जन्मशती विशेषः मेले का इतिहास जानने के लिए रेणु के साहित्य में ही लौटना होगा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ के पूर्व अधिष्ठाता और रेणु के साहित्य पर काम कर चुके डॉ सूरज पालीवाल ने कहा था, जब तक वह रेणु के गांव औराही हिंगना सहित उस ‘मैला आंचल’ के दर्शन नहीं कर लेते, उनकी पढ़ाई अधूरी मानी जाएगी।

फोटोः सोशल मीडिया
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आनंद भारती

गुलाबबाग, गढ़बनैली, फारबिसगंज, चंपानगर, मदनपुर, श्यामनगर। ऐसे कई छोटे-छोटे गांव, शहर और कस्बों के नाम फणीश्वरनाथ रेणु के कथा-साहित्य में आते हैं। ये सब इस तरह सम्मोहित करते हैं कि उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। ये स्थान काल्पनिक नहीं, जीवित इतिहास हैं जो आज भी सशरीर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इन्हें अगर प्रसिद्धि मिली तो इसमें ‘मेला’ शब्द का बड़ा योगदान था।

एक समय था जब यहां लगने वाले मेले का साल भर इंतजार होता था। नौटंकी, सर्कस, जादू घर, मौत का कुआं, कठपुतली, झूला, नाच आदि अगर यहां मनोरंजन के उपादान थे तो खेती और घरेलू सामानो का संसार भी था, जो दूरदराज तक के लोगों की साल भर की जरूरतों को पूरा करता था। ये मेले मिलन-स्थल भी थे, जहां नेपाल और बंगाल से भी भारी संख्या में लोग आते थे, ताकि सारे नाते-रिश्तेदारों से मिल सकें।

रेणु जी ने इन ग्रामीण मेलों को भी नायक बनाकर पेश किया। मेलों में जीवन धड़कता था। कथित विकास और आधुनिकता की हवा ने इन मेलों के असर को धूमिल जरूर किया है, लेकिन नाम को बेअसर कर पाने का साहस नहीं दिखा पाया है। ये मेले ‘मैला आंचल’ के प्राण रहे हैं। यहां के लोग अभावों के बावजूद मेले में उत्सवधर्मी होकर जाते थे। लोक-परंपराओं, गीतों, संस्कृतियों को जीवित रखने में इन मेलों की भी सशक्त भूमिका रही है।

इस ‘मैला आंचल’ के लेखक रेणु के बारे में निर्मल वर्मा ने कहा था, ‘मानवीय दृष्टि से संपन्न इस कथाकार ने बिहार के एक छोटे भूखंड की हथेली पर किसानों की नियति की रेखा को जैसे उजागर कर दिया था।’ यह भूखंड है नेपाल की सीमा से सटे उत्तर-पूर्वी बिहार का जिला पूर्णिया। पूर्णिया को रेणु की धरती भी कहा जाता है, जो अब चार जिलों में बंट गया है- पूर्णिया, अररिया, कटिहार और किशनगंज।

एक समय क्या, आज भी कहा जाता है कि अगर गांव को समझना है तो रेणुजी को पढ़ लीजिए। प्रेमचंद के बाद रेणु अकेले ऐसे लेखक हैं, जिन्होंने गांव को परत-दर-परत खोला और इसके रेशे-रेशे से दुनिया को परिचित कराया। तभी तो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के साहित्य विद्यापीठ के पूर्व अधिष्ठाता और रेणु के साहित्य पर काम कर चुके डॉ. सूरज पालीवाल ने एक मुलाकात में कहा था, ‘जब तक मैं रेणु जी के गांव औराही हिंगना सहित उस ‘मैला आंचल’ के दर्शन नहीं कर लेता, मेरी पढ़ाई-लिखाई अधूरी ही मानी जाएगी।’ वह रेणु के कथा-साहित्य में उल्लिखित मेलों के बारे में अक्सर पूछा करते थे और सुनकर कहीं खो जाते थे।

मेले पहले से ही लगा करते थे लेकिन दुनिया के नक्शे पर उसे प्रसिद्धि दिलाई फिल्म ‘तीसरी कसम’ ने। ‘मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ कहानी पर बनी इस फिल्म का हिस्सा थे राज कपूर, वहीदा रहमान, निर्माता शैलेंद्र, निर्देशक बासु भट्टाचार्य, हसरत जयपुरी, शंकर-जयकिशन और खुद रेणु। सबसे मजेदार बात यह है कि इसकी शूटिंग महाराष्ट्र में हुई थी। गढ़बनैली सहित कुछ अन्य स्थानों पर कुछ शॉट जरूर लिए गए थे। हालांकि, मूल कहानी में हीरामन और हीराबाई के फारबिसगंज मेले जाने का जिक्र है, लेकिन फिल्म में वह बदलकर गढ़बनैली मेला हो जाता है।

फिल्म में मेले का सेट लगाकर शूटिंग की गई थी। सेट लगा था मुंबई के कमाल स्टुडियो में। वह सेट गुलाबबाग मेले के अनुसार लगा था। इसके लिए बाकायदा निर्देशक बासु भट्टाचार्य खुद रेणु जी के साथ गुलाबबाग (पूर्णिया) का मेला देखने गए थे। दोनों ने दि ग्रेट भारत नौटंकी कंपनी में एक दिन नौटंकी भी देखी, ताकि सेट में अंदर के माहौल को वैसा ही रचा-बुना जा सके। वे मेले में घूम-घूम कर फोटो भी लेते रहे। यानी गुलाबबाग मेले के स्वरूप में गढ़बनैली को ढाला गया, वह भी बंबई में। वह सेट कैसा था, इसकी झलक स्वयं रेणुजी ने धर्मयुग में पेश की थी।

