नोटबंदी के 2 साल: आखिर क्या हुआ था नोटबंदी से एक दिन पहले और नोटबंदी वाले दिन !

‘नोटबंदी करके हमने एक झटके में आतंकवाद, ड्रग माफियाऔर अंडरवर्ल्ड की कमर तोड़ दी।’ यह कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के बाद। क्या ऐसा हुआ? इस रिपोर्ट में देखिए नोटबंदी से एक दिन पहले और नोटबंदी वाले दिन रात 8 बजे से पहले क्या-क्या हुआ था?

नवजीवन ग्राफिक्स
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उत्तम सेनगुप्ता

8 नवंबर को नोटबंदी के दो साल पूरे हो रहे हैं। इसके विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करने के लिए हमने लेखों की एक श्रृंखला शुरू की है। पिछले लेखों में हमने बताया कि किस तरह नोटबंदी के फैसले से आम लोगों का जीवन दुखों से भर गया और इसके पीछे कौन सा अंतरराष्ट्रीय गठबंधन था। हमने सरकारी आंकड़ों को सामने रख जानने की कोशिश की कि आखिर नोटबंदी के पीछे इरादा क्या था सरकार का? आज हम आपको बता रहे हैं कि 8 नवंबर से एक दिन पहले और 8 नवंबर 2016 वाले दिन क्या-क्या हुआ था?

आज नोटबंदी के दो साल पूरे हो गए। इन दो साल में साफ हो गया कि कालाधन न तो नदियों और झीलों में बहा दिया गया और न ही इन्हें जला दिया गया। प्रधानमंत्री ने तो ऐसा ही दावा किया था। लेकिन हुआ क्या, अमीर और अमीर हो गए, और प्रधानमंत्री खामोश। तो 8 नवंबर, 2016 को हुआ क्या था? चलिए सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर आपको बताते हैं।

सूत्र बताते हैं कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में बताया कि उन्होंने खुद नोटबंदी के मुद्दे पर रिसर्च की है, और अगर यह नाकाम हुई तो इसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उन्हीं पर होगी। नोटबंदी के बाद कई मंत्रियों ने अपने मीडिया मित्रों से यह बात साझा की थी।

यह बात साझा करते हुए पीएम का लहजा वही विशिष्ट अहंकारी लहजा अपनाया था। रिजर्व बैंक ने नोटबंदी के मामले की जांच कर रही संसद की लोक लेखा समिति यानी पब्लिक अकाउंट्स कमेटी को लिखित में बताया था कि नोटबंदी के प्रस्ताव पर यूं तो कई महीनों से चर्चा हो रही थी, लेकिन सरकार ने सिर्फ 7 नवंबर 2016 को आरबीआई को एक नोट में कहा था कि, रिजर्व बैंक को ₹500 और ₹1000 के नोट बंद करने पर विचार करना चाहिए। यह नोट मिलने के बाद रिजर्व बैंक बोर्ड की अगले दिन यानी 8 नवंबर 2016 को शाम 5.30 बजे बैठक हुई।

हालांकि अभी तक यह नहीं साफ है कि आरबीआई बोर्ड की बैठक में हिस्सा लिया। वैसे उस समय बोर्ड की बैठक में आरबीआई गवर्नर, दो डिप्टी गवर्नर, गेट्स इंडिया फाउंडेशन के हेड, महिंद्रा एंड महिंद्रा के सीएफओ और तीन बड़े सरकारी अफसरों को शामिल होना था। यह सूचना भी सामने नहीं आई है कि यह बैठक कितनी देर चली थी और इसमें क्या चर्चा हुई थी।

आरबीआई इस बैठक की जानकारी देने से लगातार इनकार करता रहा है। तमाम आरटीआई के जवाब नहीं दिए गए और न ही आरबीआई ने इस बोर्ड बैठक के मिनट्स ही सार्वजनिक किए हैं।

