132 साल पहले हिमालय में आई आपदा से हम नेपाल में आई अचानक बाढ़ के बारे में क्या सीख सकते हैं!

1894 की गोहना झील की आपदा दिखाती है कि जब हिमालय को काबू में नहीं किया जा सकता, तब भी समय रहते मिली चेतावनी से जानें बचाई जा सकती हैं।

नेपाल के नुवाकोट जिले में बाढ़ के बाद तबाही की तस्वीर (फोटो : Getty Images)
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बुधवार सुबह नेपाल के रसुवा ज़िले में आई अचानक भयानवह बाढ़ ने यह याद दिला दिया कि जो हिमालय कभी जीवन का स्त्रोत होता था, वह कितनी तेज़ी से तबाही का कारण बन सकता है। इस बाढ़ का पानी, गाद और बड़े-बड़े पत्थर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी सिस्टम में तेज़ी से बहे, जिससे रास्ते में पड़ने वाली बस्तियां और बुनियादी ढांचे तबाह हो गए। वैज्ञानिकों के शुरुआती अनुमानों से पता चलता है कि भोटे कोशी की सहायक नदी, लेंडे खोला में बर्फ़ और चट्टानों का मलबा (आइस कॉक अवालॉन्च) गिरा होगा, जिससे पानी का बहाव अचानक बढ़ गया।

इस फ्लैश फ्लड में पानी की रफ़्तार बहुत ज़्यादा थी। बताया जाता है कि त्रिशूली नदी के बहाव की दिशा में आगे गलछी नाम की जगह पर सिर्फ़ 30 मिनट में नदी का जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ गया। वैज्ञानिक इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या हिमस्खलन के मलबे ने कुछ समय के लिए नदी का रास्ता रोक दिया था, जिससे आगे की तरफ़ अचानक पानी के तेज़ी से बहने की स्थिति बन गई।

ऐसी भू-वैज्ञानिक घटनाओं को रोकने के लिए इंसान बहुत कुछ नहीं कर सकते। लेकिन वे कुछ चीज़ें ज़रूर कर सकते हैं: खतरे को समझना, उस पर लगातार नज़र रखना, चेतावनी देना और लोगों को खतरे वाली जगह से सुरक्षित बाहर निकालना।

इस सबक की बेहद शानदार मिसाल मौजूद है, आधुनिक सैटेलाइट या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से नहीं, बल्कि 130 साल से भी पहले गढ़वाल हिमालय में इंजीनियरों, भूवैज्ञानिकों और प्रशासकों के सामूहिक प्रयास से।

21 सितंबर 1893 को, आज के उत्तराखंड में अलकनंदा की सहायक नदी, बिरही गंगा का रास्ता एक ज़बरदस्त भूस्खलन (लैंडस्लाइड) के कारण रुक गया था। पहाड़ की ऊंची ढलान से हुए इस भूस्खलन ने एक विशाल प्राकृतिक बांध बना दिया था। इसके पीछे पानी जमा होने लगा और आखिरकार गोहना झील बन गई।

यह एक बहुत भी बड़े पैमाने की भू-वैज्ञानिक घटना थी। भू-वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, लाखों टन चट्टानें घाटी में गिर गई थीं, जिससे कई किलोमीटर लंबी और सैकड़ों मीटर गहरी झील बन गई थी।

अधिकारियों को लगभग तुरंत ही समझ आ गया कि झील बहुत बड़ा खतरा है। अगर प्राकृतिक बांध टूट जाता, तो पानी की भारी मात्रा बिरेही और अलकनंदा घाटियों से होते हुए नीचे की ओर बहती और शायद श्रीनगर और उससे आगे तक पहुंच जाती।

इसके बाद जो हुआ, वह हिमालय में व्यवस्थित आपदा-जोखिम प्रबंधन के शुरुआती सबसे उल्लेखनीय उदाहरणों में से एक है।

झील पर नज़र रखने के लिए आर्मी इंजीनियर लेफ्टिनेंट क्रुकशैंक और इंजीनियर थॉमस हॉलैंड को भेजा गया। गोहना और चमोली के बीच एक अस्थायी टेलीग्राफ़ लाइन बिछाई गई ताकि झील के बारे में जानकारी तेज़ी से भेजी जा सके। पानी के स्तर को नियमित रूप से रिकॉर्ड किया गया और इंजीनियरों ने अस्थिर प्राकृतिक बांध के व्यवहार का अध्ययन किया।


अधिकारी सिर्फ़ निगरानी तक ही सीमित नहीं रहे।

नदी के बहाव की दिशा में आगे की तरफ़ निगरानी चौकियां बनाई गईं। अलकनंदा और गंगा की घाटियों में ख़तरे के स्तर तय किए गए। जब ​​नदी का जलस्तर तय सीमा से ऊपर पहुंच जाता, तो जोखिम वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को वहां से हटने के निर्देश दिए जाते थे। सस्पेंशन ब्रिज (झूलते पुल) हटा दिए गए और तीर्थयात्रियों के रास्ते बदल दिए गए। बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में बसे गांवों को खाली करा लिया गया।

