साहित्य अकादमी में चलता है ‘पुरस्कार रैकेट’, इस्तीफे से ससुर से दामाद तक को नामित करने का खेल उजागर

जानकार बताते हैं कि पिछले सालों में विकसित स्वार्थ-समूह साहित्य अकादमी के नियम कायदों से खुल कर खेलते रहे हैं। इस खेल में भाषायी प्रतिनिधि और अकादमी से मान्यता प्राप्त भाषायी संस्थाएं खुलकर इनका साथ देती हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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सुकांत नागार्जुन

साहित्य अकादमी के पुरस्कार में ‘रैकेट’ सक्रिय है। पुरस्कार की घोषणा के पहले ही यह बात फैल जाती है कि यह किसे मिल रहा है। इस शिकायत को आधिकारिक स्वरूप देते हुए साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी में मैथिली के प्रतिनिधि और इस भाषा-साहित्य की परामर्शदातृ मंडल के संयोजक डॉ. प्रेम मोहन मिश्र ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह ऐतिहासिक काम इन्होंने उसी दिन किया जिस दिन साल 2019 के लिए अकादमी पुरस्कारों की घोषणा की गई। अकादमी के इतिहास की अपने ढंग की शायद यह पहली घटना है, मैथिली में तो अभूतपूर्व है ही।

डॉ. मिश्र ने अपने पदत्याग की जानकारी अकादमी को उसी दिन ई-मेल से दे दी। हालांकि, इस बारे में अकादमी ने अब तक फैसला नहीं लिया है। उम्मीद है कि इस मसले पर फरवरी के अंतिम सप्ताह में विचार किया जाएगा। उन दिनों अकादमी की ओर से ‘साहित्य उत्सव’ का आयोजन होगा। इससे पहले कार्यकारिणी की बैठक होगी जिसमें डॉ. मिश्र के इस्तीफे की पेशकश और मैथिली के अगले प्रतिनिधि का चयन किया जाएगा और उस पर सामान्य परिषद से मंजूरी ली जाएगी।

हालांकि इस्तीफे की मंजूरी के बावजूद डॉ मिश्र अकादमी की सामान्य परिषद के सदस्य बने रहेंगे, क्योंकि उन्होंने अपनी यह हैसियत छोड़ी नहीं है। कुछ वर्ष पहले साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित मैथिली के इस ‘गैर-साहित्यिक’ प्रतिनिधि को मनाने की भरपूर कोशिश हुई, जो अब भी जारी है। उनके ‘मेंटर’ ने नए सिरे से फिर उन्हें भरोसे में लेने की कोशिश की, पर सारा कुछ अब तक निष्फल ही रहा। वह अपने इस्तीफे पर कायम हैं।

बहरहाल, रसायन विज्ञान के प्राध्यापक डॉ. प्रेम मोहन मिश्र ने अपने इस्तीफे में लिखा है कि पुरस्कार के चयन में पूरा ‘रैकेट’ सक्रिय है। उन्होंने लिखा है कि पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चयन और उसका निर्णय गुप्त प्रक्रिया के तहत होना चाहिए (अकादमी के नियम भी यही कहते हैं और दिखाने के लिए ऐसा ही होता है)। पुरस्कार के निर्णायक मंडल के नाम भी गुप्त रखे जाते हैं। पर, इस बार जूरी के नाम पहले ही सार्वजनिक हो गए। यहां तक कि किसे पुरस्कार मिलेगा, यह भी पहले ही सामने आ गया था।

उन्होंने मैथिली के पुरस्कार को स्थगित करने के लिए दस दिसंबर को ही सचिव को लिखा, पर, इस आधिकारिक जानकारी के बावजूद अकादमी की ओर से पुरस्कृत पुस्तक और लेखक के नाम की घोषणा कर दी गई। पिछले साल भी गड़बड़ी हुई थी। पुरस्कार के लिए चयनित पुस्तक के प्रकाशक जूरी में शामिल थे। डॉ. मिश्र ने उक्त सज्जन को जूरी से हटाने के लिए सचिव से कहा था, पर उनकी बात को महत्व नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि पुरस्कार की मानक प्रक्रिया को अकादमी के कार्यालय ने पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। वह बतौर प्रतिनिधि कुछ कर ही नहीं सकते, तो फिर रहकर क्या करें।

डॉ. मिश्र के इस कदम का सीधा असर कुमार मनीष अरविंद पर पड़ा। इस बार अकादमी पुरस्कार मैथिली के इस साहित्यकार को ही उनके कविता संग्रह ‘जीवनक ओरियौन करैत’ (जिंदगी के इंतजाम में) को मिला है। पर प्रतिनिधि के ‘पुरस्कार-रैकेट बम विस्फोट’ ने अकादमी पर काबिज माफियागिरी को ही चर्चा का मुख्य विषय बना दिया।

मैथिली का यह दुर्भाग्य नया नहीं है। पिछले दो दशक से या उससे और अधिक समय से इस भाषा-साहित्य के दर्जनों महत्वपूर्ण साहित्यकार एकाधिक कारणों से साहित्य अकादमी पर काबिज ‘गैर साहित्यिक कारोबारियों’ के शिकार हो चुके हैं। इन तत्वों के खिलाफ कोई डेढ़ दशक पहले मैथिली के दर्जनों युवा साहित्यकारों ने अकादमी मुख्यालय पर धरना तक देने की कोशिश की थी। तब बड़ा हंगामा हुआ था (उस आंदोलन के कई नेता अब इन ‘गैर साहित्यिक कारोबारियों’ के मददगार बन गए हैं)।

