राजनीतिक चंदा ही बन गया फंदा, चुनावी बॉंड से भी नहीं रुक पा रहा कालेधन का इस्तेमाल

भारतीय राजनीति में कालेधन का वर्चस्व बेहिसाब बढ़ रहा है जो लोकतंत्र के लिए भयावह चेतावनी है। आकलन है कि इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों का खर्च 50 हजार करोड़ रुपये होगा जिसमें कालेधन की हिस्सेदारी कम से कम 80 फीसदी होने का अनुमान है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

मोदी सरकार चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए चुनावी बॉन्ड को मील का पत्थर मानती है, लेकिन हकीकत यह है कि इस बॉन्ड की शुरुआत से ही इसके औचित्य और मंशा पर सवाल उठते रहे हैं। सरकार ने वित्त अधिनियम 2016 और 2017 के माध्यम से राजनीतिक और चुनावी चंदे में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए मौजूदा कानूनों में ताबड़तोड़ बदलाव किए। ये बदलाव अब मोदी सरकार के गले की फांस बन गए हैं। इन बदलावों की मंशा को लेकर 2017 और 2018 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की गईं। इनमें एक याचिका गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉफ (एडीआर) और दूसरी, राजनीतिक दल सीपीएम ने दायर की है।

काम न आईं सरकारी दलीलें

सुप्रीम कोर्ट ने हालिया आदेश में कहा कि अगर चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल रोकने और पारदर्शिता के लिए लाई गई है, तो इसमें इतनी गोपनीयता क्यों बरती जा रही है। अदालत ने सभी राजनीतिक दलों को आदेश दिया कि वे 30 मई तक चुनावी बॉन्डों के जरिए मिलने वाले चंदे का पूरा ब्यौरा सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को दें। साथ ही उन्हें बैंकों का विवरण दाखिल करने को भी कहा गया है।

सरकार का पक्ष रखते हुए अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी कि राजनीतिक दल चंदा कहां से पाते हैं, इसको जानने की आवश्यकता वोटर को नहीं है। यह भी दलील दी कि अदालत पारदर्शिता के नाम पर चुनावी बॉन्डों की स्कीम को खत्म नहीं कर सकती है। एडीआर की याचिका की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने दोहराया कि चुनावी बॉन्ड का मकसद चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल को रोकना है। यह सरकार का नीतिगत फैसला है जिस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सरकारी दलील से सहमत नहीं दिखे और उन्होंने कहा कि चुनावी बॉन्ड की बैंक रिकॉर्ड की गोपनीयता से कालेधन को रोकने की कवायद विफल हो जाएगी।


याचिका की सुनवाई करने वाले अन्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने भी आशंका जताई कि केवाईसी (अपने ग्राहक को जानें) की प्रक्रिया पहचान तो बैंक को बताता है (पर यह पहचान बैंक सार्वजनिक नहीं कर सकता है)। लेकिन इसमें लगाई गई रकम सफेद या कालाधन है, इसका पता कतई नहीं चलता है। न्यायाधीश खन्ना को यह भी आशंका थी कि फर्जी (शेल) कंपनियों के जरिए काला धन सफेद किया जा सकता है। ऐसे में केवाईसी से कोई हल नहीं निकलेगा।

मोदी सरकार ने 2017 के वित्त अधिनियम में चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था बनाई थी। जिसके अनुसार एक हजार, 10 हजार, एक लाख, 10 लाख और एक करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए जाएंगे। जो स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं के जरिए बेचे जाएंगे। इन्हें कोई भारतीय नागरिक या देश में नियमित निकाय खरीद कर राजनीतिक दलों को चंदा दे सकता है।

इन्हें खरीदते समय ग्राहक को केवाईसी फार्म भरना होता है। यानी बैंकों को जानकारी होगी कि बॉन्ड कौन खरीद रहा है, लेकिन यह जानकारी किसी को भी देने के लिए बैंक बाध्य नहीं है। बॉन्ड पर किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं होगा। खरीदा गया बॉन्ड किस दल को दिया गया, इसकी जानकारी स्टेट बैंक को नहीं होगी। और राजनीतिक दल यह बताने को बाध्य नहीं है कि यह बॉन्ड किसने दिया। केवल इन बॉन्डों से मिली रकम बताने के लिए राजनीतिक दल बाध्य है।

