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पुस्तक समीक्षा: उपन्यास के रूप में निराश करती है ‘एक सच्ची झूठी गाथा’

‘एक सच्ची-झूठी गाथा’ एक उपन्यास नहीं बल्कि एक अच्छी लघु कथा या नाटक हो सकता था।क्योंकि, उपन्यास में कोई लम्बी कहानी नहीं है, न ही कोई ख़ास किरदार, बल्कि एक सिचुएशन है।

फोटो : विपिन

प्रगति सक्सेना

अलका सरावगी हिंदी के गणमान्य उपन्यासकारों में मानी जाती हैं। साल 2000 के आसपास जब उनका पहला उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाई पास’ आया था, तो हिंदी साहित्य जगत में वे खासी चर्चा का विषय बन गयी थीं। उनके लेखन की खासियत थी कहानी कहने की उनकी जटिल शैली, जिसके ज़रिये वे एक साथ कई स्तरों पर कहानी और किरदारों को बुनती हैं। हाल ही में अलका सरावगी का नया उपन्यास आया है- एक सच्ची-झूठी गाथा। ज़ाहिर है, इस उपन्यास से भी उम्मीदें थीं कि उनके कथा-शिल्प के नए तेवर इसमें भी नज़र आयेंगे। लेकिन अफ़सोस, यह उपन्यास निराश करता है।

उपन्यास लेखन में उत्तर आधुनिकता की चाहें कितनी ही बात हो, इस मूल तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उपन्यास मूलतः एक लम्बी कहानी कहता है, जिसमें छोटी-छोटी कहानियां और किरदार मुख्य कथा से बंधे होते हैं। उपन्यास एक एब्सर्ड नाटक की तरह नहीं हो सकता, ना ही वह एक लघुकथा हो सकता है, जिसमें ज़ाहिर है एक छोटी कहानी होती है, उसका पैनोरामा उपन्यास जितना विस्तृत नहीं होता।

‘एक सच्ची-झूठी गाथा’ एक उपन्यास नहीं बल्कि एक अच्छी लघु कथा या नाटक हो सकता था।क्योंकि, उपन्यास में कोई लम्बी कहानी नहीं है, न ही कोई ख़ास किरदार, बल्कि एक सिचुएशन है- एक महिला अपने ई मेल फ्रेंड से पहली बार मिलने के लिए एअरपोर्ट पर उतरती है और उसका इंतज़ार करते हुए उस घटनाक्रम को याद कर रही है, जिसके चलते वह उससे मिलने के लिए इतनी दूर तक चली आई है।

अब इस सिचुएशन पर भी उपन्यास बुना जा सकता था- अगर इस घटनाक्रम में कुछ नए आयाम और किरदार जुड़ जाते। लेकिन ‘एक सच्ची-झूठी गाथा’ महज़ एक महिला और पुरुष के इन्टरनेट संवाद तक ही सीमित रह जाता है। वर्चुअल रियलिटी में होती मित्रता और संवाद इक्कीसवीं सदी के शहरी भारतीयों के जीवन का एक सामान्य अंग बनता जा रहा है। इस ‘वर्चुअल’ यथार्थ की दिलचस्प बात ये है कि यह संवाद और किरदार हो सकता है कि ‘असल’ ना हों। कम्युनिकेशन के इस माध्यम की मदद से आप किसी से भी कुछ ही देर में बहुत आत्मीय हो सकते हैं और जब चाहें तब तत्काल इस संवाद को ख़त्म भी कर सकते हैं। इस अर्थ में यह संवाद का बहुत ‘लगाव विहीन’ माध्यम है- वर्चुअल रियलिटी में आप एक ऐसा रिश्ता कायम करते हैं, जिससे आप कभी भी खुद को अलग और आज़ाद कर सकते हैं।

यह माध्यम इंसानी मानसिकता और यथार्थ के एहसास से लगातार खेलता है। और अगर आप जागरूक ना हों, तो यह आपके असलियत के एहसास पर ज़बरदस्त असर डालता है। बहरहाल, यह उपन्यास सिर्फ इस वर्चुअल रियलिटी में एक औरत और एक मर्द के संवाद पर केन्द्रित है। औरत, जो एक लेखिका है, लगातार पुरुष को जानने की बेतहाशा कोशिश कर रही है, पुरुष, कभी उसके बहुत करीब आ जाता है तो कभी उसे बिल्कुल अजनबी सा लगता है। अंत तक एक अंतहीन संवाद चलता रहता है, जो बीच-बीच में उबाऊ भी हो जाता है। आखिरकार एकाएक यह संवाद ख़त्म हो जाता है और उपन्यास भी।

“‘गाथा, मेरा सच क्या है, यह तुम कभी नहीं जान पाओगी. मेरा सच है तो ज़रूर इसी ब्रह्माण्ड में, पर वह किसी की भी पहुँच के बाहर है। सच पूछो तो कई बार लगता है कि मेरा सच मेरी हथेली की रेखाओं में भी नहीं लिखा। मैं उसे खुद नहीं पढ़ पाता। पीछे देखता हूँ तो सिर्फ धुंध है। उसमें मैं अपने सच रोज़ मिटा कर रोज़ नए सच लिखता हूँ। यही सबसे बड़ा सच है जो मैं तुम्हे अंत में बता रहा हूँ.’” (एक सच्ची-झूठी गाथा’ से)

निराशाजनक तौर पर यह संवाद नितांत एक आयामी रहता है। और ठीक इस संवाद की तरह ना तो आप इस औरत के बारे में कुछ जान पाते हैं, ना ही उस पुरुष के बारे में।

यह एक बौद्धिक विमर्श हो सकता था, सामाजिक-राजनीतिक चिंतन भी- लेकिन बेशक यह उपन्यास नहीं है। यह हमारे समय के लेखन की विडम्बना है- समाज में इतने जटिल रिश्ते, विसंगतियां, तनाव और टूटन होते हुए भी, हमारे उपन्यासों में ऐसी बहुआयामी कहानियां और किरदार दिखाई देना दुर्लभ हो गया है। यह या तो साहित्य का असलियत से पलायन है या फिर हमारे लेखक अपने समाज की असलियत को स्वीकार ही नहीं करना चाहते।

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