नेताजी जयंती विशेषः ऐसा था सम्मान, नेहरू ने की थी बोस के परिवार की आर्थिक मदद

1966 के दस्तावेज कहते हैं कि 1965 तक कांग्रेस और ट्रस्ट के जरिए वियना में बोस की बेटी अनिता की मदद की गई। बोस के परिवार को कुछ समय तक 200-300 रुपये (उस समय एक बड़ी रकम थी) भेजा जाता रहा। बाद में अनीता जर्मनी के एक कॉलेज में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर बन गईं।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर उनकी पत्नी एमिली शेंकल को रेडियो से मिली। वो 24 अगस्त, 1945 को वियना में अपने घर पर थीं। रेडियो पर खबर आई कि बोस ताइपेई में एयर क्रैश में मारे गए। पूरा परिवार स्तब्ध रह गया। उनकी बेटी अनिता चार साल की होने वाली थी। जब सुभाष जर्मनी से जापान के लिए निकले थे, तब बेटी तीन महीने की भी नहीं हुई थी। दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने की ओर था, लेकिन उसने यूरोप और खासकर जर्मनी के अधीन आ चुके देशों में हालत खराब की हुई थी। लोग अभावों और असुरक्षा के बीच जीवन गुजार रहे थे।

शेंकल को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो करें तो क्या करें। हालांकि मानसिक तौर पर वो पहले से हर स्थिति के लिए तैयार थीं, लेकिन सुभाष के नहीं रहने की खबर उनके लिए गहरा आघात थी। उनकी शादी सीक्रेट तरीके से हुई थी। अब बेटी को लेकर उन्हें तमाम सवालों से दो-चार होना ही था। घर की आर्थिक स्थिति युद्ध के तत्कालीन हालात के बीच बहुत मुश्किल होती जा रही थी। अब बेटी के साथ उन्हें लंबा जीवन जीना था। घर में एक बूढ़ी और बीमार मां भी थीं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और उससे जुड़े देशों में विधवाओं और पिताविहीन बच्चों की संख्या खासी ज्यादा हो चली थी।

शेंकल उस समय खुद भी केवल 34 साल की थीं। दूसरी शादी करने के कई प्रस्ताव उनके सामने आए। इसे लेकर कई तरह के दबाव भी झेलने पड़े, लेकिन वो टस से मस नहीं हुईं। उनका मानना था कि सुभाष के बाद उनकी जिंदगी में अब कोई नहीं आ सकता। वो जीवन भर सुभाष की यादों और उनकी बेटी के साथ ही जीती रहीं। एमिली मजबूत चरित्र और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं। जिंदगी ने उन्हें संघर्ष ही दिया, लेकिन वो डटी रहीं। जिंदगी तो चलनी ही थी। उन्हें पोस्ट ऑफिस में नौकरी मिल गई।

लेकिन युद्ध के बाद वियना सामान्य नागरिकों के लिए मुश्किल जगह थी। खाने के सामानों की किल्लत थी। बेटी को कई हफ्तों तक दूध नहीं मिल पाता था। एमिली के परिवार की हालत वाकई खराब थी। 1952 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भतीजे अमीय नाथ ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को संबोधित करते हुए पत्र लिखा, “मैं समय-समय पर वियना में अपनी आंटी को कुछ छोटी-मोटी रकम भेजता हूं। अगर मैं रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और आस्ट्रियन नेशनल बैंक से रकम भेजता हूं, तो इसमें तमाम पेचिदगियां आती हैं। क्या कोई अलग और आसान व्यवस्था हो सकती है कि कोलकाता में फॉरेन ऑफिस में पैसा दिया जाए और वियना में भारतीय काउंसिल इसी के बराबर रकम आस्ट्रियाई करेंसी में आंटी को पहुंचा दे।”

दो दिनों बाद नेहरू ने संबंधित अफसरों को लिखा, “कृपया फाइनेंस और विदेश मंत्रालय से पता करें कि क्या इस तरह वियना धन भेजा जा सकता है। क्या हम विशेष मामले की तरह इसे मानते हुए धन वियना भेज सकते हैं। हमें इस तरह पैसा भेजकर उनकी मदद करनी चाहिए।” मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने मिलकर रास्ता निकाल लिया। उन्होंने ऐसी व्यवस्था कर दी कि अमीय कोलकाता के विदेश विभाग के आफिस में पैसा जमा करें और ये वियना में एमिली शेंकल तक पहुंच जाए। विदेश विभाग ने अमीय को बता दिया कि वो इस तरह का आसान ट्रांजिक्शन शुरू कर सकते हैं। अमीय के अनुरोध के बाद कुछ दूसरी बातों या मदद का रास्ता भी तैयार हुआ।

