हाउस ऑफ जयपुर: सवाई मानसिंह के पारिवारिक झगड़ों, कानूनी लड़ाइयों समेत कई सवालों का जवाब है जॉन जुब्रज्की की ये किताब

आस्ट्रेलियाई लेखक, पत्रकार और राजनयिक जॉन जुब्रज्की का मानना है कि ‘हाउस ऑफ जयपुर’ का स्क्रीन या वेब स्करण ‘द क्राउन’ को भारत का उत्तर होगा। ‘द क्राउन’ इन दिनों नेटफ्लिक्स पर दिखाई जा रही है। ‘हाउस ऑफ जयपुर’ जॉन जुब्रज्की की चौथी पुस्तक है।

फोटो: सोशल मीडिया
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प्रकाश भंडारी

जय और आयशा- इस नाम से सवाई मान सिंह और गायत्री देवी जाने जाते थे। पुस्तक ‘हाउस ऑफ जयपुर’ के लेखक जॉन जुब्रज्की का कहना है कि ये दोनों भारत के राज परिवार के इतने ग्लैमरस दंपति थे कि इनकी तुलना स्वयं महारानी एलिजाबेथ और प्रिंस फिलिप या फिर जॉन तथा जैकलिन कैनेडी से की जा सकती है। आस्ट्रेलियाई लेखक, पत्रकार और राजनयिक जॉन जुब्रज्की ने राजनयिक के रूप में नई दिल्ली और जकार्ता में काम किया है। वह विलियम डेलरिम्पल की तरह प्रसिद्ध तो नहीं हैं लेकिन वह भारत पर तीन किताबें लिख चुके हैं जिनमें से एक निजाम पर है। यह उनकी चौथी पुस्तक है और पांचवीं पुस्तक पर वह काम कर रहे हैं जो जादूगर गोगिया पाशा पर है।

अंतरराष्ट्रीय फैशन और गॉसिप स्तंभकार गायत्री देवी को अति सुंदर महिला के रूप में मानते हैं। गायत्री देवी ने अपनी ही यादें ‘अ प्रिंसेस रिमेम्बर्स’ नाम से एक किताब शांता रामा राउ के साथ मिलकर लिखी थी जो जयपुर आने वाले पर्यटकों द्वारा सबसे ज्यादा खरीदी जाती है। लेकिन जैसा कि जुब्रज्की कहते हैं कि राज परिवार पर लिखी गई अधिकांश किताबें तारीफों से भरी हुई परी-कथाओं-जैसी होती हैं और वे अक्सर कॉफी टेबल बुक्स होती हैं। जुब्रज्की ने स्वयं 18 महीने भारत और इंग्लैंड में अभिलेखागारों में अनुसंधान करते हुए बिताए और फिर दरबार के दस्तावेजों को भी खंगाला। उन्होंने ऐसे लोगों से भी बात की जो इस दंपति के करीबी थे ताकि वह जयपुर, बड़ोदरा और कूच बिहार में धोखे और साजिशों के साथ-साथ प्रेम, उम्मीद, शराब और प्रेम प्रसंगों से भरे हुए राज परिवार के ड्रामा की इस दुखांत कहानी के टुकड़ों को जोड़ सकें।

लेखक जुब्रज्की मानते हैं कि जयपुर हमेशा से गॉसिप का ज्वलंत केंद्र रहा है। उन्होंने बहुत परिश्रम के बाद यह दावा किया कि गायत्री देवी की एक सौतेली बहन थी जिसके पिता हैदराबाद के खुसरु जंग थे जिन्हें उनकी माता इंदिरा देवी की सेवा में रखा गया था। अस्वीकृत सौतेली बहन की कहानी विस्तृत रूप से जयपुर में फुसफुसाहट के रूप में ही रही है लेकिन इस पर कभी भी सार्वजनिक तौर पर बात नहीं की गई। यह बात लेखक को बहुत ही अटपटी लगती है क्योंकि देखने में तो दोनों बहनों में बहुत प्यार था।

एक गॉसिप को लेकर जुब्रज्की को अधिक संशय है जिसके अनुसार, जयपुर के अंतिम महाराजा ब्रिगेडियर भवानी सिंह की माता के पहले बच्चे के पिता जोधपुर के एक अधिकारी(कामदार) थे। इन पंक्तियों के लेखक को जुब्रज्की ने एक बातचीत में बताया कि “उस समय के ब्रिटिश रेजीडेंट के अनुसार, ये सब अफवाहें थीं जिनमें कुछ तथ्य नहीं था। जब मैं अपनी किताब लिख रहा था, तो यह बात मेरे सामने सवाई मान सिंह की दूसरी पत्नी किशोर कंवर के रिश्तेदारों ने रखी। उद्देश्यथा महारानी मरूधर कंवर की बदनामी करना ताकि जैसे ही दूसरी रानी का पुत्र हो तो वह यह दावा कर सके कि वही वैध रूप से गद्दी का वारिस होगा।”

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जयपुर के महाराजा को स्पेन का राजदूत बनाया था लेकिन वह अपना अधिकांश समय इंग्लैंड में लोगों से मिलने-जुलने और पोलो खेलने में बिताते थे। सवाई मानसिंह कहते थे कि जॉन बहुत अच्छा शासक था लेकिन हर वर्ष पांच से छह माह यूरोप में बिताना घरेलू मोर्चे पर प्रशासन के लिए हितकर नहीं था। यह किताब महारानी एलिजा बेथ और जैकलिन कैनेडी की जयपुर यात्राओं तथा राज परिवार के लोगों की राजनीति में जोर आजमाइश के बारे में भी बताती है। पुस्तक बताती है कि कैसे गायत्री देवी ने स्वतंत्र पार्टी का गठन किया जिसके संरक्षक सी. राज गोपालाचारी थे। राज गोपालाचारी भारत के अंतिम गवर्नर जनरल थे। स्वतंत्र पार्टी आगे चलकर राजकुमारों और सामंतों कीपार्टी बनी जिन्होंने अपने राज्य और जागीरी अबॉलिशन ऑफ प्रिंसली स्टेट के तहत खो दी थी।

इस पुस्तक में कई अध्याय सवाई मानसिंह की मृत्यु के बाद हुए पारिवारिक झगड़ों पर हैं, और साथ ही कानूनी लड़ाइयों और अडॉप्शन के प्रश्नों पर भी। यह किताब हमें बताती है कि क्यों गायत्री देवी अपने सौतेले बेटे भवानी सिंह के लोकसभा चुनाव लड़ने के विरोध में थी जिसके कारण वह अंततः हार गए और उनके मन में और भी अधिक कड़वाहट भर गई।

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