
जिस दोपहर एम के स्टालिन कोलाथुर से चुनाव हारे, लोगों को लगा कि बेशक वह गुस्सा जाहिर न करें या एकदम से चुप्पी की चादर न ओढ़ लें, लेकिन उनके हाव-भाव से निराशा जरूर झलकेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का अभिवादन करने बाहर निकले जो आंखों में आंसू लिए वहां जमा हुए थे। स्टालिन बिल्कुल शांत और संयमित। चेहरे पर हल्की मुस्कान। उन्हीं मतदाताओं के सामने हाथ जोड़े हुए, जिन्होंने उन्हें हराया था।
स्टालिन खुली गाड़ी में निकले थे। कोलाथुर के लोगों का दशकों तक उनका साथ देने के लिए शुक्रिया किया। उन्होंने कहा कि चुनावी फैसले तो क्षणिक होते हैं, लेकिन जनसेवा जारी रहनी चाहिए- बिना किसी कड़वाहट, बिना किसी धोखे के आरोप, और बिना किसी भावनात्मक नाटक के। आलोचकों ने भी माना कि उन्होंने जिस गरिमा के साथ हार का सामना किया, वह आज की भारतीय राजनीति में बहुत कम दिखती है।
तमिलनाडु में एक और तस्वीर ने जबरदस्त भावनात्मक असर डाला। अपनी नई पार्टी को सत्ता में पहुंचाने वाले अभिनेता जोसेफ विजय स्टालिन के घर पहुंचे। तमिलनाडु का इतिहास इस मामले में खासा बुरा रहा है कि यहां मुख्यमंत्री अक्सर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी के आदेश देते हैं, और सत्ताधारी पार्टी के विधायक विधानसभा में ही विरोधियों से हाथापाई पर उतर आते हैं। लेकिन स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन, जो अब नेता प्रतिपक्ष हैं, ने विजय का बेहद स्नेहपूर्ण ढंग से स्वागत किया। न कोई असुरक्षा का भाव, न युवा विजेता को कमतर दिखाने की कोशिश, और न कोई दबी आक्रामकता!
समकालीन भारतीय राजनीति में ऐसा दृश्य दुर्लभ है।
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चेन्नई की लेखिका और सामाजिक टिप्पणीकार कविन मलार कहती हैं, ‘हम अब भी हैरान हैं कि वह हारे कैसे। आक्रामक हिन्दुत्व का उनका कड़ा विरोध बीजेपी को दूर रखने में कामयाब रहा। स्टालिन अब भी कोई कमजोर नेता नहीं।’ उनका तर्क है कि स्टालिन की रणनीति तमिलनाडु को बीजेपी के लिए मुश्किल बनाए रखेगी, जो इस बार एक ही सीट जीत पाई। द्रमुक-अन्नाद्रमुक गठबंधन की इजाजत न देकर उन्होंने बीजेपी नेतृत्व के जनादेश को प्रभावित करने के किसी भी संभावित प्रयास को विफल कर दिया। उन्होंने द्रमुक के गठबंधन सहयोगियों को विजय का समर्थन करने की भी अनुमति दी।
कोयंबटूर के कोंगूनाडु आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज की प्रोफेसर सुमति पद्मनाभन कहती हैं, ‘हार ने उन्हें कमजोर नहीं किया। सत्ता में रहते हुए स्टालिन सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं थे; वह एक जननायक बन गए थे। वह उस समय वैचारिक स्पष्टता, शालीनता और संयम का प्रतीक बन गए, जब भारतीय राजनीति आक्रामक और ध्रुवीकृत होती जा रही थी।’ तमिलनाडु के बाहर, तमाम लोग अब भी स्टालिन को समझ नहीं पाते। सालों तक, राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने उन्हें एक राजनीतिक वंश के अनिच्छुक वारिस के तौर पर देखा- जिसमें पिता करुणानिधि जैसा करिश्मा नहीं था। बोलने के तरीके, उनके हाव-भाव को लेकर उनका मजाक उड़ाया गया। उनमें न तो एमजीआर जैसी स्टार अपील थी और न जयललिता जैसा प्रभावशाली आभामंडल।
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चेन्नई के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पी के श्रीनिवासन कहते हैं, ‘स्टालिन एक धैर्यवान नेता के रूप में उभरे। उन्होंने खौफ के जरिये राज नहीं किया। उन्होंने कभी भी खुद को अपरिहार्य सिद्ध करने की कोशिश नहीं की। उन्होंने दिखावे के बजाय व्यवस्था को प्राथमिकता दी।’
इस लेखक ने जिनसे भी बात की, उनके अनुसार स्टालिन का एक नेता के तौर पर यह बदलाव सबसे पहले कोविड काल के दौरान देखने को मिला। जब कई राज्य बेबस या घबराए हुए थे, स्टालिन के तमिलनाडु ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया, जनकल्याणकारी योजनाओं के वितरण का विस्तार किया और जिला-स्तरीय निगरानी में भारी निवेश किया। अफसरों ने बताया कि समीक्षा बैठकों में स्टालिन असाधारण रूप से बारीकियों पर ध्यान देते और घोषणाओं के बजाय योजनाओं के क्रियान्वयन पर ज्यादा जोर देते।
स्टालिन के साथ काम करने वाले बिहार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘मैंने कई मुख्यमंत्रियों के मातहत काम किया। जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया, वह थी पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं और जलवायु परिवर्तन पर उनकी गहरी समझ। उनके कार्यकाल में वेटलैंड्स को अतिक्रमण से बचाया गया। जंगल का दायरा बढ़ा। जैव विविधता वाले क्षेत्र ज्यादा सुरक्षित हुए।’
