राजनीति

अखिलेश की महिलाओं के बीच जमीन तलाशने की मुहिम

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए वाले समीकरण को आधार बनाया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन में 43 सीटें जीत लीं। इसके पीछे राहुल गांधी के ‘संविधान बचाओ अभियान’ की भी बड़ी भूमिका थी।

अखिलेश की महिलाओं के बीच जमीन तलाशने की मुहिम
अखिलेश की महिलाओं के बीच जमीन तलाशने की मुहिम फोटोः सोशल मीडिया

ममता गौतम घरेलू कामगार हैं, किसान हैं और आंदोलनकारी भी। दलित समाज से ताल्लुक रखने वाली ममता अपनी जमीन बचाने के लिए अडानी के खिलाफ चल रहे आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं। जीवन-यापन के लिए वह दूसरों के घरों में घरेलू सहायक के तौर पर काम करती हैं। ममता उन 26 महिलाओं में हैं जिन्हें 22 मार्च को लखनऊ में समाजवादी पार्टी मुख्यालय में मूर्ति देवी-मालती देवी सम्मान से नवाजा गया। मूर्ति देवी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की दादी और मालती देवी मां थीं। सम्मान पाने वालों की सूची में शामिल महिलाओं में पिछड़े-दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) समाज की प्रधानता नजर आती है।

सम्मान प्राप्त करने वाली सुनैना देवी मुसहर समाज से आती हैं। उनकी शादी बचपन में ही हो गई थी और वह पढ़ नहीं पाईं। इसके बावजूद उनके प्रयासों से मुसहर समाज के सैकड़ों बच्चे स्कूली शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। कार्यक्रम की संयोजक वंदना मिश्रा बताती हैं कि ‘सुनैना देवी की राह आसान नहीं थी। उनके साथ मारपीट की गई, उन्हें हिंसा झेलनी पड़ी। फिर भी, वह पीछे नहीं हटीं।’ ममता गौतम और सुनैना देवी- जैसी महिलाओं की मुख्यधारा में कोई चर्चा इसलिए नहीं होती क्योंकि उनकी नेटवर्किंग नहीं है।

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दरअसल, 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों से अखिलेश यादव को पक्का हो गया है कि पीडीए (पिछड़ा, दलित और माइनॉरिटी) का उनका सामाजिक समीकरण यूपी विधानसभा चुनाव में भी सियासी हवा का रुख मोड़ सकता है। अखिलेश यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रतिनिधित्व की बात आएगी, तो वह पिछड़ों-दलितों में महिलाओं को मौका देने में पीछे नहीं हटेंगे।

29 मार्च को गौतमबुद्धनगर के दादरी में हुई समाजवादी समानता भाईचारा रैली से यूपी चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए भी अखिलेश ने कहा कि ‘पीड़ा ही वह धागा है, जो पीडीए के लोगों को एक सूत्र में बांधता है। एक तरफ अहंकारी लोग हैं, जो उपेक्षा और उत्पीड़न करते हैं और दूसरी ओर उत्पीड़ित और उपेक्षित लोग हैं। ऐसे कमजोर और गरीब लोग हर जात-धर्म में होते हैं। जिसने अत्याचार, भेदभाव और उत्पीड़न की पीड़ा नहीं झेली है, वे हमदर्दी तो दिखा सकते हैं लेकिन उस दर्द को महसूस नहीं कर सकते, जो हमारे घर को गंगाजल से धुलवाने पर हमको हुआ था, या मंदिर धुलवाने पर जो हमने महसूस किया था।’

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2017 में सपा की हार के बाद मुख्यमंत्री आवास में योगी आदित्यनाथ के प्रवेश से पहले उसे गंगाजल से धुलवाया गया था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कन्नौज स्थित शिव मंदिर में एसपी प्रमुखअखिलेश यादव के दर्शन करने के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उसे गंगाजल से धुला था।

अखिलेश अपनी मुहिम में जरा भी असमंजस में नहीं दिखते। हाल में पार्टी ने अपनी दिवंगत सांसद फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी निषाद को यूपी समाजवादी महिला सभा की कमान सौंपी है। इससे पहले 2024 लोकसभा चुनाव में पीडीए वाले सामाजिक-राजनीतिक समीकरण को उन्होंने आधार बनाया और 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में 43 सीटें जीत लीं। इसके पीछे राहुल गांधी के ‘संविधान बचाओ अभियान’ की बड़ी भूमिका थी, लेकिन अखिलेश ने टिकट बंटवारे से लेकर सांगठनिक प्रतिनिधित्व के मामले में विभिन्न सामाजिक वर्गों को अपने मंतव्य के बारे में किसी भी तरह का शक-सुबहा नहीं होने दिया।

