के कई बरसों से साहित्य-विचार-कला में सक्रिय समूह ‘रसचक्र’ ने अपना एक दशक पूरा होने को लेबनानी-अमेरिकी कवयित्री ईतल अदनान की एक लंबी कविता ‘जंग के वक्त में होना’ के निधीश त्यागी द्वारा किए गए हिन्दी अनुवाद के मार्मिक पाठ से मनाया। पाठ किया अलका रंजन, पूर्वा भारद्वाज, देवयानी भारद्वाज और श्वेता त्रिपाठी ने।

लगभग एक घंटे अविराम चलते इस पाठ ने लगभग असंख्य दैनिक क्रियाओं के चलते जंग की मौजूदगी उसकी अंतर्ध्‍वनियों और आशयों को मर्मस्पर्शी ढंग से उभारा। भयावह नाश और विध्वंस के दौरान, जो जंग के अनिवार्य परिणाम होते हैं, हम सबकी, जो जंग से बचे या दूर या सुरक्षित हैं, दिनचर्या बदस्तूर चलती रहती है: जंग की आहट, उसके द्वारा मारे जा रहे लोगों की संख्या, ध्वस्त की गई जगहों के बारे में हम जानते और सुनते हैं और हमारी दिनचर्या चलती रहती है मानों हम अपनी जिजीविषा की गिरफ्त में हों।

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इस अनूठी कविता का, जो 52 अनुच्छेदों में लिखी गई है, अंतिम अनुच्छेद इस प्रकार है:

कविता और दरख़्तों के बहाने अपना ध्यान बंटाने की कोशिश करना,

देखना पेड़ों को तेजी से बढ़ते हुए, 

प्रकट और अदृश्य होते हुए,

शैतानी हमलों के दौरान झूठे आश्रयों में शरण लेना,

शरणार्थियों को बाहर निकालना, नए आश्रय से उन्हें बाहर खदेड़ना,

एक फिलिस्तीनी को सिर पर और फिर पीठ भर गोली मारना,

इस कसाईपने- में ईराकियों को शामिल करना,

बड़े कैनवास को खून से रंगना,

रात की ट्रेन पकड़ना

फिर हवाई जहाज, पेरिस में उतरना, टेलीफोन उठाना,

बेरूत का एक नंबर लगाना, दोस्त को कहते सुनना

कि एक फिलिस्तीनी पत्रकार को किसी कट्टर एकेश्वरवादी ने बेहरमी से गोली मार दी

भगवान की जरूरत पर सोचना,

इस समस्या को धकेलकर किनारे करना,

कसांड्रा के बारे में सोचना,

हमुराबी संहिता के कायदे को याद करना,

चर्बी में डूब जाना, देखना उस संकरी और लंबी सड़क को

जो पूरी दुनिया को कत्लगाह की तरफ लिए जा रही है।

कविता के पाठ में ठंडी किस्म की, शांत-सी नाटकीयता थी जो उसके मर्म के सर्वथा अनुकूल थी।

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अंग्रेजी में शमशेर

शायद एकाध साल हुआ होगा जब अंग्रेजी कवि-अनुवादक अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ने मुझे बताया था कि वह शमशेर बहादुर सिंह की हिन्दी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने जा रहे हैं। मैंने उन्हें कुछ संदर्भ और सामग्री उपलब्ध कराई जिसमें मुख्यतः उन पर लिखे साही आदि के निबंध थे। हाल में उन्होंने सूचित किया कि उन्होंने पचपन कविताओं का अनुवाद कर लिया है और वह पांच और कर, साठ की संख्या पहुंचने की कोशिश में हैं।

हिन्दी के इस अप्रतिम और मूर्धन्य कवि की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है और शायद एक छोटी-सी पुस्तिका भी प्रकाशित हुई है। पर मेहरोत्रा का अनुवाद अलग स्तर का होगा। उनके कबीर, रहीम और विनोद कुमार शुक्ल के अनुवाद उच्च कोटि के हैं ओर बहुमान्य रहे हैं। शमशेर जी की कुछ कविताओं के उनके अनुवाद शिकागो की प्रसिद्ध कविता पत्रिका ‘पोएट्री’ में हाल ही में प्रकाशित हुए हैं। उम्मीद है कि शमशेर जी की कविताओं का यह अनुवाद पुस्तकाकार जल्‍दी ही प्रकाशित हो जाएगा।

(अशोक वाजपेयी वरिष्ठ साहित्यकार हैं। साभारः thewirehindi.com)

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