नेहरू ने उसी दौरान वियना जा रहे अपनी सरकार के मंत्री आसफ अली से कहा कि वो वहां सुभाष की विधवा और बेटी से मिलें। अली मिले और बताया, “वो एमिली से मिल आए हैं, लेकिन वो सरकार की कोई मदद लेने पर राजी नहीं हैं। हालांकि मैं कोशिश करता हूं कि वो कुछ मदद स्वीकार करने पर तैयार हो जाएं। अगर अपने लिए नहीं, तो बच्ची के लिए ही सही।” हालांकि अब भी ये बात विवाद का विषय बनी हुई थी कि एमिली से सुभाष ने शादी की थी या वो उनकी कंपेनियन थीं। नेहरू का दो टूक जवाब था, “जहां तक हमारी बात है, तो हम उन्हें सुभाष की पत्नी मानते हैं। इसके बाद ये मामला यहीं खत्म हो जाता है।”

शेंकल ने आसफ अली से भविष्य में बच्ची की मदद के लिए कहा। नेहरू का जवाब था, “कोई भविष्य की गारंटी नहीं ले सकता। मैं चाहता हूं कि बच्ची की मदद के लिए उन्हें कुछ धनराशि दी जाती रहे।” इस बारे में शेंकल को आखिरी जवाब देना था। नेहरू ने कहा, “अगर वो तैयार नहीं हों, तो ये मामला वहीं खत्म हो जाएगा।” इस बीच शेंकल के सामने मदद का प्रस्ताव फिर रखा गया, जो इस तरह था, “आपको 100 डॉलर बच्चे के लिए समय-समय पर वियना ऑफिस के जरिए दिए जा सकते हैं। ये धन भारत सरकार की ओर से नहीं, बल्कि उस कांग्रेस पार्टी के जरिए दिए जाएंगे, जिसके आपके पति सदस्य और अध्यक्ष थे और उन्होंने खुद को हमेशा कांग्रेसी माना।”

नेहरू उस समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष थे, उन्होंने इस बारे में कांग्रेस कार्यालयों को बताया। उन्होंने लिखा, ‘मैं सोचता हूं कि हमें उनके लिए 100 डॉलर की व्यवस्था करनी चाहिए और क्रिसमस पर उपहार के रूप में भेजने चाहिए।’ प्रधानमंत्री के आदेश के बाद अक्टूबर 1952 में वियना में भारत के राजनयिक केवी रामस्वामी को आधिकारिक तौर पर सूचना दी गई कि इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया लंदन में आपके नाम एक 100 डॉलर का ड्रॉफ्ट भेजा गया है। प्रधानमंत्री की इच्छा है कि इस धन को आधिकारिक अकाउंट से अलग रखा जाए और इसे मिसेज शेंकल को नकद या उपहार के रूप में दे दिया जाए।

नेहरू केवल यहीं नहीं रुके, उन्होंने वित्तीय मदद के अलावा 15 अगस्त 1952 को विदेश सचिव को पत्र लिखकर पूछा, “क्या ये संभव है कि वियना में हमारे प्रतिनिधि के जरिए सुभाष चंद्र बोस की पत्नी के लिए कुछ चाय भेजी जा सके।” ये व्यवस्था 1953 में एक साल तक चलती रही। उसी समय नेहरू को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर बीसी राय से एक मदद मिली। उन्होंने सुभाष बोस के नाम से एक ट्रस्ट बनाया, जिससे सुभाष की विधवा के जरिए उनकी बच्ची के लिए धन भेजा जा सके।

साल 2016 में नेताजी से संबंधित जो फाइलें केंद्र सरकार ने जारी कीं, उसमें एक तथ्य और था, जिसका प्रचार नहीं हुआ। वो ये था कि नेहरू ने बोस के वियना स्थित परिवार यानी उनकी पत्नी और बेटी को लगातार वित्तीय मदद देने का प्रयास किया। इसके लिए सरकारी स्तर पर बाधाएं दूर की गईं। इन फाइल्स में 1952 से लेकर 1954 तक के वो पत्राचार भी हैं, जो भारत सरकार ने वियना में रह रहे बोस के परिवार से किए थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर जो ट्र्स्ट बनाया गया था, उसके लिए भी धन जुटाया गया। ट्रस्ट ने करीब दो लाख रुपए की एक मोटी धनराशि बैंक में जमा कर दी। इससे दो काम होने थे, पहला काम था सुभाष की बेटी को लगातार आर्थिक मदद। दूसरा काम ये कि जब वो 21 साल की हो जाए, तो उसे पूरी रकम मिल जाए। इस संबंध में नेहरू और बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी राय ने एक करार तैयार किया। इसमें प्रावधान किया गया कि 21 साल की होने पर ये रकम अनिता को मिलेगी, लेकिन अगर इस बीच उनकी मृत्य हो जाती है, तो रकम उनकी मां शेंकल को मिल जाएगी। अगर दोनों ही इस दुनिया में नहीं रहीं, तो ये रकम आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के पास लौट जाएगी, क्योंकि इस ट्रस्ट के धन को कांग्रेस नेताओं से ही जुटाया गया था।

