हिंदी दिवस विशेष: यह रही है पूरे उपहाद्वीप की भाषा

आज हिंदी दिवस है। इस अवसर पर फ्रांसीसी विद्धान गार्सिया द तासी की पुस्तक के इस अनुवाद को पढ़ना चाहिए, जिससे पता चलता है कि हिंदी तो पूरे उपमहाद्वीप की भाषा रही है। प्रस्तुत हैं इस पुस्तक के कुछ अंश।

नवजीवन
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गार्सा द तासी

हिंदी, हिन्दुस्तानी, उर्दू के विकास को समझने के खयाल से अरबी, फारसी, तुर्क और हिन्दुस्तानी भाषाओं के जानकार फ्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी के व्याख्यानों, लेखों से मदद मिलती रही है। कई दफा उन्होंने इस बात के लिए आलोचना की कि भारतीय लेखक समुचित नाम, रेफरेंस, तारीख आदि नहीं देते जिससे उनका काल क्रमानुसार विवरण देना मुश्किल बन पड़ता है लेकिन उन्होंने उनकी साहित्यिक प्रतिभा की प्रशंसा की और भारतीय साहित्य को निकृष्ट बताने वाले यूरोपीय अफसरों/विद्वानों की आलोचना का उन्होंने जवाब भी दिया।

इस बात से लोग पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं कि हिन्दुस्तानी भारत के सभी प्रांतों में बोली जाती है। बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी-जैसे प्रांतों में यह अन्य प्रांतीय भाषाओं के साथ-साथ बोली जाती है; या फिर हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम के प्रांतों (बिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, अजमेर, आगरा, दिल्ली) में सिर्फ हिन्दुस्तानी ही बोली जाती है।... यह बात आम जानकारी में नहीं है कि भारतीयों के पास वहां के मुख्य शहरों में लिथोग्राफिक छापाखाने हैं और वे वहां प्रतिदिन मौलिक या अनूदित हिन्दुस्तानी रचनाएं प्रकाशित करते रहते हैं। अगर हम सिर्फ उत्तर-पश्चिम प्रांतों की बात करें, तो वहां इस साल (1850) की पहली जनवरी तक 23 छापाखाने मौजूद थे जहां केवल 1849 में ही 141 विभिन्न रचनाएं प्रकाशित हुई थीं। इसी काल में 26 अगल-अगल अखबार प्रकाशित हो रहे थे जिनमें से 23 हिन्दुस्तानी, 2 फारसी और 1 बांग्ला में थे। अगर हम इन अखबारों में उन्हें भी जोड़ दें जो भारत के अन्य प्रांतों में प्रकाशित होते हैं, तो हमें आसानी से कम-से-कम 50 विभिन्न हिन्दुस्तानी अखबार मिलेंगे जो प्रकाशित हो रहे हैं।

(1850 में दिया गया व्याख्यान)

हिन्दुस्तानी हिन्दुस्तान की भाषा है लेकिन वह उसके वास्तविक सरहदों तक ही सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल लगभग पूरे उपमहाद्वीप में होता है, खास तौर से सिपाहियों और मुसलमानों के बीच- फारस, तिब्बत औरआसाम तक। इसलिए शुरुआत से इस भाषा का जो नाम रखा गया... औरजिसे भारतीयों ने बरकरार रखा, वह हिन्दुस्तानी से ज्यादा उपयुक्त है जिसे आम तौर पर यूरोपीय इसे संबोधित करते हैं। वास्तव में यूरोपीय लोग हिन्दी नाम हिन्दुओं के डायलेक्ट के लिए प्रयोग करते हैं तथा हिन्दुस्तानी नाम मुसलमानों के डायलेक्ट के लिए इस्तेमाल करते हैं।... उत्तर की मुस्लिम बोली (हिन्दुस्तानी-उर्दू) को उत्तर-पश्चिम के प्रांतों में आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया है हालांकि हिन्दी वहां उर्दू के साथ-साथ प्रयोग की जाती है, जैसे वह पहले फारसी के साथ इस्तेमाल होती थी। दरअसल, मुस्लिम शासकों के पास एक जमाने में एक हिन्दी सचिव (हिन्दी नवीस) के साथ-साथ एक फारसी सचिव (फारसी नवीस) हुआ करता था और अपने शासनादेशों को वह दोनों भाषाओं में लिखवाते थे।

(1851 में दिया गया व्याख्यान)

साभार: हिंदुस्तानी भाषा और साहित्य 1850-1860; गार्सा द तासी; शोध, मूल फ्रेंच से अनुवाद किशोर गौरव, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य रु. 295/-

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