लेकिन जब राजनीतिक दलों को मालूम है कि बॉन्ड किसने दिया, तो इसमें कौन सी गोपनीयता रह गई। और फिर कैसे कॉरपोरेट-सत्तारूढ़ दल या सरकार का कुत्सित गठजोड़ खत्म हो जाएगा। इस व्यवस्था में सबसे ज्यादा लाभ सत्तारूढ़ दल को होगा। इसकी पुष्टि चुनावी बॉन्डों की उपलब्ध जानकारी से हो जाती है।


नवंबर 2018 में बीजेपी ने चुनाव आयोग के सामने जो ब्योरा दिया है कि उसे चुनावी बॉन्डों से 201 करोड़ रुपये मिले, जबकि उस समय तक कुल 222 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्डों की खरीद-फरोख्त हुई थी। चुनाव आयोग भी मोदी सरकार के चुनावी चंदे की पारदर्शिता के दावों से असहमत है। पिछले महीने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि चुनावी बॉन्डों से पारदर्शिता ध्वस्त हो जाएगी।

राजनीतिक चंदा बन गया फंदा

वित्त अधिनियम 2016 और 2017 के माध्यम से राजनीतिक और चुनावी चंदे को लेकर जनप्रतिनिधित्व कानून 1951, आयकर और कंपनी एक्ट में कई बदलाव किए गए। जो मोदी सरकार के लिए गले का फंदा बन गए हैं। यह अकारण नहीं है। पहले नियम था कि कोई भी कंपनी अपने पिछले तीन साल के शुद्ध लाभ के औसत का 7.5 फीसदी ही अधिकतम चंदा राजनीतिक दलों को दे सकती है।

लेकिन वित्त अधिनियम 2017 में इस प्रतिबंध को खत्म कर दिया गया। यानी अब कोई भी रकम कंपनी राजनीतिक दलों को चंदा दे सकती है चाहे वह घाटे में हो या लाभ में, चाहे वह एक ढेले का कारोबार नहीं करती हो। इस बदलाव का कुल प्रभाव यह है कि अब फर्जी कंपनियां भी धड़ल्ले से कालेधन को चंदे के रूप में दे सकती हैं।

वित्त विधेयक 2016 में विदेशी कंपनी की परिभाषा बदल दी गई, जिससे विदेशी कंपनियों की सहायक कंपनियों को राजनीतिक चंदा देने की छूट मिल गई। लेकिन वित्त विधेयक 2018 में ऐसा संशोधन किया गया कि पिछले 42 साल में मिले विदेशी चंदे की जांच नहीं की जा सकती है। यह संशोधन संसद में बिना बहस के पारित हो गया। नतीजा यह है कि अब भारतीय राजनीति में विदेशी चंदे के दखल से इंकार नहीं किया जा सकता है, जो भयावह है।


अब नगद राजनीतिक चंदे की सीमा 20 हजार रुपये से घटा कर दो हजार रुपये कर दी गई है। इसके लिए चुनाव आयोग भी एक अरसे से मांग कर रहा था। वित्त मंत्रीअरुण जेटली ने इसको राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाने का बड़ा बदलाव माना है। पर यह बदलाव आंख में धूल झोंकने जैसा ही है। क्योंकि यह दान किससे मिला है यह बताने की दरकार राजनीतिक दलों को नहीं है।

यही कारण है कि राजनीतिक दलों के नकद चंदे में कोई गिरावट नहीं आई है। देश में अरसे से चुनाव और उसके चंदे को मुकम्मल रूप से कालेधन से मुक्त बनाने के लिए कई आयोग बैठ चुके हैं। पर कोई ठोस नतीजा अब तक नहीं निकला है। राजनीतिक दलों की कार्यशैली चुनावों को और अपारदर्शी बना रही है। इसलिए हर चुनाव के बाद चुनाव लड़ने का खर्च बेलगाम बढ़ जाता है।

इस समय देश में जारी लोकसभा चुनाव में 17 अप्रैल तक प्रवर्तन एजेसिंयां 2600 करोड़ रुपये की अवैध नकदी, शराब, ड्रग्स, सोना-चांदी आदि जब्त कर चुकी हैं, जो लोकसभा चुनाव 2014 में कुल जब्त सामग्रियों के मूल्य 1300 करोड़ रुपये से दो गुना है। मोटा आकलन है कि इस लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों का खर्च 50 हजार करोड़ रुपये होगा जिसमें कालेधन की हिस्सेदारी कम से कम 80 फीसदी होने का अनुमान है। भारतीय राजनीति में कालेधन का वर्चस्व बेहिसाब बढ़ रहा है जो लोकतंत्र के लिए भयावह चेतावनी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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