
जैव विविधता शायद प्राकृतिक पर्यावरण में सर्वाधिक उपेक्षित है। अगर इस पर कभी नीति नीति-निर्माताओं का ध्यान जाता भी है तो पेड़ों और जानवरों से आगे जाता ही नहीं। लेकिन जैव विविधता केवल पेड़ों और जानवरों तक सीमित नहीं। यह प्रकृति की वह बुनियादी निर्माण इकाई है, जिसके बिना न तो प्रकृति का कोई अस्तित्व रहेगा और न ही यह ग्रह रहने लायक बचेगा। जैव विविधता पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवित प्राणियों की असाधारण विविधता का नाम है। इसमें पौधे, जानवर, सूक्ष्म जीव, फंगस और यहां तक कि पैथोजेन्स भी शामिल हैं; साथ ही इसमें उनके भीतर मौजूद आनुवंशिक जानकारी और उनके द्वारा निर्मित जटिल पारिस्थितिक तंत्र भी समाहित हैं। मैंने इस बात को अनुभवों के थपेड़े खाकर महसूस किया, और अब जाकर इसे थोड़ा समझना शुरू किया है।
जब मैंने साल 2002 में पुरानीकोटी गांव में आधा एकड़ जमीन खरीदी थी, तब यहां केवल दो घर हुआ करते थे; पूरे परिदृश्य में घास से ढके उतार-चढ़ाव वाले पहाड़ थे, जिनमें सेब के कुछ पेड़ और कुछ देवदार और ब्लू पाइन के पेड़ थे। मेरे अपने प्लॉट पर जंगली डेजी, बटरकप, लिली और प्रिमरोज के फूलों की चादर बिछी रहती थी। वह जगह व्यावहारिक रूप से मधुमक्खियों, तितलियों, झींगुरों और ड्रैगन-फ्लाई यानी पतंगो से भरी रहती थी। धूप खिले दिनों में वहां इनकी एक भिनभिनाहट-सी आवाज गूंजती रहती थी। पक्षी खाद्य श्रृंखला में इनके ऊपर लेकिन जंगली बिल्लियों और पाइन मार्टिन (नेवले की एक प्रजाति) के नीचे हैं। पुरानीकोटी वाकई जैव विविधता का एक हॉटस्पॉट था!
Published: undefined
लेकिन अब ऐसा नहीं। गांव की अधिकांश जमीन पर कंक्रीट के ढांचे खड़े हो चुके हैं, पेड़ काट दिए गए हैं, और ड्रैगन-फ्लाई की वह भिनभिनाहट अब कंक्रीट तोड़ने वाले जैक हैमर्स और आरी की कर्कश आवाजों में बदल चुकी है। इसकी भरपाई के लिए मैंने अपनी जमीन पर फलदार और जंगली किस्मों के 200 से अधिक पेड़ लगाए हैं। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि केवल एक प्लॉट पर पेड़ लगा देने भर से जैव विविधता का निर्माण नहीं हो सकता।
इस क्षेत्र में प्राकृतिक विकास की जो सबसे निचली परत थी- घास, झाड़ियां, फर्न, जंगली फूल, लताएं- वे सब खत्म हो चुकी हैं, और मिट्टी ने बारिश और बर्फ को जमा करने या नमी बनाए रखने की अपनी क्षमता खो दी है। प्रकृति की इस जीवित निर्माण इकाई के गायब होने के साथ ही, इस पर निर्भर कीड़े-मकोड़े भी लुप्त होने लगे हैं। कुछ गिनी-चुनी तितलियां और मधुमक्खियां अभी भी हमें आनंद देती हैं, लेकिन मैंने इस साल एक भी ड्रैगन-फ्लाई नहीं देखी। मुझे लगता है कि उनका बसेरा यहां से उठ चुका है और वे हमेशा के लिए चली गई हैं। एक या दो साल में मधुमक्खियां और तितलियां भी जैव विविधता से विहीन हो चुके इस बंजर इलाके को छोड़ देंगी।
ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ यही वह मुख्य कारण है जो शायद यह साफ बताता है कि अब हम उन फलों-सेब, नाशपाती, खुबानी, चेरी-को क्यों नहीं उगा पा रहे हैं जिन्हें कभी उगाया करते थे: जैव विविधता के नष्ट होने से उनके फूलों को परागित करने के लिए न तो कीड़े बचे और न ही बीजों को फैलाने के लिए पक्षी।
Published: undefined
कीमती जैव विविधता के इस नुकसान को शायद ही कभी हमारी योजना और विकास प्रक्रियाओं में शामिल किया जाता है। बहुत खींचतान कर जिस चीज पर विचार किया जाता है, वह है वन या हरित आवरण- यानी काटे गए पेड़ों की संख्या। इन्हें मापा जाता है, उनका मूल्य तय किया जाता है, परियोजना प्रस्तावक द्वारा वह राशि चुकाई जाती है और प्रतिपूरक वनीकरण के रूप में उसकी दोगुनी संख्या में पेड़ लगा दिए जाते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में जैव विविधता के नुकसान को सिरे से नजरअंदाज कर दिया जाता है और इसकी भरपाई कभी नहीं की जाती।
