पुस्तक चर्चा: एआई तो ठीक है, पर रोजगार का क्या होगा?
एआई के गॉडफादर माने जाने वाले कंप्यूटर वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन ने भी चेतावनी दी है कि “एआई बेरोजगारी बढ़ाएगा, और लाभ को और अधिक बढ़ाएगा।" उनका कहना है हालांकि बड़े पैमाने पर छंटनी अभी तक नहीं हुई है, पर एआई पहले से ही शुरुआती स्तर के अवसरों को कम कर रहा है।

(अभी 16 से 20 फरवरी तक दिल्ली में एआई सम्मेलन हुआ जिसमें 20 से अधिक देशों के लोगों ने भाग लिया। लेकिन उससे काफी पहले से ही) हर दिन हम ऐसी कहानियां पढ़ते हैं या वीडियो देखते हैं जिनमें बताया जाता है कि किस तरह से रोबॉट हमारे बहुत सारे काम और फुर्सत के समय पर कब्जा किए जा रहे हैं।... ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अप्रैल 2025 में एक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे रोबॉट बेंगलुरु में नौकरानियों की जगह ले रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मनीषा नामक एक गृहिणी ने बताया कि रोबॉट के आने के बाद से उनके बाहर खाने के दिन कम हो गए हैं, और उनकी ढाई साल की बेटी नक्षत्रा रोबॉट द्वारा तैयार किया गया पोहा, पाव भाजी और राजमा मसाला के साथ चावल मजे से खाती है। मनीषा गर्व से बताती हैं कि उनका रोबॉट ‘माय किचन रोबॉट’ सब्जियां काट सकता है, भून सकता है, तल सकता है, उबाल सकता है और आटा गूंथ सकता है। ...
युवा अपने होमवर्क में मदद के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ऐप्स का उपयोग करने लगे हैं, निवेशक अपने व्यवसाय में मदद के लिए एआई का उपयोग करते हैं। ...
नवंबर 2022 में ओपन एआई द्वारा चैटजीपीटी की रिलीज ने एआई को हर घर तक पहुंचा दिया। कुछ लोग एआई से अपनी छुट्टियां प्लान करने के लिए कह रहे हैं, तो कुछ लोग अंग्रेजी न जानते हुए भी जादुई रूप से अंग्रेजी में ईमेल लिख रहे हैं। एक मामले में तो मजदूरों ने चैट जीपीटी से ही पूछ लिया कि क्या वे श्रम न्यायालय में वर्षों से लंबित अपना मामला जीतेंगे।...
सरकार के पास पहले से ही रोबॉटिक्स पर एक राष्ट्रीय रणनीति मसौदा तैयार है जिसे 2023 में सार्वजनिक रूप से रखा गया था। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय रोबॉटिक्स के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है। एक राष्ट्रीय रोबॉटिक्स मिशन और एक राष्ट्रीय एआई मिशन स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मिशन उन प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करेगा जो “स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृषि, स्मार्ट शहरों और बुनियादी ढांचे, जिसमें स्मार्ट गतिशीलता और परिवहन शामिल हैं,” जैसे क्षेत्रों में सामाजिक जरूरतों को पूरा करने में भारत को लाभान्वित करेंगे। कैबिनेट ने मार्च 2024 में राष्ट्रीय एआई मिशन को पांच वर्षों के लिए ₹10,371.92 करोड़ के बजट परिव्यय के साथ मंजूरी दे दी है।
पर इन नई प्रौद्योगिकियों के आने से जो मुख्य सवाल खड़ा होता है, वह यह है कि हमारे कामकाजी जीवन पर इन प्रौद्योगिकियों का क्या असर पड़ेगा? ... एक तरफ सरकार लगातार एआई और रोबॉट को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर अधिक-से-अधिक लोग अपनी नौकरियां खो रहे हैं। टीसीएस, इंफोसिस, टेक महिन्द्रा और विप्रो सहित प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों ने चुपचाप अपने कार्यबल का पुनर्गठन करना शुरू कर दिया है और 50,000 से अधिक लोग पहले ही अपनी नौकरियां खो चुके हैं।
कई लोग तर्क देते हैं कि पिछली तीन औद्योगिक क्रांतियों के दौरान जो भाप, बिजली और डिजिटल प्रौद्योगिकियों द्वारा संचालित थीं, लोगों को विस्थापित किया गया और व्यवधान उत्पन्न हुआ, लेकिन आखिरकार बहुत सारी नौकरियां पैदा हुईं। और उनका कहना है कि इस बार भी ऐसा ही होगा। हालांकि, एक तर्क यह भी है कि अन्य तकनीकी क्रांतियों और चौथी औद्योगिक क्रांति के बीच मौलिक अंतर यह है कि इसमें संभावना है कि रोबॉट मनुष्यों को प्रतिस्थापित कर देंगे। यह अंततः मजदूरों के बिना उद्योग और रोजगार के बिना विकास की ओर ले जाएगा।
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1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा पारित की। घोषणा का अनुच्छेद 23 कहता हैः “प्रत्येक व्यक्ति को काम करने का, स्वतंत्र रूप से रोजगार की पसंद का, काम की न्यायसंगत और अनुकूल परिस्थितियों का और बेरोजगारी से संरक्षण का अधिकार है।”
और 1950 में भारत के संविधान ने इस अधिकार को राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया। अनुच्छेद 41 कहता हैः “राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने, शिक्षा पाने और बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी और अक्षमता तथा अन्य अवांछित अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा।”