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दादरी की रैली में अखिलेश ने सत्ता में आने पर स्त्री सम्मान समृद्धि योजना के तौर पर गरीब महिलाओं को 40 हजार रुपये सालाना देने और समाजवादी महिला पेंशन योजना फिर से शुरू करने की बात कही। साथ ही 1090 हेल्पलाइन को और बेहतर बनाकर महिलाओं को सुरक्षा देने की बात की। महिला सम्मान समारोह में अखिलेश यादव के साथ काम कर चुके पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन ने 1090 हेल्पलाइन, डॉयल 100, साइकिल वितरण, आशा ज्योति योजना के साथ मुलायम सिंह के कार्यकाल में शुरू हुई कन्या विद्याधन योजना की बात की और गिनाया कि समाजवादी पार्टी ने किस तरह महिलाओं की सुरक्षा और उत्थान के लिए काम किया है।

वरिष्ठ पत्रकार कुमार भावेश चंद्र कहते हैं कि नौ साल सत्ता में रहने के बाद भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में आत्मविश्वास नहीं है कि वह सकारात्मक बातें करके वोट मांग लें- वह भाषण के पांचवें-सातवें मिनट में पिछली सरकारों के दौरान की कानून व्यवस्था की बात करने लगते हैं, जबकि अखिलेश यादव को लगता है कि पीडीए के नाम पर महिलाएं भी उनसे जुड़ी हैं, इसलिए वह आधी आबादी की बात करते हैं।

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अखिलेश जानते हैं कि यूपी विधानसभा की 403 सीटों के चुनाव में महिला वोट कितने निर्णायक हैं, इसलिए उन्होंने महिला वर्ग के बीच अपने इंन्फ्लुएंसर/लीडर स्थापित करने शुरू कर दिए हैं। मेरठ सपा के जिला उपाध्यक्ष संदीप यादव कहते हैं कि लीडर या इंन्फ्लुएंसर के तौर पर महिला मतदाताओं के बीच भेजे जाने वाले लोगों की संख्या दिनों दिन बढ़ाए जाने की योजना है। सम्मान समारोह में मौजूद उदय प्रताप सिंह ने अपने भाषण में याद भी किया कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में एक दलित महिला की लड़ाई लड़ते हुए पहली बार जेल गए थे और मूर्ति देवी-मालती देवी पुरस्कार से सम्मानित महिलाओं की पृष्ठभूमि देखें तो वह ज्यादातर पिछड़े-दलित तबके से आती हैं।

दरअसल, माना जाने लगा है कि चुनावों में महिलाएं लाभार्थी वर्ग के तौर पर जाति-धर्म से ऊपर उठकर बीजेपी को वोट दे रही हैं। लोकनीति-सीएसडीएस पोस्ट पोल सर्वे 2022 के मुताबिक भी, महिला मतदाताओं के बीच बीजेपी को सपा गठबंधन के मुकाबले 13 प्रतिशत की बड़ी बढ़त मिली। जाति और समुदाय के लिहाज से बीजेपी के पक्ष में सबसे बड़ा लैंगिक अंतर कथित उच्च जातियों में देखने को मिला, जहां महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में (90 प्रतिशत बनाम 83 प्रतिशत) बीजेपी का अधिक समर्थन किया। ग्रामीण महिलाओं के बीच भी बीजेपी को सपा के मुकाबले कहीं अधिक बढ़त मिली, और इस वर्ग के बीच दोनों पार्टियों को मिले वोट में 16 प्रतिशत अंक का अंतर रहा।

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वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि महिलाओं में यह बोध ज्यादा शिद्दत से होता है कि वह दलित, पिछड़ी या अमुक जाति की हैं। समाज में स्त्री के पति की जो स्थिति होती है, उसकी दोहरी मार स्त्री झेलती है। दलित वर्ग की महिलाओं में यह स्पष्ट दिखता है। वह बीते जमाने की डोला प्रथा का उदाहरण देती हैं। महिलाओं के मामले में प्रोफेसर वर्मा इस बात से सहमति जताती हैं कि पीड़ा एक ऐसी चीज है, जो उन्हें एकसूत्र में बांध सकती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस वर्ग में है?

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