हिमाचल के कुछ आंकड़े इस बात को बेहतर ढंग से समझा सकते हैं: हिमाचल का वन क्षेत्र 37 लाख हेक्टेयर है, और भोपाल वन प्रबंधन संस्थान द्वारा 2024 के एक अध्ययन में इसके जैव विविधता मूल्य का आकलन 33,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष किया गया है। दूसरे शब्दों में, वनों के प्रत्येक हेक्टेयर का जैव विविधता योगदान मूल्य 89,000 रुपये प्रति वर्ष है। किसी भी परियोजना के सामान्य 25-30 वर्षों के जीवन चक्र पर इसके शुद्ध वर्तमान मूल्य की गणना की जाए, तो राज्य को गैर-वन उपयोग के लिए डाइवर्ट किए जाने वाले प्रत्येक हेक्टेयर वन के लिए कम से कम 30 लाख रुपये वसूलने चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया जाता क्योंकि जैव विविधता का कोई मूल्य ही नहीं आंका गया है।
Published: undefined
हालांकि, वैश्विक स्तर पर अब इसमें बदलाव आ रहा है, भले ही हम भारत में हर साल भव्य और आडंबरपूर्ण योजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ों को काटना जारी रखे हुए हैं। ऐसी योजनाएं जो जंगलों पर निर्भर हजारों समुदायों की आजीविका को उजाड़ देंगी लेकिन क्रोनी पूंजीपतियों की तिजोरी में कुछ खरब डॉलर जोड़ देंगी। उदाहरण के लिए, पेरू डंक-रहित मधुमक्खियों को कानूनी सुरक्षा देने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।
अमेजन के जंगलों के इन नन्हे परागणकों के पारिस्थितिक महत्व को स्वीकार करते हुए- जो अमेजन के 80% उष्णकटिबंधीय फलों को परागित करते हैं-इसी महीने एक कानून बनाया गया है जो उनके अस्तित्व के अधिकार, एक स्वच्छ और अक्षुण्ण आवास के अधिकार, पुनरुत्पादन के अधिकार और प्रदूषण, वनों की कटाई या परियोजनाओं द्वारा उनके अस्तित्व को खतरा पैदा होने पर कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के अधिकार को मान्यता देता है। कोई भी कंपनी या व्यक्ति जो इन अधिकारों को खतरा पहुंचाता है, उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
इसी तरह, वेल्स में वाई नदी को उसके उद्गम स्थल से लेकर समुद्र तक ‘प्रकृति के अधिकारों’ के तहत कानूनी सुरक्षा दी गई है। यह नया चार्टर नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में मान्यता देता है जिसका अपना अंतर्निहित अधिकार है- यानी बहने का अधिकार, अपनी जैव विविधता का अधिकार, प्रदूषण मुक्त रहने का अधिकार, पुनर्जीवित होने और एक स्वस्थ जलभृत का अधिकार। अब कोई भी नागरिक इन अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जा सकता है।
Published: undefined
न्यूजीलैंड ने भी व्हंगानुई नदी को कानूनी दर्जा दिया है। माउंट तारानाकी को एक 8 सदस्यीय संरक्षक परिषद के माध्यम से कानूनी अभिभावकत्व दिया गया है, जिसमें चार सरकारी विशेषज्ञ और चार आदिवासी प्रतिनिधि शामिल हैं: इस परिषद की मंजूरी के बिना वहां कोई भी सरकारी या निजी परियोजना मंजूर नहीं की जा सकती। भारत में, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2017 में गंगा को कानूनी अधिकारों के साथ ‘एक जीवित इकाई’ के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर रहस्यमयी ढंग से रोक लगा दी गई और यह मामला अब भी अधर में लटका है।
पेरू और वेल्स के कानून केवल पेड़ों और जंगलों को अलग-थलग करके देखने के बजाय, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता की सुरक्षा के महत्व को समझने की दिशा में एक छोटी सी शुरुआत हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि हमारी सरकारें, अदालतें और एनजीटी इन घटनाक्रमों पर ध्यान देंगे, अपने सर्वज्ञानी होने के भ्रम को दूर करेंगे, और पारिस्थितिक मुद्दों के प्रति अपनी इस गहरी नींद, सुस्ती और समझ की कमी से जागेंगे। तभी और केवल तभी ड्रैगन फ्लाई शायद पुरानीकोटी लौटें और उस पर दावा कर पाएं जिन पर उनका कानूनी हक है।
अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। यह https://avayshukla.blogspot.com से लिए उनके लेख का संपादित रूप है
Published: undefined
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए
Published: undefined