लेकिन, यह बैठक ज्यादा देर तो नहीं ही चली होगी, क्योंकि 8 बजते-बजते प्रधानमंत्री टीवी पर पहुंच चुके थे और ऐलान कर रहे थे कि आधी रात से देश की 86 फीसदी नकदी गैरकानूनी हो जाएगी। वैसे इस ऐलान से पहले उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल को इस बारे में जरूर बताया होगा।

अब अगर परिस्थिति जन्य साक्ष्य देखे जाएं तो नोटबंदी के फैसले में सारी उंगलियां सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री की तरफ ही उठ रही हैं। लेकिन कई सवाल हैं जिनका अधिकारिक रूप से सरकार ने आज तक जवाब नहीं दिया है:

  • देश की 86% नकदी को गैरकानूनी घोषित करने की योजना किसकी थी?
  • इसके लिए 8 नवंबर 2016 की ही तारीख क्यों और किसके द्वारा चुनी गई?
  • और, किसकी राय पर इस फैसले को लागू किया गया?

वैसे नोटबंदी के बाद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने संसद काफी अनमने ढंग से बताया था देश की मौद्रिक नीति तो आरबीआई ही चलाती और तय करती है, सरकार तो सिर्फ आरबीआई की सिफारिशों पर अमल करती है।

लेकिन पीयूष गोयल का यह बयान आरबीआई के उस लिखित जवाब से उलट है जो उसने पीएसी के सामने दिया है। यह उस बयान से भी अलग है जो प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के करीब एक सप्ताह बाद 13 नवंबर को दिया था। उन्होंने कहा था कि, “मैंने दस महीने पहले इस बड़े ऑपरेशन के लिए एक छोटी सी टीम बनाई थी। नए नोट छापना, उन्हें बैंकों तक पहुंचाना, यह एक बड़ा काम था, हमने होशियारी से इसे सबसे छिपाकर रखा क्योंकि भ्रष्ट लोगों के सरकार में भी बहुत सारे सूत्र छिपे हुए हैं।”

लेकिन इस ‘छोटी सी टीम’ में कौन-कौन था, पीएम ने आज तक नहीं बताया है।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने स्पष्ट किया था कि सरकार ने उनसे नोटबंदी के बारे में चर्चा की थी और उन्होंने मौखिक रूप से इसपर एतराज़ जताया था। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने सरकार को इसके नुकसान के बारे में बताया था और कहा था कि इसके लिए बड़े पैमाने पर तैयारियों की जरूरत होती है।

वहीं, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि नोटबंदी को लेकर सरकारी तैयारियां पहले से हो गई थीं। आर गांधी अप्रैल 2017 में रिटायर हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि नोटबंदी से होने वाले नुकसान की सबको जानकारी थी, यहां तक कि नोटबंदी के बाद जो सर्कुलर समय-समय पर आरबीआई ने जारी किए थे, वे भी पहले से तैयार कर लिए गए थे।

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इसका अर्थ हुआ कि नोटबंदी के बारे में आरबीआई गवर्नर को नहीं पता था, लेकिन डिप्टी गवर्नर को सारी जानकारी थी। आर गांधी ने बताया था कि नोटबंदी से बहुत पहले ₹2000 के नोट छापने का काम शुरु हो चुका था। लेकिन हैरानी इस बात की है कि जब रघुराम राजन ने अगस्त-सितंबर 2016 में आरबीआई की जिम्मेदारी उर्जित पटेल को सौंपी तो 29 अगस्त को उन्हें दी गई जरूरी रिपोर्ट में उन्होंने नोटबंदी का कोई जिक्र ही नहीं किया और न ही यह बतायाकि ₹2000 के नोट छापे जा रहे हैं।

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कुल मिलाकर बात यह है कि नोटबंदी के 2 साल बाद भी देश को यह नहीं पता है कि 8 नवंबर से पहले और बाद में आखिर हुआ क्या था। कोई बात अगर यकीन से कही जा सकती है, तो वह यह है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी थे, जिन्हें सब पता था। और जैसा उन्होंने खुद कहा था, नोटबंदी की नाकामी की जिम्मेदारी भी सिर्फ उन्हीं की है।

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