लता और रफी के बीच वो विवाद जो सुलझने के बजाय उलझता ही गया!

1960 के दशक में रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी में जो विवाद हुआ था, उसे वे भूली नहीं हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

1960 के दशक में रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी में जो विवाद हुआ था, उसे वे भूली नहीं हैं। कुछ विस्तार से ही, लता ने यह बात कही है कि रफी के नाम का जिक्र आते ही वे उन दिनों में लौटने को मजबूर हो जाती हैं जब एक सिंगर को, किसी गीत पर रॉयल्टी मिले न मिले, के सवाल पर रफी ने उनसे अपनी असहमति जाहिर की थी। लता का यह विचार कि सिंगर्स को रॉयल्टी मिलनी चाहिए, उनका अपना था, पर उसे और मजबूती तो रफी-जैसे सिंगर को साथ लेकर चलने में मिलती। रफी ने जोर देकर कहा कि एक बार गीत के रिकॉर्ड हो जाने के बाद, सिंगर का कोई अधिकार उस पर नहीं रह जाता। दूसरे, अगर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाती है तो निर्माता रॉयल्टी देने की स्थिति में नहीं होगा। बहुत-से लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कलाकार के अधिकारों के लिहाज से लता अपनी जगह सही थीं। लेकिन हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहां मुनाफे और नुकसान की बात सोचनी ही पड़ती है। रफी ने इस सवाल पर एक सोचा-विचारा सैद्धांतिक निर्णय लिया था जो उन संगीतकारों की समझ में सहज ही आ जाना चाहिए था जिन्होंने 1950 और 1960 के दशक में शानदार संगीत की रचना की थी। यहां याद कर सकते हैं कि क्रोध में भरी हुई लता ने उस बैठक का बहिष्कार कर दिया था जिसमें इस सवाल पर विचार- विमर्श हो रहा था और जिसमें अधिकतर लोग रफी के मत से सहमत थे।

वह तो लता ही थीं जिन्होंने यह निर्णय लिया था कि अब वह रफी के साथ नहीं गाएंगी। इस बारे में रफी ने एक सधा हुआ जवाब दिया था कि अगर उनकी मेरे साथ गाने में दिलचस्पी नहीं है, तो फिर मुझे भी कैसे हो सकती है! दरअसल, दोनों के अहं का टकराव बहुत बढ़ चुका था और वही प्रमुख हो गया था, रॉयल्टी वाला मामला तो जैसे पीछे छूट गया था। स्थिति तब और बिगड़गई जब दो दिग्गजों ने एक दूसरे के साथ गाना बंद कर दिया, तो अधीर हुए कंपोजरों ने लता की जगह सुमन कल्याणपुर से गवाना शुरू कर दिया जो कुछ-कुछ लता जैसी ही लगती थीं। डुएट के क्षेत्र में रफी की जगह पहले जैसी बनी हुई थी। लोग यही मानते हैं कि जब लता ने देखा कि जो कुछ उन्हें मिला करता था, उसे तो कोई और लिए जा रहा है, तो वह परेशान हुईं। और इसे क्षमता न देखकर माना यही जाता है कि उन्होंने शंकर-जयकिशन से संपर्क किया कि वह रफी के साथ उनका समझौता करा दें। इसलिए जब उन्होंने यह कहना शुरू किया (रफी के जाने के बाद) कि रफी ने उनसे क्षमा मांगी थी, वह भी लिखकर, तो लोगों को अचरज हुआ और बात गले के नीचे उतरी नहीं, खासतौर पर इसलिए भी कि लिखित माफी वाली वह चिट्ठी उन्होंने कभी सामने नहीं रखी।

रफी के बेटे शाहिद रफी को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने कहा कि रफी तो इतने पढ़े-लिखे थे ही नहीं कि ऐसी कोई चिट्ठी लिखते। वह तो कभी कुछ पढ़ते भी नहीं थे, सिवाय उन गीतों के जो एक कागज पर लिखकर उन्हें दे दिए जाते थे गाने के लिए। शाहिद ने यह भी कहा कि अगर ऐसी माफी वाली कोई चिट्ठी लता के पास है भी तो वह उन्हें दिखानी चाहिए; नहीं तो वह उन पर मानहानिका मुकदमा दायर करेंगे। यह मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया पर स्वयं लता के पक्षकारों को यह हैरानी हुई कि रफी के साथ रॉयल्टी वाला मुद्दा जिसे लोग भूलने भी लगे थे, उसे आखिरकार फिर से क्यों उठाया लता ने।

लता मंगेशकर ऐसी गायिका हैं जिनका नाम हमेशा इतिहास में दर्ज मिलेगा। जो लोग लता को नजदीक से जानते हैं, वे इस बात को साझा करने को तैयार हो सकते हैं कि स्वर साम्राज्ञी का दर्जा हासिल करने वाली लता कई मामलों में लगातार अपने को असुरक्षित महसूस करती रही हैं। और उनका अहं भी ऐसा है कि जो भी उन्हें जरा-सा भी प्रतिद्वंद्वी नजर आया है उसके प्रति वह उदार नहीं रही हैं और इसमें अपनी बहन आशा भोसले तक को उन्होंने नहीं बख्शा है। पर वह इस आरोप का खंडन लगातार करती रही हैं। लगता है यह आरोप उन पर एक बोझ की तरह साथ रहा है अन्यथा वह 85 वर्ष की आयु में एक स्पष्टीकरण भला क्यों जारी करतीं।

