कोरोना वायरस से चीन की अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का, भारत समेत कई देशों पर भी होगा गंभीर असर

कोरोना वायरस के कारण उत्पादन ठप होने, यात्रा बंद होने और आपूर्ति थमने से चीन के स्टॉक एक्सचेंज में एक दिन में 700 बिलियन डॉलर का नुकसान दर्ज हुआ। कोरोना के इस प्रकोप का गहरा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी निश्चित है, क्योंकि चीन हमारा सबसे बड़ा निर्यातक है।

फोटोः सोशल मीडिया
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गुंजन सिन्हा

चमगादड़- डरावने ड्रैकुला का पहला प्रतिनिधि! आदिम काल से मानव-मन में चमगादड़ों के प्रति एक रहस्यमय भय रहा है। वे रात की अंधेरी अदृश्य ताकतों, डायनों, चुड़ैलों और शैतान के प्रतीक के रूप में देखे जाते रहे हैं। शेक्सपीयर के मैकबेथ में चमगादड़ के शोरबे से जीवंत चुड़ैलें बर्बादी के बीज बोती हैं।

डेनियल काह्नमैन के कालजयी उपन्यास में चमगादड़ ड्रैकुला के गुलाम हैं। निर्जन अंधेरी गुफाओं और वीरान खंडहरों में वे शैतानी आत्माएं उजाला काटती हैं और रात के अंधेरे में शिकार पर निकलती हैं। जीवित जंतुओं के रक्त से अपनी भूख मिटाती हैं। उनकी मार्फत ड्रैकुला उन स्थानों में पहुंच सकता है जहां वह किसी और तरह नहीं जा सकता। ड्रैकुला कहता है- “मेरा बदला अभी शुरू हुआ है! मैंने इसे सदियों में फैलाया है और अब समय मेरी तरफ है।” वगैरह-वगैरह।

तीसरी सहस्त्राब्दी की शुरुआत में मानव की नींद जिन दुःस्वप्नों के बीच खुली है, उनमें प्रमुख हैं नए किस्म के वायरस। इनमें अधिकांश वायरसों के मूल वाहक हैं चमगादड़। यह अलग बात है कि पर्यावरण चक्र में उनकी उपस्थिति बहुत जरूरी है। साल 2002 में सार्स वायरस का प्रकोप भी चीन के ही गुआन्दांग प्रांत में हुआ था। 2012 में सऊदी अरब में मर्स कोरोना का आतंक फैला। तब ऊंटों को इसका द्वितीयक वाहक माना गया। बाद के शोधों में चमगादड़ों को इनका मूल वाहक पाया गया।

लेकिन चीन को कोरोना वायरस से फैली बीमारी से ही नहीं जूझना पड़ रहा है। यह वहां की, और सिर्फ वहां की ही नहीं, कई देशों की अर्थव्यवस्था पर तीखा असर डाल रही है। कोरोना वायरस के कारण चीन ताला-बंद स्थिति में है। चीन आने जाने वाली दो दर्जन से अधिक एयरलाइंस ने उड़ानें बंद कर दी हैं। जापान, हांगकांग जैसे देशों ने चीन आने जाने वाले कई समुद्री जहाज बंदरगाहों से दूर रोक दिए हैं। हजारों लोग इन जहाजों में फंसे हैं।

महामारी से जुड़े प्रतिबंधों के कारण हजारों चीनी कारखाने बंद हैं। उत्पादन ठप, यात्रा बंद और आपूर्ति स्थगित होने से चीनी स्टॉक एक्सचेंज में एक दिन में 700 बिलियन डॉलर का नुकसान दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय महाप्रभु बन चुके चीन को कोरोना ने गंभीर स्थिति में पटक दिया है। संक्रमण और मौतों से अलग कोरोना के असर की कुछ खबरें यूं हैं- ह्युंडई मोटर ने चीन से स्पेयर्स आपूर्ति नहीं मिलने के कारण दक्षिण कोरिया में उत्पादन बंद कर दिया है। दुनिया भर की कार कंपनियां चीन में अपने कारखाने बंद कर चुकी हैं। इनमें टाटा की जगुआर और लैंड रोवर योजना भी है। जर्मन स्पोर्ट्स वियर कंपनी एडिडास ने चीन में अपने स्टोर बंद कर दिए हैं। अमेरिका और चीन के व्यापार युद्ध में कोरोना वायरस ने एक नया आयाम जोड़ा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना को वैश्विक आपातकाल बताया है। चीन के बाहर 27 देशों में कोरोना के मामले मिले हैं। लेकिन मरीजों की कम संख्या से संगठन को उम्मीद है कि प्रकोप रोका जा सकेगा। संक्रमित लोगों की मृत्यु दर का कोई अनुमान अभी नहीं है। लेकिन संगठन ने कहा है कि इसे रोकने में फेस मास्क का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। रूस ने कहा है कि कोरोना वायरस का वैक्सीन तैयार करने में आठ-दस महीने लगेंगे।

