चुनाव आयोग अचानक वोटरों पर इतना मेहरबान क्यों? रियायतों के सिलसिले के पीछे क्या है वजह?
एसआईआर प्रक्रिया की आलोचना तेज होने और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पहुंचने के बाद चुनाव आयोग ने कई प्रक्रियात्मक छूट और स्पष्टीकरण पेश किए हैं। आखिर चुनाव आयोग अचानक वोटरों पर इतना मेहरबान क्यों?

चुनाव आयोग ने आखिर स्पेशल समरी रिवीजन का ऐलान क्यों किया, जबकिे 2025 और 2026 में इस सालाना प्रक्रिया को नजरंदाज कर चुका है
अन्य राज्यों में अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बीच, दिल्ली के वोटरों के मामलों की फिर से जांच की जा रही है, जिनके डेटा में विसंगतियां पाई गई थीं
विपक्ष की आलोचना और न्यायिक जांच ने आयोग द्वारा दी गई रियायतों के समय पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव आयोग ने आखिर अचानक इस सप्ताह मतदाता सूचियों के 'विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण' (Special Summary Revision) की घोषणा की है, जिसके लिए 1 जनवरी, 2027 को पात्रता तिथि तय की गई है। जबकि इसने खुद ही 2025 और 2026 में यह प्रक्रिया अपनाई ही नहीं थी। क्या यह कदम उस आलोचना के बाद उठाया गया है जिसमें कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग जानबूझकर युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के पंजीकरण में रुकावटें खड़ी कर रहा है। वहीं दूसरी ओर, पिछली प्रक्रियाओं में छूट गए पुराने मतदाताओं को 'फॉर्म 6' भरकर नए मतदाता के रूप में फिर से पंजीकरण करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
एसआईआर प्रक्रिया की आलोचना तेज होने और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पहुंचने के बाद चुनाव आयोग ने कई प्रक्रियात्मक छूट और स्पष्टीकरण पेश किए हैं। चुनाव आयोग ने पारदर्शिता, मतदाताओं के नाम काटना, उनके नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल करना और फॉर्म 6 में बदलाव से संबंधित मुद्दों को लेकर बार-बार अपने रुख में बदलाव किया है। ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर से स्पष्ट किया है कि उसने चुनाव आयोग के दावे के विपरीत, संशोधित फॉर्म 6 पर कोई फैसला नहीं दिया है और न ही किसी बदलाव को मंजूरी दी है।
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इतना ही नहीं...चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को मतदाता सूचियों की सॉफ्ट कॉपी ऐसे फॉर्मेट में देने के लिए सहमत हो गया है जिसे आसानी से पढ़ा जा सके। यह एक ऐसी मांग थी जिसे चुनाव आयोग कम से कम 2018 से मानने से इनकार कर रहा था; तब कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गई थी, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली थी। आयोग मतदाता सूची में किए गए नए जुड़ावों, हटाए गए नामों और अन्य बदलावों की जानकारी भी राजनीतिक दलों के साथ साझा करने के लिए तैयार हो गया है। साथ ही, वह चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को भी मतदाता सूचियों की ऐसी सॉफ्ट कॉपी देने और राजनीतिक दलों के साथ दावों और आपत्तियों की साप्ताहिक सूची साझा करने के लिए सहमत हो गया है।
चुनाव आयोग ने दिल्ली के उन 33 लाख मतदाताओं की मदद के लिए पहल की है, जिनकी जानकारी में एक सॉफ्टवेयर ने कुछ विसंगतियां (कमियां) पाई थीं। मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने या उनसे अपनी पहचान, उम्र और नागरिकता का सबूत मांगने के बजाय, चुनाव आयोग ने अब यह तय किया है कि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) खुद मतदाताओं के घर जाएंगे और उनके विवरण की जांच करेंगे। वैसे भी, ड्राफ्ट रोल (प्रारूप मतदाता सूची) जारी होने से पहले, उन्हें अपने निर्धारित तीन दौरों के दौरान ऐसा ही करना था। असल में, चुनाव आयोग का दावा है कि दिल्ली में जिन 20 लाख मतदाताओं की जानकारी में कमियां पाई गई थीं, उन्हें रिकॉर्ड गति से ठीक कर दिया गया है।
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दिल्ली के मतदाताओं को यह विशेष सुविधा क्यों दी गई है, और अन्य राज्यों के मतदाताओं को ऐसी सुविधा क्यों नहीं दी गई? पश्चिम बंगाल में, चुनाव आयोग को एक सुविधाजनक बहाना मिल गया है—उनका कहना है कि नाम जोड़ने (जो खुद चुनाव आयोग ने पहली बार किए थे) और हटाने के खिलाफ 37 लाख अपीलें अपीलीय न्यायाधिकरणों के पास लंबित हैं, और इसलिए यह मामला अभी अदालत के पास विचाराधीन है। लेकिन अन्य राज्यों का क्या?
'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' ने पिछले कुछ दिनों में कई रिपोर्टों के ज़रिए खुलासा किया है कि कैसे चुनाव आयोग के सॉफ़्टवेयर ने बिना कोई कारण बताए, मतदाताओं के नाम हटाने के लिए 85,854 फ़ॉर्म अपने आप (ऑटो-जनरेट) तैयार कर दिए। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने इस रिपोर्ट को बेबुनियाद और गुमराह करने वाला बताया। जब 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' ने अपनी अगली रिपोर्ट में सबूत पेश किए, तो सीईओ ने इसकी पुष्टि कर दी। उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाने की कोशिशों की भी पुष्टि की। जब मीडिया ने उनसे संपर्क किया, तो सीईओ ने इसे 'छोटी-मोटी गलतियों और तकनीकी खामियों' कहकर टाल दिया और शिकायत की कि 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' ने आयोग को पर्याप्त समय नहीं दिया।
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'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' की रिपोर्ट के अनुसार, सीईओ ने यह नहीं बताया है कि 80 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम बिना किसी कारण के, या फिर वर्णमाला के अक्षरों (ए, बी या सी) को कारण बताकर क्यों हटा दिए गए। सीईओ और आयोग ने उन लोगों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है, जिन्होंने बड़ी संख्या में नाम हटाने की कोशिश की।
गुजरात, कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे अन्य राज्यों में लगाए गए इसी तरह के आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। चुनाव आयोग को निश्चित रूप से कई सवालों के जवाब देने हैं। लेकिन, हाल के दिनों में दी गई रियायतों के क्रम का क्या कारण है? इसका एकमात्र संभावित कारण यह है कि चुनाव आयोग दबाव और न्यायिक जांच के दायरे में है, और वह अपने ऊपर लगे आरोपों के असर को कम करने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी के नेतृत्व में 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के नेताओं द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। ऐसा लगता है कि ये रियायतें पहले से ही एक बचाव का रास्ता तैयार करने की कोशिश हैं, ताकि जब यह मामला अदालत के सामने आए, तो उनके पास पेश करने के लिए कोई तर्क हो।
आलोचकों का तर्क है कि अगर ये ढील अभी दी जा सकती है, तो इसे पहले भी लागू किया जा सकता था। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि ये कदम कानूनी दबाव में उठाए गए हैं। संपादकीय टिप्पणियों और विपक्ष की याचिकाओं में भी स्पष्ट रूप से यही बात कही गई है।
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