कोरोना संकट पर सरकारी लापरवाही छिपाने के लिए सांप्रदायिक जहर फैलाने की साजिश, फेक वीडियो से फैलाई जा रही नफरत

कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार की लापरवाही और सरकारी बदइंतजामी से ध्यान भटकाने के लिए महामारी का सांप्रदायिकरण करने की बड़े पैमाने पर साजिश रची गई है। इसी के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में अल्पसंख्यकों का बहिष्कार किया जा रहा है।

फोटो : सोशल मीडिया
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उमाकांत लखेड़ा

कोरोना संकट के दौरान देश में किस तरह सत्ता समर्थकों द्वारा संगठित तरीके से सांप्रदायिकता फैलाने और अल्पसंख्यक समाज को डराने धमकाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं। राजनीति शास्त्रियों का मानना है कि इस महामारी को संगठित तरीके से भारत में मुसलिम अल्पसंख्यको में भय, असुरक्षा और भविष्य में हालात सामान्य होने के बाद भी घृणा का पात्र बनाने की एक दीर्घकालिक वोट बैंक की रणनीति के तहत निशाना बनाया जा रहा है।

8 मार्च से 3 अप्रैल के बीच मात्र 1 सप्ताह के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में अल्पसंख्यक मुसलिम समुदाय के खिलाफ 3 लाख से ज्यादा ट्वीट शेयर किए गए। कुल 165 मिलियन लोगों ने उन्हें देखा। इस तरह का डाटा कुछ स्वतंत्र ग्रुप्स ने अमेरिका की मशहूर टाईम पत्रिका को सौंपे हैं। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर आमिर अली का कहना है, "एक वर्ग व संप्रदाय विशेष के लोगों को बदनाम करने के लिए लगभग सभी वीडियो झूठे निकले हैं। बीजेपी की आईटी सेल की ओर से फेक खबरों पर आधारित ट्वीट्स की बाढ़ सी आयी हुई है।"

एक वीडियो ऐसा भी चलाया गया जो कई माह पुरानी थाईलैंड की घटना का है जिसमें किसी को लोगों पर थूकते हुए दिखाया गया। उसे यहां भारत में कोरोना को लेकर मुसलिम समुदाय के खिलाफ लोगों को भड़काने के लिए इस्तेमाल किया गया। प्रो अली कहते हैं कुटिल तरीके से फेक खबरों के तहत ऐसी बातों को कोरोना जेहाद के नाम से फैलाया गया है।

देश में विभिन्न क्षेत्रों के जागरूक लोग मानते हैं कि "ऐसे दौर में जब लोगों को मोदी सरकार व बाकी राज्य सरकारों से हर रोज कोरोना टेस्टों की कछुआ चाल का कारण पूछना चाहिए, लोगों का ध्यान कहीं और ही चला गया है। केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "यह सही है कि परीक्षण उतनी संख्या में नहीं हो पा रहे, जितनी वास्तव में जरूरत है। हमारे देश में टेस्ट किटों का भारी संकट अभी भी बरकरार है।" अधिकारी का कहना है कि सरकार की असली चिंता यह है कि लॉकडाउन हटने के बाद भूखे प्यासे और बेरोजगारों के लिए रोजगार व नौकरी कहां से पैदा करेंगे।

ऐसे भी लोगों की कमी नहीं जो मानते हैं कि मोदी सरकार ने लॉकडाउन को लोगों को बिना वक्त दिए हुए जिस आधी-अधूरी तैयारी के साथ लागू किया, उससे देशवासियों विशेष तौर पर दिहाड़ी मजदूरों पर भूखमरी का जो संकट आया है, उसी से ध्यान भटकाने के लिए संघ परिवार व मोदी समर्थकों ने सुनियोजित तरीके से इसे मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है।

जेएनयू के प्रोफेसर कमलमित्र चिनॉय कहते हैं, "मोदी सरकार ने नफरत फैलाने वाले तत्वों पर लगाम कसने के बजाय उन्हें उत्पात मचाने दिया। उन्हें और चाबी दे दी गई। इतनी बड़ी आपदा के लिए मेडिकल उपचार व लोगों को सही मायने में सोशल दूरी बनाए रखने की अपील को मोदी समर्थकों ने ही खुलकर सड़कों पर जश्न का सैलाब करने उतार दिया। उनको हतोत्साहित करने के बजाय दिल्ली व देश के कई राज्यों में पुलिस ने धर्म के आधार पर लोगों को पहचानकर उनकी बेरहमी से पिटाई की।"