अधिकांश श्रम कानूनों ने इन सिद्धांतों को अपनाया और भले ही कानूनों का उल्लंघन किया गया हो, पर कानून स्वयं ट्रेड यूनियन आंदोलन के हाथों में अधिकारों की रक्षा करने का एक हथियार था। लेकिन अब नई श्रम संहिता और ‘श्रम शक्ति नीति 2025’ सामूहिक सौदेबाजी के उस मूल अधिकार को कमजोर करने की कोशिश करती है, जिसके द्वारा मजदूर खुद को यूनियनों में संगठित कर सकते थे और अपनी कामकाजी परिस्थितियों में सुधार के लिए लड़ सकते थे।
नई श्रम नीति में नए एआई-संचालित प्रौद्योगिकियों के लिए न्यायसंगत संक्रमण (जस्ट ट्रांजीशन) के मुद्दे को नजरंदाज किया गया है।
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मारुति सुज़ुकी अस्थायी मजदूर यूनियन द्वारा मई 2025 में जारी एक पैम्फलेट के अनुसार, “सुज़ुकी वर्तमान में 34,918 मजदूरों को रोजगार देती है, जिनमें से केवल 18 प्रतिशत स्थायी हैं, 40.72 प्रतिशत ठेका मजदूर हैं, 21.6 प्रतिशत अस्थायी मजदूर हैं, 21 प्रतिशत प्रशिक्षु और अपरेंटिस हैं। विशाल अस्थायी कार्यबल एकसाथ मिलकर कुल कार्यबल के 80 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा बनाते हैं।”
ये आंकड़े “भारत के ऑटोमोटिव क्षेत्र में कार्य का भविष्य” पर प्रस्तुत एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों से मेल खाते हैं। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि “मूल उपकरण निर्माता और टियर1 वेंडरों का स्थायी मजदूरों के अनुपात में गैर-मानक रोजगार का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें शॉप फ्लोर पर अधिकांश काम गैर-मानक रोजगार वाले मजदूरों द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए, मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड (एमएसआईएल) जैसे एक प्रमुख मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) के मानेसर प्लांट में 65 प्रतिशत गैर-मानक रोजगार वाले मजदूर उनके फ्लोर पर नियुक्त थे, और एक दूसरे टियर1 ऑटो कंपोनेंट निर्माता, मुंजाल किरियू के प्लांट में ये 70 प्रतिशत थे। इसमें प्रशिक्षुओं और अपरेंटिस की संख्या शामिल नहीं है, जो ओईएम में 8 प्रतिशत तक पाए गए हैं।”...
जब मारुति के अस्थायी मजदूरों को पता चला कि मारुति सुज़ुकी ने हरियाणा के सोनीपत में खरखौदा में एक विशाल नया प्लांट खोला है, तो उन्होंने कारखाने में नौकरियों की मांग करना शुरू कर दिया। लेकिन उन्हें यह जानकर झटका लगा कि नएा प्लांट में, जो अपनी पहली इलेक्ट्रिक कार बनाने के लिए पूरी तरह तैयार था, कोई स्थायी मजदूर नहीं था।
इस समय तक, नई श्रम संहिता लागू हो चुकी थी, जिसने प्रबंधन को निश्चित अवधि के रोजगार (एफटीई) के लिए मजदूरों को नियुक्त करने की अनुमति दे दी। दूसरे शब्दों में, कोई विस्थापन या छंटनी नहीं होगी क्योंकि स्थायी नौकरियों की मांग उठाने के लिए कोई स्थायी मजदूर या ट्रेड यूनियन ही नहीं होंगे।
मजदूरों को पहले यह एहसास नहीं हुआ था कि रोबॉट ने उनकी नौकरियां चुरा ली हैं। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यह एहसास होने लगा कि नई प्रौद्योगिकियों ने न केवल उनकी नौकरियां, बल्कि उनके कठिनाई से जीते गए अधिकार भी चुरा लिए थे।
जो मजदूर अभी भी मजदूरों को संगठित करते हैं, गिग वर्कर्स के अधिकारों और अस्थायी मजदूरों के लिए लड़ते हैं, वे जानते हैं कि लड़ाई अंततः प्रौद्योगिकी के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ है जो लोगों से भी ऊपर मुनाफे को रखती है। यह कुछ ऐसा है जिसे नोबेल पुरस्कार विजेता कंप्यूटर वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन जिन्हें एआई का गॉडफादर” कहा जाता है, ने भी स्वीकार किया है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेरोजगारी बढ़ाएगा जबकि लाभ को और अधिक बढ़ाएगा, जिसके लिए वह पूंजीवाद को जिम्मेदार मानते हैं, न कि प्रौद्योगिकी को। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि बड़े पैमाने पर छंटनी अभी तक नहीं हुई है, पर एआई पहले से ही शुरुआती स्तर के अवसरों को कम कर रहा है... उन्होंने दीर्घकालिक जोखिमों के बारे में भी आगाह किया। उनके अनुमान से 10-20 प्रतिशत संभावना है कि एआई अपने अनियंत्रित सुपरइंटेलिजेंस या दुर्भावनापूर्ण तत्वों का दुरुपयोग कर लोगों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है। साथ ही उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में कमजोर नियामक प्रयासों की भी आलोचना की।”
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(नंदिता हक्सर प्रसिद्ध अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।)
किताब का नाम : फैक्टरी से फुटपाथ तक: रोबोट के दौर में सुजुकी के मजदूर
लेखिका : नंदिता हक्सर
अनुवाद : रश्मि चौधरी
पृष्ठ संख्या : 252
पेपरबैक मूल्य : ₹ 475
प्रकाशक : आकार बुक्स