डॉ प्रेम मोहन मिश्र ने ऐसा कठोर कदम क्यों उठाया? इस प्रश्न के उत्तर के दो पाठ बताते हैं और दोनों के बीच गहरे अंतःसंबंध हैं। पहली बात यह कि अकादमी के विभिन्न पुरस्कारों के लिए पुस्तक और साहित्यकार ही नहीं, इनके जूरी के पैनल तक के चयन में अपनी उपेक्षा से डॉ. मिश्र आहत रहे हैं। उन्होंने अपने त्याग-पत्र में जिस पिछले पुरस्कार की चर्चा की है, उसमें भी उनकी मर्जी के विपरीत किसी ‘अज्ञात शक्ति’ ने जूरी के पैनल को अंतिम रूप से बदलवाया और पुरस्कृत पुस्तकों का चयन करवाया। उन्होंने अपनी उपेक्षा से आहत होकर ही उस वक्त जूरी के गठन पर सवाल उठाया था। पर, जैसा कि वह खुद मानते हैं, उनकी आपत्ति को दरकिनार कर दिया गया।

दूसरा पाठ, इस बार भी जूरी में शामिल ‘साहित्यकार/विद्वानों’ के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी (नियम के मुताबिक होनी भी नहीं चाहिए), पर अकादमी के तंत्र से बाहर के एक ‘माफिया तत्व’ (और उसके जरिये मैथिली साहित्यजगत) को सारा कुछ पता था। फिर, वह जिस साहित्यकार को इस पुरस्कार से सम्मानित करवाना चाहते थे, उसकी पुस्तक की उक्त दबंग ‘माफिया’ के कारण उपेक्षा कर दी गई। जूरी के ‘अज्ञात/अल्पज्ञात विद्वानों’ का समूह उस माफिया तत्व को झेल नहीं सका। फिर तो जो होना था, वही हुआ- जीत माफिया तत्व की हुई।

हालांकि पुरस्कार चयन समिति की बैठक में प्रतिनिधि की हैसियत से डॉ. मिश्र मौजूद थे। उन्होंने इस निर्णय के संबंध में अपनी बात भी रखी। पर उस पर कौन ध्यान देता है। सबको मालूम है ‘जन्नत की हकीकत’। सभी जानते हैं, डॉ. मिश्र कैसे साहित्य अकादमी में मैथिली के प्रतिनिधि की कुर्सी तक पहुंचे। सभी जानते हैं, किन ताकतों की बदौलत वह साहित्यकार बने। लोग यह भी जानते हैं कि वह कैसे पुरस्कार से सम्मानित हुए। इन सच्चाई के बावजूद प्रेम मोहन मिश्र इन बातों से- अपनी उपेक्षा से- भीतर ही भीतर सुलग रहे थे। सो, इसने आग में घी का काम किया।

मैथिली साहित्य जगत फरवरी के उत्तरार्द्ध की प्रतीक्षा कर रहा है जब प्रेम मोहन मिश्र के इस्तीफे पर साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी विचार करेगी। अपने इस्तीफे में उन्होंने अकादमी के अंदर सक्रिय स्वार्थी-समूहों को लपेटे में लिया है। उनके त्याग-पत्र ने अकादमी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसमें संकेत किया गया है कि अकादमी की मौजूदा व्यवस्था साहित्य में शुचिता से अधिक सड़ांध पैदा कर रहा है। साहित्य से अधिक साहित्य के कारोबारियों-माफिया तत्वों का यह हित साध रहा है।

पुरस्कार के ‘रैकेट’ के बारे में जब सचिव को जानकारी थी तो फिर उन्होंने क्या किया, यह सवाल कोई भी कर सकता है। सवाल यह भी कोई कर सकता है कि यदि ऐसा है, तो अकादमी का पूरा तंत्र क्या कर रहा है? सचिव तो एक मोहरा भी हो सकता है, वहां फैल रही सड़ांध का प्रतीक भी और अकादमी में सक्रिय तंत्र का एक पुर्जा भी। वह क्या है? यह कोई कैसे बता सकता है। वस्तुतः अकादमी के नियम-कायदों के जानकार बताते हैं कि पिछले सालों में विकसित स्वार्थ-समूह अकादमी के नियम-कायदों से खुल कर खेलते रहे हैं। इस खेल में भाषायी प्रतिनिधि और अकादमी से मान्यता प्राप्त भाषायी संस्थाएं खुलकर इनका साथ देती हैं।

मैथिली का अनुभव है कि प्रतिनिधियों के कारण नई संस्थाओं को मान्यता नहीं मिल रही है और जिन संस्थाओं को मान्यता हासिल हैं, वे जेबी-संगठन में तब्दील हो गई हैं या हो रही हैं। साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद का पांच साल में गठन होता है। इसके लिए सरकारों के नुमाइंदों के अलावा विभिन्न भाषाओं की मान्यता प्राप्त संस्थाओं से भी नाम मांगे जाने का नियम है। सो, इन संस्थाओं से नाम भिजवाने के नाम पर ही सौदेबाजी शुरू हो जाती है। कारण इन नामों में से ही किसी को सामान्य परिषद का साथ-साधन का कारक होता है।

यहीं असली खेल है। इसी पैनल के नाम में किसी को बहिर्गामी भाषाई प्रतिनिधि सामान्य परिषद के किसी एक को नामित करता है, जो भाषाई प्रतिनिधि की कुर्सी तक जाता है। इसी प्रक्रिया के कारण प्रतिनिधि नाम का साहित्यकार- प्राणी कभी अपने ससुर को नामित कर देते हैं, तो कभी ससुर अपने दामाद को, समधी को, किसी साहित्यिक महंथ को, ठेकेदार को। फिर साहित्य अकादमी के मैदान में स्वार्थ का खेल निर्बाध चलता रहता है।

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