सबसे खास बात यह थी कि इंजीनियरों ने यह अनुमान लगाने की कोशिश की कि प्राकृतिक बांध कब टूटेगा।

22 अगस्त 1894 को क्रुकशैंक ने चेतावनी दी कि दो दिनों के भीतर बाढ़ आने की संभावना है। यह भविष्यवाणी बहुत सटीक साबित हुई। 25-26 अगस्त की आधी रात के आसपास, झील का पानी भूस्खलन से बने बांध के ऊपर से बहने लगा और बांध आंशिक रूप से टूट गया, जिससे पानी का एक विशाल बहाव नीचे की ओर बह निकला।

तबाही बहुत ज़्यादा थी। श्रीनगर, जो उस समय गढ़वाल का एक अहम शहर था, पूरी तरह बर्बाद हो गया। खेत, घर, पुल और दूसरे बुनियादी ढांचे बह गए। उस समय के अनुमानों के मुताबिक, छोड़े गए पानी की मात्रा 10,000 मिलियन क्यूबिक फ़ीट से ज़्यादा थी।

फिर भी, सबसे अहम आंकड़ा पानी की मात्रा या बर्बाद हुई संपत्ति का नहीं था। यह मरने वाले लोगों की संख्या थी। इस दुर्घटना में लगभग किसी की जान नहीं गई।

उस समय के बयानों से पता चलता है कि घाटी में चेतावनी भेज दी गई थी और लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया गया था। बाद के एक ब्यौरे में एक ऐसे परिवार के पांच सदस्यों की मौत का ज़िक्र है जिसने वहां से हटने की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया था; वहीं, इतिहास के दूसरे ब्यौरों में कहा गया है कि इस घटना में किसी की जान नहीं गई।

इससे मिलने वाली सीख यह नहीं है कि आपदाओं को रोका जा सकता है।

गोहना की कहानी प्रकृति पर जीत हासिल करने की नहीं है। भूस्खलन को रोका नहीं जा सका। झील को बस चाहने भर से खत्म नहीं किया जा सकता था। जब आखिरकार बांध टूटा, तो बाढ़ को रोका नहीं जा सका।

जिस चीज़ को नियंत्रित किया जा सकता था, वह थी जोखिम के संपर्क में आना।

गोहाना झील अगले 76-77 सालों तक छोटे रूप में बनी रही। जुलाई 1970 में, अलकनंदा बेसिन में एक और ज़बरदस्त बाढ़ आई, जिससे झील गाद से भर गई और अंततः वह पूरी तरह नष्ट हो गई। 1970 की इस आपदा में सैकड़ों लोग मारे गए और पूरी घाटी में भारी तबाही हुई।


1894 और 1970 की घटनाओं में अंतर से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हिमालय का मिज़ाज तो वैसा ही अनिश्चित बना रहा। जो चीज़ें बदलीं, वे थीं घटना का स्वरूप और पैमाना, ज़मीनी हालात, और लोगों व बुनियादी ढांचे की कमज़ोरी।

आज हमारे पास ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसके बारे में 1894 के एडमिनिस्ट्रेटर शायद ही सोच सकते थे। सैटेलाइट पहाड़ की उन ढलानों को बार-बार स्कैन कर सकते हैं, जहां पहुंचना मुश्किल है। भूकंप मापने वाले यंत्र अचानक होने वाली हलचल का पता लगा सकते हैं। नदी के गेज पानी के लेवल का डेटा रियल-टाइम में भेज सकते हैं। हाई-रिज़ॉल्यूशन वाली तस्वीरें भूस्खलन, अस्थिर ढलानों और ग्लेशियर की बदलती स्थितियों की पहचान कर सकती हैं। वैज्ञानिक यह मॉडल बना सकते हैं कि कैसे कोई रुकावट सैकड़ों किलोमीटर दूर नीचे की ओर बाढ़ की लहर में बदल सकती है।

लेकिन टेक्नोलॉजी तभी काम की होती है, जब उसे असल काम में बदला जाए।

1894 में, एक अस्थायी टेलीग्राफ लाइन शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम का हिस्सा बनी। आज हमारे पास सैटेलाइट, मोबाइल फोन, ऑटोमेटेड सेंसर और डिजिटल कम्युनिकेशन मौजूद हैं।

सवाल यह है कि क्या हमने ऐसा सिस्टम बनाया है जो उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके चेतावनी के लिए कुछ कीमती मिनट दे सके—और उन मिनटों की मदद से लोगों की जान बचाई जा सके?

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