भारत पर असर

चीन में कोरोना वायरस के प्रकोप का भारत की अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव निश्चित है, क्योंकि चीन भारत का सबसे बड़ा निर्यातक है। 2002-03 में चीन में फैले सार्स वायरस का भारत में असर नहीं था। लेकिन तब से चीन पर हमारी निर्भरता बहुत बढ़ गई है। 2002-03 में चीन के साथ भारत का कुल व्यापार 4.8 बिलियन डॉलर था, जो 2018-19 में 18 गुना से अधिक 90 बिलियन डॉलर हो गया है। कुछ महीनों का स्टॉक तो कंपनियों के पास होता है। इसलिए कोरोना का वास्तविक असर तीन-चार महीनों में मालूम होगा।

फिर भी दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल और ऑटो उद्योग का प्रभावित होना तय है। दूरसंचार उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, कंप्यूटर हार्डवेयर, औद्योगिक मशीनरी इत्यादि के लिए भारत चीन पर ही निर्भर है। भारत में दवाएं बनाने की 85 प्रतिशत सामग्री चीन से आती है। चीन के लॉक आउट से भारत में दवाओं का उत्पादन प्रभावित होगा। पैरासिटामोल जैसी सामान्य दवा के कच्चे माल की कीमत अभी ही दोगुनी हो गई है। देसी दवा उद्योग अपनी क्षमता के 30 से 40 प्रतिशत ही उत्पादन करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के दवा उद्योग को अभी पूरी क्षमता से उत्पादन के लिए बढ़ावा मिलना चाहिए। भारतीय उत्पादक हालात का लाभ ले सकें, तो दवा क्षेत्र में वे चीन के एकाधिकार को तोड़ सकेंगे। विभिन्न भारतीय कंपनियों ने चीन में हजारों करोड़ का निवेश किया हुआ है। इन कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

नई तकनीकों की खुफियागीरी

कोरोना प्रकोप का एक रोचक पक्ष है आम लोगों की जासूसी के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल। कोरोना की निगरानी के दौरान बड़े पैमाने पर निगरानी नेटवर्क की दक्षता सामने आ रही है। चीन के लोगों को शक तो था कि उन पर दुनिया की सबसे सक्षम इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से निगाह रखी जाती है। लेकिन सरकारी एजेंसियां कृत्रिम इंटेलिजेंस की तकनीकों से इतनी सुसज्जित हैं, इसका अंदाज नहीं था। कोरोनो संकट ने उन तकनीकों को ऐसे समय में जगजाहिर कर दिया है कि निगरानी एजेंसियां शर्मिंदा होने के बदले गौरवान्वित महसूस करेंगी। अब मालूम हो रहा है कि सरकार किसी भी आदमी और उसकी गतिविधि के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल कर सकती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी कैमरा कंपनियां इस बात पर गर्व कर रही हैं कि उनका सिस्टम आम लोगों को सड़क पर भी स्कैन कर सकता है, भले ही वे मास्क पहने हों। यदि कोई कोरोना रोगी ट्रेन में है, तो ये रेलवे को उनके नाम, फोटो और पास बैठे लोगों की सूची दे सकती हैं। मोबाइल फोन एप्लिकेशन उपयोगकर्ताओं को बता सकते हैं कि क्या वे किसी कोरोनो वाहक के साथ हैं। इंटरनेट के इस दौर में टेलीकॉम कंपनियों ने लंबे समय से चुपचाप अपने उपयोगकर्ताओं को ट्रैक किया है। चीन की एआई कंपनियों और शोध संस्थानों से सरकार कोरोना प्रकोप से लड़ने में मदद मांग रही है। कंपनियों ने अपनी तकनीकों को घोषित कर दिया है।

फेशियल रिकग्निशन फर्म मेगवी ने कहा है कि उसने लोगों को पहचानने का नया तरीका विकसित किया है। यह थर्मल कैमरों से तापमान का पता लगा कर व्यक्तियों की पहचान करता है। इन तकनीकों का उपयोग संक्रमण के स्रोत खोजने में किया जा सकता है। खतरा यह है कि इन तकनीकों के अन्य तरह से उपयोग और दुरुपयोग हो सकते हैं, जिनसे व्यक्तिगत निजता और आज़ादी का हनन हो।

मदद

कोरोना वायरस से निबटने के लिए कई बड़ी कंपनियां मदद दे रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और उनकी पत्नी ने 10 मिलियन डॉलर दान किए हैं। अलीबाबा के स्वामी जैक मा ने भी 14.5 मिलियन डॉलर दिए हैं। मा हुआतेंग ने चीनी टेक दिग्गज टेनसेंट को लगभग 42 मिलियन डॉलर दिए हैं। गुच्ची की कंपनी अलेक्जेंडर मैकक्वीन और अन्य ने रेडक्रॉस को 1.08 मिलियन डॉलर दिए हैं।

जैविक हथियार

इस बीच चर्चा यह भी है कि चीन वुहान में चुपचाप बतौर जैविक हथियार ये वायरस तैयार कर रहा था। लेकिन वहीं यह विस्फोट हो गया। सही हो या नहीं, लेकिन तीसरी सहस्त्राब्दी के मनुष्य के लिए यह एक डरावना दुःस्वप्न तो है ही।

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