उनका कहना है कि उनके जैसे जेएनयू और जामिया के छात्रों व बाद में सीएए समर्थकों को बदनाम करने के लिए घृणा और नफरत का दुष्प्रचार हुआ, उसी तर्ज पर इस महामारी में भी मोदी सरकार के सरंक्षण में सामाजिक जहर फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।

बीजेपी के कई जिम्मेदार सांसदों व निर्वाचित लोगों में कर्नाटक से बीजेपी की लोकसभा सांसद शोभा करांडलाजे ने तो मुसलमानों को कोरोना जेहादी तक सार्वजनिक तौर पर बताया। बीजेपी की आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने 15 बार लगातार मुसलमानों को कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उनके ट्वीट सभी जगह वायरल हुए लेकिन सोशल मीडिया में जहर फैलाने वाले ऐसे तत्वों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ।

मोदी सरकार में मुसलिम कैबिनेट मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने तो मरकज में एकत्र लोगों की तादाद तालिबानियों तक से कर डाली। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कोरोना संक्रमण के इस दौर में पार्टी जनों से अपील की है कि कोरोना मामले को धर्म संप्रदाय से जोड़ने के भड़काऊ व विभाजनकारी बयानों से बचें। इस दिशा में प्रधानमंत्री के प्रयासों का समर्थन करें। राजनैतिक सामाजिक विशेषज्ञ इस बात से आश्चर्य चकित हैं कि बीजेपी व संघ परिवार के नेताओं का घृणाजनकर अभियान बदस्तूर जारी है। नड्डा की अपील बहुत देर से आयी और उसके बाद भी कई प्रदेशों से बीजेपी सांसदों व विधायकों की घृणित बयानबाजी का सिलसिला थमा नहीं है।

सत्ताधारी नेताओं के बयानों का असर सीधे तौर पर जमीन पर दिख रहा है। केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली के कई क्षेत्रों में सब्जी बेचने वाले गरीब रेहड़ी पटरी वालों के आधार कार्ड बाकायदा सुरक्षा बल व पुलिस के जवान चेक कर रहे हैं। नाम से अगर वे मुसलिम समुदाय के पाये जा रहे हैं तो उन्हें फेरी लगाकर सब्जी बेचने की इजाजत नहीं है। उत्तराखंड में बीजेपी के एक विधायक महेंद्र भट्ट ने तो लोगों से बाकायदा अपील की है कि वे बिजनौर व नजीबाबाद से आने वाली सब्जी ना खरीदें क्योंकि इसका कारोबार मुस्लिम लोग करते हैं। उनके इस बयान पर राज्य व केंद्र की बीजेपी सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई।

देश के जाने माने कथाकार व जामिया यूनिवर्सिटी में हिंदी प्रोफेसर रहे डॉ असगर वजाहत ने पूछा है, "देश में दो संप्रदायों के खिलाफ अविश्वास, घृणा और हिंसा का माहौल बनाने वाले पत्रकार व मीडियाकर्मी इस विभाजन को भड़काकर देश की सेवा कर रहे हैं या अहित कर रहे हैं। वे ऐसा जहर बो रहे हैं जो देश के बच्चे बच्चे को घृणा और नफरत से भर देगा। डॉ वजाहत देश के उन जानेमाने विद्वानो में शामिल हैं, जिन्होंने मार्च में कोरोना महामारी के बीच जमातियों द्वारा दिल्ली की निजामुद्दीन मसजिद की मरकज में धार्मिक जलसे के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की भी मांग की थी।

दूसरी ओर अल्टन्यूज़ के कोफाउंडर प्रतीक सिन्हा कहते हैं, "पुराने और फेक वीडियो चलाकर देश में ऐसा झूठा माहौल पैदा किया जा रहा है जैसे कि भारत में इस्लामी फोबिया खड़ा किया जाए। कुछेक लोगों ने मूर्खतावश अगर गलत किया भी है तो उसके लिए पूरे मुसलिम संप्रदाय को दोषी क्यों माना जाए।"

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