
साल 1960 और 1970 के दशक में चंबल घाटी में अहिंसक बदलाव का एक बहुत बड़ा उदाहरण स्थापित हुआ। इस दौरान सर्वोदय कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों और महात्मा गांधी के अहिंसा के आदर्शों की प्रेरणा से 650 डाकुओं या बागियों ने आत्मसमर्पण किया और अहिंसा की राह को अपनाने की शपथ ली जिसे उनमें से 95 प्रतिशत ने निभाया भी। इसे विश्व स्तर पर अहिंसक बदलाव के सबसे प्रेरणादायक और स्मरणीय उदाहरणों में गिना जाता है। आज चंबल घाटी में चर्चा है कि इस अहिंसक बदलाव की राह पर और आगे बढ़ा जाए।
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चंबल और उसकी सहायक नदियों की घाटी तथा उसके बीहड़ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के एक बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। एक समय यह क्षेत्र डाकुओं की भीषण हिंसा और आतंक के लिए कुख्यात था। यहां के लोग बताते हैं कि उन दिनों गांववासी सूर्यास्त होते ही अपने घरों में बंद हो जाते थे।
वर्ष 1960 में विनोबा भावे की भूदान यात्रा से पहले अनेक सर्वोदय कार्यकर्ताओं और (अवकाश प्राप्त) मेजर जनरल यदुनाथ सिंह ने बीहड़ों में अनेक डाकुओं से संपर्क कर आत्मसमर्पण की पृष्ठभूति तैयार की। उनकी इस यात्रा के दौरान कुछ डाकुओं ने नाटकीय ढंग से समर्पण किया और वे कुछ दिनों तक इस यात्रा में साथ-साथ चले।
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वर्ष 1970 के आसपास मुरैना जिले में जौरा नामक स्थान पर महात्मा गांधी सेवा आश्रम की स्थापना हुई। यह आश्रम आत्मसमर्पण की तैयारियों के लिए एक प्रमुख केन्द्र बन गया। वर्ष 1972 में जयप्रकाश नारायण और उनकी पत्नी प्रभावती यहां आए। उन दिनों जेपी के प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से बहुत अच्छे संबंध थे। जेपी ने उन्हें आत्मसमर्पण के लिए अनुकूल स्थितियां स्थापित करने हेतु सहायता के लिए कहा। इंदिरा गांधी की पहले ही इस अहिंसक समाधान में गहरी रुचि थी। जेपी का संदेश मिलने पर उन्होंने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सहयोग के लिए कहा। वैसे इन मुख्यमंत्रियों और अनेक नेताओं व अधिकारियों ने अपने स्तर पर भी इस प्रयास को सफल बनाने के प्रयास किए।
उधर अनेक सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने पहले ही बीहड़ों में दूर-दूर तक दस्यु गिरोहों से संपर्क करने के लिए दिन-रात एक किया हुआ था। कुछ पहले आत्मसमर्पण कर चुके दस्युओं और बागियों ने भी इस कार्य में बहुत सहायता की। इन सभी प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1972 में समर्पण प्रयासों को उम्मीद से भी अधिक सफलता मिली और 500 से भी अधिक दस्युओं ने आत्म-समर्पण किया। इसके बाद भी कुछ समर्पण हुए और वर्ष 1978 में इनकी संख्या लगभग 650 तक पहुंच गई थी।
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आगे एक बड़ा कार्य यह था कि इन के लिए घोषित पुनर्वास कार्यक्रम ठीक से कार्यान्वित हो, जो परिवार दस्युओं से पहले पीड़ित हुए थे उन्हें भी सहायता मिले, नए सिरे से बदले की कार्यवाहियां न हों और अहिंसक बदलाव के इस प्रेरणादायक प्रयास की सफलता पर आंच न आए।
महात्मा गांधी सेवा आश्रम के संस्थापक एस. एन. सुब्बाराव और उनके सहयोगी जैसे पीवी राजगोपाल और रण सिंह परमार इन सब प्रयासों में लगे रहे और इसके साथ ही यहां के गांवों में जल-संरक्षण, सिंचाई, बीहड़-सुधार, बंधुवा मजदूर रिहाई व पुनर्वास जैसे अनेक अन्य सार्थक प्रयास भी आगे बढ़ाए गए जिससे यहां के लोगों के लिए और विशेष कमजोर वर्ग के लिए विकास की क्षमताएं मजबूत हुईं।
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अब तो खैर आत्मसमर्पण करने वाले अनेक बागियों का देहान्त हो चुका है पर जो उस समय आरंभिक युवावस्था में थे उनमें से अनेक आज भी जीवित हैं। हाल ही में वे महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में एकत्र हुए। उनसे बातचीत करने पर पता चला कि पुनर्वास की राह में कठिनाईयां तो अनेक आईं पर वे अहिंसा की राह पर ही बने रहे, कभी फिर हथियार नहीं उठाया।
उनसे बातचीत करने पर पता चला कि अनेक कठिनाईयों के बावजूद उनमें से अनेक आज सफल किसान हैं और उनका भरापूरा परिवार है। दूसरी ओर एक ऐसे पूर्व बागी भी मिले जो अब भजन-कीर्तन में मस्त रहते हैं। उन्होंने कहा- सब चाहत ही छोड़ दी तो अब मैं बहुत खुश रहता हूं।
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अहिंसा की राह पर निरंतर बने रहने के लिए इन आत्मसमर्पण करने वाले बागियों को सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर पी वी राजगोपाल ने कहा कि अहिंसा का इतना प्रेरणादायक उदाहरण रखने वाली चंबल घाटी को अहिंसक बदलाव के नए उदाहरण भी सामने रखने चाहिए। कुछ कार्यकर्ताओं ने कहा कि आज जो शराब माफिया और खनन माफिया समाज व पर्यावरण की बहुत क्षति कर रहे हैं, उनके विरुद्ध भी अहिंसक संघर्ष होना चाहिए। पूर्व में पुलिस में डीजीपी रहीं अनुराधा बहन अब यहां के शांति प्रयासों से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि जाति, लिंग और धर्म के आधार पर कोई भी हिंसा नहीं होनी चाहिए। यह महात्मा गांधी के सपनों के अनुकूल समाज होगा।
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