साल 1966 का एक दस्तावेज कहता है कि 1965 तक कांग्रेस और ट्रस्ट के जरिए अनिता को मदद की गई। इसके बाद उनका विवाह हो गया। एक अच्छे एकेडमिक करियर के बाद वो जर्मनी के किसी कॉलेज में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर बन चुकी थीं। दस्तावेज कहते हैं कि बोस के परिवार को कुछ समय तक 200 से 300 रुपया (उस समय के लिहाज से ये बड़ी रकम थी) शेंकल को भेजी गई, लेकिन फिर ये सहायता बंद हो गई।

उस दौरान नेहरू ने बोस की पत्नी को भारत आने का न्योता भी दिया, लेकिन उन्होंने अपनी मां की तबीयत खराब होने के कारण इस आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। एक फरवरी 1955 को उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर अपने भारत नहीं आ पाने की सूचना दी। पत्र के अंत में उन्होंने खासतौर पर लिखा कि अनिता काफी मेधावी स्टूडेंट निकल रही है। वो भारत से संबंधित हर बात में दिलचस्पी लेती है। उसके टीचर उसे भारत मामलों का एक्सपर्ट कहते हैं।

1958 में नेहरू को बताया गया कि अनिता को कुछ समय से आर्थिक मदद नहीं मिली है, वो आर्थिक दिक्कत में हैं। तब ना केवल मदद भेजी गई, बल्कि एरियर भी दिया गया। तभी बंगाल के मुख्यमंत्री रॉय ने सुनिश्चित किया कि 15 साल की हो चुकी अनिता को लगातार वित्तीय मदद मिलती रहे, दोबारा कभी ये स्थिति पैदा ही न हो कि आर्थिक मदद रुक जाए। ये वित्तीय मदद राय (जुलाई 1962) और नेहरू (मई 1964) के निधन के बाद भी उनके पास पहुंचती रही। जुलाई 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने खुद कहीं ये जिक्र भी किया कि कोलकाता के लिए सुभाष चंद्र बोस ट्रस्ट में नेहरू की जगह उन्हें और डॉक्टर बीसी राय के स्थान पर बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र सेन को ट्रस्टी बनाया गया है।

अनिता के मन में प्रबल इच्छा थी कि वो भारत यानी अपने पिता के परिवार से मिलें। हालांकि उस दौरान बोस परिवार में कई तरह के आपसी मतभेद के हालात भी थे। नवंबर 1960 में अनिता ने नेहरू को सूचित किया था कि वो दिसंबर में अपने पिता के देश आ रही हैं। क्या प्रधानमंत्री उन्हें अपने साथ मिलने और रुकने का मौका देंगे। 19 साल की अनिता ने पीएम से ये भी पूछा था कि उन्हें पहले दिल्ली आना चाहिए या फिर सीधे पिता के घर कोलकाता जाना चाहिए। इस पर नेहरू ने कहा था, “ज्यादा बेहतर हो कि वो पहले दिल्ली आएं, क्योंकि एयरलाइंस पहले नई दिल्ली ही आती है।” नेहरू ने उन्हें दिल्ली में अपने साथ रहने का न्यौता दिया। उन्होंने कहा, “तुम जब भी दिल्ली आओ, तो प्रधानमंत्री आवास तुम्हारा स्वागत करेगा। तुम हमारे साथ ठहरो।” लेकिन साथ में उन्होंने सावधानी से ये बात भी कही कि, “अनिता. तुम्हारे भारत भ्रमण का क्रार्यकम अगर कोलकाता का तुम्हारा परिवार बनाए, तो ज्यादा बेहतर होगा। अलबत्ता हम उसमें पूरी मदद करेंगे।”

प्रेस ने इस यात्रा को खासी उत्सुकता से कवर किया। अनिता जहां कहीं गईं, वहां उनका जोरदार और गर्मजोशी से स्वागत हुआ। जब अनिता वियना से दिल्ली आईं, तो एयरपोर्ट पर नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल ने उनकी अगवानी की। इसके बाद नेहरू ने स्नेहपूर्वक प्रधानमंत्री आवास पर उनका स्वागत किया। इसके करीब एक महीने बाद ब्रिटिश प्रेस ने इस संबंध में एक आपत्तिजनक रिपोर्ट प्रकाशित की। लंदन के समाचार पत्र ‘डेली एक्सप्रेस’ ने अनिता बोस का स्वागत करते हुए नेहरू की तस्वीर के साथ खबर छापी और हेडिंग दी, ‘गद्दार की बेटी नेहरू से मिली’।

नेहरू ने तुरंत इस पर एतराज जाहिर किया। उन्होंने कहा, “जिस तरह ब्रिटेन के एक अखबार ने इसे छापा, वो बहुत भद्दा तरीका है। आप भारत के एक ऐसे शख्स के बारे में इस तरह लिख रहे हैं जो न केवल प्रबल राष्ट्रवादी रहा है बल्कि देशवासियों के मन में उनके लिए अथाह इज्जत और प्यार है। उन्हें इस देश में भगवान की तरह पूजा जाता है। सुभाष का दर्जा देश में बहुत बड़ा है।”

(संजय श्रीवास्तव की संवाद प्रकाशन से आई किताब ‘सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा’ के कुछ अंश)

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