वह कहती हैं, मैंने अपने करियर में, अपने को आगे बढ़ाने के लिए किसी को उठाने-गिराने की चेष्टा नहीं की है। सवाल यह है कि उनकी जैसी क्षमता वाली गायिका को ऐसा बयान जारी करने की जरूरत क्यों हुई जबकि यह अप्रासंगिक है अब। हमें इस बात ने बराबर उलझन में डाला है कि उनकी जैसी लब्धप्रतिष्ठित गायिका को उन चीजों में उलझने की जरूरत ही क्यों महसूस होती रही है, खासतौर पर तब, जब उनके सामने कोई प्रतिद्वंद्वी हीन रहा हो। इसके मुकाबले रफी के मुस्कुराते हुए चेहरे की याद करिए जिन्हें लता के मुकाबले अपने को कई समकालीनों की चुनौती को जाने-अनजाने झेलना पड़ा हो। रफी उन सबके सामने हंसते हुए ही गुजरे हैं, आगे बढ़े हैं; और कभी किसी को किसी तरह की चोट भी नहीं पहुंचाई है।

जब किन्हीं दो लोगों के बीच दरार पैदा हो जाती है, तो पुरानी आत्मीयता ठीक उसी रूप में वापस नहीं आती। दोनों (मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर) के संबंध सुधरे नहीं थे। जब यह बात प्रकाश में आई कि रफी ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड को 11 जून, 1977 को एक पत्र लिखा है जिसमें लता के उस दावे को चुनौती दी गई है कि उन्होंने फिल्म जगत में सर्वाधिक गीत गाए हैं। किताब में यह जिक्र किया गया था कि लता ने 25,000 से कम गीत नहीं गाए हैं जबकि उसी साल बीबीसी को दिए गए एक साक्षात्कार में रफी ने यह दावा किया था कि उन्होंने प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कुछ विदेशी भाषाओं में भी करीब 25-26,000 गीतों को अपनी आवाज दी है। गिनीज से 20 नवंबर, 1979 का एक पत्र पाकर रफी ने फिर लिखा कि वे इस बात से निराश हुए हैं कि लता और उनके बीच गाए गए गीतों के वर्ल्ड रिकॉर्ड का जो मसला है, उस पर पुनर्विचार नहीं किया गया है।

रफी के देहांत के बाद गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज सबसे अधिक रिकॉर्डिंग्स के अंतर्गत लता मंगेशकर का नाम दर्ज किया गया। साथ में, यह टिप्पणी दी गई कि मोहम्मद रफी (निधन, 1 अगस्त, 1980) ने 1944 से अप्रैल 1980 तक 11 भारतीय भाषाओं में 28,000 गीत रिकॉर्ड कराने का दावा किया था। तथ्य यह है कि ये दोनों ही दावे अतिरंजित हैं क्योंकि यह तो शारीरिक रूप से असंभव है कि कोई साल भर में हजार गीत गाए, वह भी तब जब रिहर्सल भी होती (रही) हों और सिंगर विदेशों में शो करने के लिए भी जाते रहे हों। अभी भी यह साफ नहीं है कि रफी ने कुल मिलाकर कितने गीत गाए थे। लेकिन यह संख्या 6,000 से लेकर 6,200 तक जा सकती है। पहले यह संख्या 4,500 गीतों तक अनुमानित की गई थी, पर कुछ भूले-बिसरे गीतों का पता चलते रहने से इस संख्या में बढ़ोतरी होती गई।

जब कुछ ऐसे गीत मिले, तो रफी को समर्पित एक वेबसाइट ने रफी प्रेमियों से गुजारिश की किजो गीत रफी ‘गीतकोश’ में नहीं हैं, उसके अलावा जो भी गीत मिलें, कृपया ढूढ़ें और बताएं, उन पर पुरस्कार भी दिया जाएगा। अतः रफी के गाए गीतों की संख्या 26,000 तो नहीं हो सकती है। हां, वह 10,000 के करीब जरूर हो सकती है क्योंकि ऐसे भी गीत हैं जो किसी फिल्म के लिए रिकॉर्ड किए गए पर इस्तेमाल नहीं हुए। अगर ऐसी कोई संभावना हो भी, तो संख्या 7000 के ऊपर तो नहीं ही होगी। जब गिनीज बुक वालों को लगा कि कहीं कोई गलती जरूर है, तो वर्ष 1991 और 2011 के प्रकाशनों में से लता और रफी दोनों का नाम हटा लिया गया, और यह क्रेडिट आशा भोसले को दिया गया। किसी ने सच कहा है कि अंत भला तो सब भला!

(‘मोहम्मद रफी : स्वयं ईश्वर की आवाज’ पुस्तक के एक अध्याय का संपादित अंश साभार)

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