शख्सियत

राजकुमार हिरानी : दोस्तों की सटीक सलाह और समाज की कहानियों से गढ़ी बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर दुनिया

‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘पीके’ और ‘संजू’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में राजकुमार हिरानी की ही गढ़ी-बुनी कहानियां थीं।

फोटो: IANS
फोटो: IANS 

कॉलेज और स्टूडेंट्स लाइफ को केंद्र में रखकर कई फिल्में बनीं। लेकिन, राजकुमार हिरानी ने इस जॉनर की फिल्मों को ऐसा ट्रीटमेंट दिया कि कोई भी बॉलीवुड की फॉर्मूला फिल्मों से ऊब चुका दर्शक कहने से पीछे नहीं हटा 'सुबह हो गई मामू'। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘पीके’ और ‘संजू’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में राजकुमार हिरानी की ही गढ़ी-बुनी कहानियां थीं।

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राजकुमार हिरानी एक ऐसे फिल्ममेकर हैं, जिन्हें किसी भागदौड़ का हिस्सा नहीं बनना था, बल्कि समाज और युवाओं के उस पहलू को सबके सामने रखना था, जिसे सबने कहीं न कहीं जिया।

मजे की बात है कि इतनी सुपरहिट फिल्में देने वाले फिल्मकार राजकुमार हिरानी को अपनी फिल्मों के सही और खराब होने का जवाब अपने खास दोस्तों से ही मिलता था। उनके पास ऐसे दोस्त थे, जो आम पब्लिक की तरह एकदम सटीक रिव्यू देते थे। इस बात का खुलासा खुद राजकुमार हिरानी ने एक इंटरव्यू में किया था।

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उन्होंने इंटरव्यू में कहा, "मेरा एक नागपुर का दोस्त है, जिसे मैंने अपनी हर फिल्म दिखाई, क्योंकि वह मेरे स्कूल के समय का भी दोस्त है। वह मुझे स्पष्ट बता देता है कि फिल्म में यह सही है या नहीं है। इसी तरह के कुछ और भी दोस्त उनके जीवन में हैं, जो साफ बता देते हैं।"

अपने दोस्तों से जुड़े किस्से बताते हुए राजकुमार हिरानी ने कहा, ''दोस्त ने बताया था कि उनकी जिंदगी में पहली बार बेटे ने एयरपोर्ट पर उनका बैग उठाया था। जो कहीं न कहीं वो फिल्म से जुड़ी स्टोरी कनेक्ट हुई थी।"

उन्होंने आगे बताया, "एक दूसरे दोस्त ने उन्हें मैसेज भेजा था और कहा था कि काश हमारी जिंदगी में भी सुनील दत्त (एक फिल्म का जिक्र करते हुए) होते तो शायद हम और कम गलतियां करते।"

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अगर राजकुमार हिरानी की जिंदगी की बात करें तो उनका जन्म 20 नवंबर 1962 को महाराष्ट्र के नागपुर में एक सिंधी परिवार में हुआ।

राजकुमार हिरानी के पिता, सुरेश, भारत-पाक विभाजन के समय सिंध (अब पाकिस्तान) से भारत आ गए थे। उस समय सुरेश महज 14 साल के थे।

उनके पिता ने नागपुर में एक टाइपिंग संस्थान शुरू किया। शुरुआत में उनके पास केवल दो टाइपराइटर थे। कुछ ही महीनों में, उनके पिता प्रतिदिन 16 बैचों में लगभग 1,000 छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे थे। हालांकि, जल्द ही टाइपराइटर्स की जगह कंप्यूटरों ने ले ली और व्यवसाय बंद करना पड़ा।

हालांकि, हिरानी के माता-पिता चाहते थे कि वे चार्टर्ड अकाउंटेंट बनें, लेकिन उनका रुझान रंगमंच और अभिनय की ओर अधिक था। अपने कॉलेज के दिनों में, वे हिंदी रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय रूप से शामिल थे।

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अपने बेटे के अभिनेता बनने के जुनून को देखकर, माता-पिता ने उनके सपने को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किया। परिणामस्वरूप, उन्होंने हिरानी को मुंबई के एक एक्टिंग स्कूल में भेज दिया। हालांकि, वह विद्यालय के माहौल में ढल नहीं पाए और कुछ दिनों बाद अपने घर वापस आ गए।

इसके बाद हिरानी ने पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) में डायरेक्शन कोर्स में प्रवेश लिया। बहुत अधिक आवेदकों के कारण उनके चयन की संभावनाएं कम लग रही थीं। हार मानकर, उन्होंने समझौता किया और एडिटिंग कोर्स चुना।

पढ़ाई पूरी होने के बाद हिरानी ने फिल्म संपादक बनने के लिए मुंबई में कई सालों तक संघर्ष किया। सफलता न मिलने पर, उन्होंने विज्ञापन के क्षेत्र में कदम रखा, जहां उन्होंने धीरे-धीरे खुद को व्यावसायिक विज्ञापनों के निर्देशक के रूप में स्थापित किया। इसके तुरंत बाद उन्होंने खुद कई विज्ञापनों में काम करना शुरू कर दिया।

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बी-टाउन में प्रवेश करने का उनका सपना जल्द ही हकीकत की तरह दिखने लगा, जब डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा ने उन्हें फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' के प्रोमो और ट्रेलर पर काम करने के लिए बुलाया। एक एडिटर के रूप में हिरानी की पहली बड़े बजट की फिल्म 'मिशन कश्मीर' (2000) थी।

हिरानी के निर्देशन में बनी पहली फिल्म, 'मुन्ना भाई एमबीबीएस (2003)' ने उन्हें फिल्मी जगत में पहचान दिलाई। निर्देशक के रूप में उनका सपना उनकी अगली 3 फिल्मों, 'लगे रहो मुन्ना भाई (2006)', 'थ्री इडियट्स (2009)' और 'पीके (2014)' की सफलता के साथ जारी रहा। जहां तक पुरस्कारों की बात है, राजू हिरानी ने 4 राष्ट्रीय पुरस्कार और 11 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।

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