‘तीसरी कसम के सेट पर तीन दिन’ नाम से लिखे एक रिपोर्ताज में कहा था, ‘चाय के समय पूर्णिया से आए मेरे मित्र अरुण भारती ने विशुद्ध मैथिली में पूछा, सांझुक की प्रोग्राम अछि? और मैंने शाम को जिस स्थान पर मिलने को कहा, वह बंबई में नहीं, भट्टा बाजार, पूर्णिया में है। अरुण अवाक होकर देखता रहा तो मुझे होश आया कि मैं गुलाबबाग मेले में नहीं, कमाल स्टुडियो में हूं।’ फिल्म के अंत में हीराबाई गढ़बनैली स्टेशन पर हीरामन को जिस मेले में आने के लिए कहती है, वह गुलाबबाग मेला ही है, हालांकि उसका नाम गुलाबगंज कर दिया गया था।

फारबिसगंज का मेला हो या गढ़बनैली और गुलाबबाग का, वह चंपानगर का हो या मदनपुर का, वे सिर्फ परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। पुरानी रौनक खत्म हो गई है। दिन भर जो चहल-पहल रहती थी, उसे बाजार ने लूट लिया है। बैलगाड़ियों से लद-लदकर लोग आते थे और नौटंकी-सर्कस देखने के बाद सुबह रवाना होते थे। उस रौनक को लौटाना अब शायद संभव भी नहीं है। इसलिए कि विकास के नाम पर चली आंधी ने मेले के अस्तित्व को बेअसर कर दिया है। बाजार का आक्रमण जिस तरह से हुआ कि लोगों को इसकी जरूरत भी नहीं रही। बाजार की भीड़ में मेला अकेला पड़ता जा रहा है।

सीमांचल क्षेत्र का सबसे बड़े मेला के तौर पर गुलाबबाग मेला का जिक्र होता था। इस मेले की शुरुआत पूर्णिया सिटी के तत्कालीन राजा पृथ्वीचंद ने की थी। यहां आसपास के अलावा देश-विदेश के लोग भी मेले में पहुंचते थे। मेले का मुख्य आकर्षण उस समय बाहर से आने वाले मवेशी, दूसरे राज्य से आने वाली कपड़े की दुकानें और खेल-तमाशा हुआ करता था।

लेकिन कभी 66 एकड़ में फैला ये मेला ग्राउंड अब अतिक्रमण के कारण लगातार सिकुड़ता जा रहा है। मेले की ज्यादातर जमीन पर जंगल पसर गया है। बचे हुए हिस्से पर आसपास के कचरे का अंबार है। सड़क के किनारे वाले हिस्से पर लोगों ने अतिक्रमण कर घर-दूकान बना लिए हैं। जो कुछ जगह बची है, वहां अब पुराना मेला नहीं, गणपति का मेला लगने लगा है।

गढ़बनैली की रेल लाईन के किनारे मौजूद दशहरा मेला का मूल ग्राउंड कचरे में तब्दील हो गया है। मेला सिकुड़कर मंदिर के पास सीमित हो गया है। अब न तो सैयां हमार वहां पान खाने जाता है और न ही चलत मुसाफिर मन मोहता है। इस मेले को1920 में वहां के राजा रामानंद ने शुरू कराया था। कुछ ही दिनों में यह इतना चर्चित हो गया कि रेणुजी को इसे अपनी फिल्म में शामिल करना पड़ा। इस मेले में नेपाल के राजपरिवार के लोग भी आते थे।

‘मैला आंचल’ में लगने वाले मेले भले तहस-नहस हो जाएं, सिकुड़ जाएं या रूप बदल लें, लेकिन रेणु के साहित्य में वे जिंदा रहेंगे। आने वाली पीढ़ियां जब भी मेले का इतिहास जानने की इच्छा जाहिर करेंगी, उन्हें रेणु के साहित्य में ही लौटना होगा। पढ़कर उन्हें कल्पना करनी होगी कि कैसा होता था मेला, तब उन्हें ‘तीसरी कसम’ फिल्म देखनी होगी।

विदेशों में गए भारतीयों, देश में महानगरों में रहने वाले लोगों के मन में जब ऊब पैदा होती है तो वे गांव लौटने के लिए परेशान हो जाते हैं। उसी तरह जब जीवंत मनोरंजन, मस्ती और उत्साह के बारे में सोचेंगे तो मेला-संस्कृति को याद करने लगेंगे। इस समय तो सरकार और समाज की जिम्मेदारी है कि इतिहास के गर्त में समाधि ले रहे मेलों को पर्यटन-केंद्र के रूप में बदलकर विकसित कर दें। बड़े शहरों में ग्रामीण मेले या हाट का आयोजन हो रहा है, लेकिन जो गांवों के परंपरागत मेले थे, उसे भुला देने की कोशिश हो रही है। अगर रेणु की स्मृति को बचाए रखना है तो मेलों को भी बचाना होगा।

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