केंद्र द्वारा संविधान की प्रस्तावना की नई व्याख्या: गणतंत्र मतलब संसद की नई इमारत और भाईचारे का अर्थ शौचालय

सरकार के लिए गणतंत्र का अर्थ संसद की नई इमारत, उत्तर पूर्व में शांति (?) और डिजिटल सशक्तीकरण और वित्तीय समावेश है। सबसे हास्यास्पद है सरकार द्वारा बंधुत्व की व्याख्या करते हुए लिखना कि उसने 11 करोड़ शौचालय बनाए हैं (क्या बंधुत्व के लिए?)

प्रतीकात्मक फोटो
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ए जे प्रबल

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मोदी सरकार के अधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट से देश के संविधान की प्रस्तावना को जारी किया गया। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें से सोशलिस्ट और सेक्युलर (समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष) दोनों शब्द गायब हैं। इसे लेकर अपेक्षानुसार प्रतिक्रियाएं होनी ही थीं।

मोदी सरकार के नागरिक संपर्क एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से संविधान की प्रस्तावन के साथ ही कई पोस्ट की गई हैं। इसमें कहा गया है कि ‘जब हम भारत गणराज्य के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, आइए अपने संविधान की मूल प्रस्तावना पर फिर से विचार करें। नया भारत इन मूलभूत सिद्धांतों से कितना मेल खाता है? समय चक्र के माध्यम से आइए एक नज़र डालें और यह पता लगाएं कि भारत अपनी जड़ों के प्रति सच्चा रहते हुए कैसे विकसित हुआ है।‘

स्पष्ट तौर पर इस प्रस्तावना से वह दोनों शब्द गायब थे जिन्हें संविधान संशोधन के तहत 1976 में शामिल किया गया था। और साथ ही सरकार के आलोचकों के उन आरोपों की पुष्टि भी हो गई कि केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ है और पसंदीदा पूंजीवादियों का साथ देती है।

दरअसल कुछ अतीत में चलें तो 2015 में मोदी सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने क विज्ञापन जारी किया था जिसमें संविधान सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर वाले संविधान की मूल प्रस्तावना को प्रकाशित किया गया था। नंदलाल बोस की कैलीग्राफी वाली इस प्रस्तावना में वह दो शब्द गायब थे जिन्हें एक संविधान संशोधन कर 1976 में प्रस्तावना में शामिल किया गया था। यह दो शब्द थे सोशलिस्ट और सेक्युलर यानी समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष। इस पर उस समय तीखी प्रतिक्रिया हुई थी।

इस पर यूपीए सरकार के एक पूर्व मंत्री ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि बीजेपी सरकार 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्दों को 'सांप्रदायिक' और 'कॉर्पोरेट' से बदलना चाहती है। इस मामले पर आरएसएस ने चुप्पी साधे रखी थी और केंद्रीय मंत्रियों की प्रतिक्रिया भी बंटी हुई दिखी थी। हां, रविशंकर प्रसाद ने सार्वजनिक बहस की मांग की थी और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने जोर देकर कहा था कि संविधान की प्रस्तावना से इन दो शब्दों को हटाने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

ध्यान दिला दें कि संविधान सभा में निश्चित ही इस बात पर बहस हुई थी कि इन दोनों शब्दों को प्रस्तावना में शामिल किया जाए या नहीं। तब बी आर आम्बेडकर ने तर्क दिया था कि सेक्युलर शब्द को प्रस्तावना में शामिल करने की जरूरत नहीं है क्योंकि पूरे संविधान की मूल भावना ही एक सेक्युलर देश और धार्मिक आधार पर भेदभाव न करने वाली और सभी नागरिकों को बराबर के अधिकार और दर्जा देने वाला है। सोशलिस्ट शब्द पर डॉ आम्बेडकर ने कहा था कि आने वाले समय में लोगों की बहुसंख्या एक बेहतर सामाजिक संगठन की धारणा अपना सकती है, इसलिए इसे उन लोगों के लिए ही छोड़ दिया जाए।


लेकिन यह पुरानी बहस एक बार फिर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जिंदा हो गई है, क्योंकि बात यहीं खत्म नहीं होती। मूल पोस्ट के बाद की पोस्ट में जो कुछ ग्राफिक्स के जरिए लिखा गया है, उसमें ‘समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व’ के एकदम नए ही अर्थ सामने आते हैं,  साथ ही 'संप्रभुता, लोकतंत्र और गणतंत्र' की भी एक अलग ही तरीके से व्याख्या की गई है।

इन व्याख्याओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार की नजर में गणतंत्र का अर्थ संसद की नई इमारत, उत्तर पूर्व में शांति (?) और डिजिटल सशक्तीकरण और वित्तीय समावेश है। सरकार की इस व्याख्या को देखने के बाद ऐसा लगता है कि राजनीति शास्त्र की किताबों में भी गणतंत्र की नई परिभाषा गढ़ना पड़ेगी, तभी सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट हो पाएगा।

इसी तरह स्वतंत्रता के मायने इस सरकार के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों को निजी पूंजीपतियों के लिए खोलना, कारोबार करने में आसानी (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) और अनुच्छेद 370 हटाने के साथ ही कथित तौर पर महिलाओं, अनुसूचित जाति और जनजातियों, सफाई कर्मचारियों आदि को समानता देना है।

लेकिन सबसे हास्यास्पद है सरकार द्वारा बंधुत्व की व्याख्या। इसके तहत सरकार ने कहा है कि उसने 11 करोड़ शौचालय बनाए हैं (क्या बंधुत्व के लिए?) रेहड़ी-पटरी वालों को कर्ज दिया है सफाई कर्मचारियों को उपकरण मुहैया कराए हैं।


अभी रुकिए, व्याख्याएं खत्म नहीं हुई हैं। समानता का अर्थ बताते हुए सरकार ने कहा है कि इसके तहत 48 फीसदी स्टार्टअप में महिलाएं डायरेक्टर हैं, मुद्रा लोन की लाभार्थियों में 70 फीसदी महिलाएं हैं और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों में 75 फीसदी महिलाएं संयुक्त मालिक हैं। इसके अलावा लोकतंत्र की व्याख्या में महिला आरक्षण, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और डिजिटलीकरण का जिक्र किया गया है। इन्हें एक मजबूत लोकतंत्र की मिसाल बताया गया है।

अब इसके बारे में और क्या बोलें, पाठक खुद ही पढ़कर समझ लें और अनुमान लगा लें कि संविधान की प्रस्ताव का नया सार क्या है।

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