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पूरे तमिलनाडु में, 2022 में शुरू की गई ‘चीफ मिनिस्टर ब्रेकफास्ट स्कीम’ स्टालिन की राजनीति के सबसे मजबूत प्रतीकों में से एक बन गई। सरकारी स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चों को ‘पोषक दोपहर भोजन कार्यक्रम’ के अलावा नाश्ता भी मिलने लगा। राज्य के शिक्षकों ने बच्चों की हाजिरी और उनकी रुचि में साफ बदलाव देखा। माता-पिता, खासकर काम करने वाली माताओं ने, इससे बड़ी राहत महसूस की। इसी तरह, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा ऐसा बदलाव साबित हुई जिसे सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। घरेलू कामगारों, नर्सों, मछली बेचने वालों, कपड़ा मजदूरों और छात्रों के लिए रोजाना का सफर आसान हुआ। महिलाओं को आने-जाने की आजादी और आत्मनिर्भरता मिली।
स्टालिन के शासन में कल्याणकारी योजनाओं को आम लोगों के लिए आर्थिक राहत के तौर पर तैयार किया गया था। सब्सिडी केन्द्रित पुरानी राजनीति के विपरीत उन्होंने सामाजिक न्याय को जन आकांक्षा से जोड़ने की कोशिश की। ‘नान मुधलवन’ कार्यक्रम ने छात्रों में कौशल विकास, भाषा प्रशिक्षण और रोजगार पाने की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। निम्न-मध्यम वर्ग के लोग सरकार को अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने में मददगार के तौर पर देखने लगे।
स्टालिन की राजनीति द्रविड़ विचारधारा के आधुनिकीकरण का भी प्रतिनिधित्व करती थी, जिसे तमिलनाडु के बाहर मुख्य रूप से हिन्दी-विरोधी आंदोलनों और क्षेत्रीय अस्मिता के नजरिये से देखा जाता रहा है।
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स्टालिन ने संघवाद, सामाजिक न्याय और बहुलवाद की संवैधानिक भाषा के दायरे में रहते हुए तमिल अस्मिता की राजनीति का विस्तार किया। उन्होंने लगातार कहा कि राज्यों को संघ के भीतर अपनी स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए।
उन्होंने अलगाववादी बयानबाजी का सहारा लिए बिना हिन्दी थोपने का विरोध किया। संवैधानिक राजनीति के लिए प्रतिबद्ध रहते हुए केन्द्रीकरण को चुनौती दी। इसी संतुलन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनाया। स्टालिन ने धर्मनिरपेक्षता के बारे में बेहिचक बात की, जबकि कई नेता तो इस शब्द का इस्तेमाल करने से भी कतराते थे। आरक्षण का बचाव किया और बहुसंख्यकवादी राजनीति की खुलकर आलोचना की, लेकिन किसी भी तरह की गैर-जिम्मेदाराना उकसावे वाली कार्रवाई से भी बचते रहे।
नागरकोइल की महिला अधिकार कार्यकर्ता जेसिका रिचर्ड कहती हैं, ‘उनके कार्यकाल के सबसे अहम पलों में एक था, गैर-ब्राह्मण समुदायों से प्रशिक्षित मंदिर पुजारियों की नियुक्ति। यह कदम बहुत प्रतीकात्मक था। स्टालिन ने इसे धर्म-विरोधी कदम के बजाय जातिगत ऊंच-नीच के विरोध के तौर पर पेश किया, और इस तरह उन्होंने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ द्रविड़ आंदोलन के संघर्ष को आगे बढ़ाया।’ रिचर्ड सरकार के उस शुरुआती फैसले पर भी रोशनी डालती हैं, जिसके तहत ‘पिछली सरकार के दौरान प्रदर्शनकारियों, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के खिलाफ दायर हजारों मुकदमे वापस लिए गए। इनमें स्टरलाइट-विरोधी प्रदर्शन, सीएए-विरोधी प्रदर्शन और पर्यावरण से जुड़े अलग-अलग आंदोलन शामिल थे। संदेश साफ था: एक लोकतांत्रिक देश में विरोध की आवाज को अपराध नहीं माना जाना चाहिए।’
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परिसीमन पर हुई बहसों के दौरान स्टालिन के तर्क तमिलनाडु की सीमाओं से आगे तक गूंजे। उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाया कि जिन दक्षिणी राज्यों ने आबादी पर सफलतापूर्वक नियंत्रण पाया और मानव विकास में निवेश किया, उन्हें परिसीमन में अपनी संसदीय नुमाइंदगी खोकर राजनीतिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने जिस स्पष्टता से इस मुद्दे की अहमियत को सामने रखा, वह बड़ी वजह थी कि सभी दक्षिणी राज्यों ने मिलकर एक साझा मोर्चा बनाया, और एक क्षेत्रीय चिंता राष्ट्रीय बहस का रूप ले सकी।
स्टालिन ने पार्टी, नगर प्रशासन और सांगठनिक राजनीति में दशकों बिताए हैं। एक युवा के तौर पर, आपातकाल के दौरान जेल भी गए थे। कई साल गुमनामी में बिताए, और शीर्ष तक उनका पहुंचना एक दृढ़ राजनीतिक यात्रा की परिणति के रूप में देखा गया। कोयंबटूर के किसान नेता सतीश कुमार कहते हैं, ‘आज भारतीय राजनीति बहुत आक्रामक हो गई है। विपक्षी नेताओं के साथ अक्सर दुश्मनों जैसा बर्ताव किया जाता है। इस पृष्ठभूमि में, स्टालिन का गरिमामय संयम लगभग असाधारण प्रतीत होता है।’
हार में भी, स्टालिन भारत में विपक्षी राजनीति के लिए एक अलग संभावना का प्रतीक हैं। जिस तरह उन्होंने विजय को कमान सौंपी है, वह इसका प्रमाण है।
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