हुकूमत की नजर में दुश्मन, पर एक-दूसरे के हमदर्द

सड़क पर पुलिसिया लाठी और घर में राजनीतिक असहमति झेलते आंदोलनकारी युवाओं के लिए एकजुटता ही सबसे बड़ा सहारा  

12 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक नेताओं ने राहुल गांधी की अगुवाई में दिल्ली के बाराखम्बा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला (फोटो - @INCIndia)
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मैं अपनी खिड़की के पास बैठी हूं। रात का घना अंधेरा, सूरज के तयशुदा उजाले के आगे घुटने टेक रहा है। मेरे घुटनों और पीठ में तेज दर्द है, और इसी हाल में मैं दिन की अपनी संभवतः आखिरी संकट भरी पुकार (डिस्ट्रेस कॉल) का जवाब देती हूं। साथियों के महफूज घर लौटने की तसल्ली करके घर लौट रही एक स्वयंसेवी ने मुझसे कहा- ‘शनिवार को मेरा इरादा घर पर रहकर सिर्फ किताब पढ़ने का था’।

देश का युवा एक अघोषित जंग के मुहाने पर है, और यह जंग अब हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर तक आ पहुंची है। हमारे मां-बाप ने अब यह पूछना छोड़ दिया है कि हम कहां जा रहे हैं; वे बस यह पूछते हैं कि चोट कहां लगी है। अपनी आरती उतारने में मदहोश 76 साल के एक नेता के चरणों में अपनी समझ-बूझ गिरवी रख चुके रिश्तेदार हमें कुलघाती और कुल-कलंक करार देते हैं क्योंकि हम सवाल पूछते हैं।

हम पहले पुलिस और अर्धसैनिक बलों से लोहा लेते हैं, जो अपनी भड़ास हमारे जिस्मों पर लाठियां बरसाकर निकालते हैं। फिर हमारा सामना उस जहरीले मीडिया से होता है, जिसके फेफड़े नफ़रत से लबालब हैं और जो अपने वातानुकूलित स्टूडियो के नफ़रती तमाशे में हमें ‘दिमागी नक्सल’, ‘राष्ट्रविरोधी’, ‘पाकिस्तान-परस्त’ और न जाने क्या-क्या तमगे बांटता रहता है।

हम वकीलों की भारी-भरकम फीस, मुकदमों (एफआईआर), जमानत की तारीखों और घर खरीदने के लिए जोड़ी गई पूंजी के लुटने से भी जूझते हैं। उस पेशेवर माहौल में भी लड़ना पड़ता है जहां अपनी राय जाहिर करने से कहीं ज्यादा सुरक्षित अपना सिर झुकाए रखना माना जाता है। हम उस जिंदगी को गढ़ने की जद्दोजहद कर रहे हैं जिसकी शुरुआत अभी कायदे से हुई भी नहीं है। मेरा इनबॉक्स अंधभक्ति के कानफोड़ू राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाने पर आमादा संघी लंपटों की बलात्कार और जान से मारने की धमकियों से अटा पड़ा है। वे तड़के फोन करके यह भांपते हैं कि क्या मेरी आवाज कांप रही है। हां, आवाज कांपती है। मगर हम उनसे भी लड़ते हैं।

जब मैं मेघनाद और राजीव के साथ ‘प्रोटेस्ट सपोर्ट इनिशिएटिव’ से जुड़ी, तो अच्छी तरह पता था कि आने वाले महीने मुश्किल इम्तिहान के होंगे। डिटेंशन कैंप में चिकित्सीय मदद दे रही एक स्वयंसेवी से मैंने कहा- ‘मैं किसी दूसरे इंसान की हिफाजत का जिम्मा अपने हाथों में लेने के लिए कतई तैयार नहीं।’ उसने जवाब दिया- ‘मुझे लगता है कि हमने यह सब ठोकर खाकर सीखा है, क्योंकि हमारी जगह लेने कोई दूसरा नहीं आ रहा था और हम किसी को भी पीछे बेसहारा नहीं छोड़ सकते थे।’


जेल में मुकदमे का सामना कर रहीं एंजेला डेविस को खत लिखते हुए जेम्स बाल्डविन ने एकजुटता की अहमियत को बताया था: ‘अगर वे सुबह तुम्हें ले जाते हैं, तो समझ लो कि उसी रात वे हमारे लिए भी आ रहे होंगे।’

मुझे जुलाई के नीट विरोधी प्रदर्शनों की याद आती है, जब सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे हमारे हमख्याल अजनबियों द्वारा भेजा गया खाना पहुंचाने के लिए गिग वर्कर दिन का अपना आठवां चक्कर लगा रहे थे। ये वे तथाकथित ‘विदेशी एजेंट’ हैं जो फासीवादियों से मोर्चा ले रहे चंद युवाओं का पेट भर रहे थे। बमुश्किल बीस साल का एक लड़का आलू भुजिया का पैकेट लिए खड़ा था और आने-जाने वालों से मुट्ठी भर भुजिया चखने की जिद कर रहा था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे; प्रदर्शनकारियों के पास सब कुछ था लेकिन भुजिया नहीं थी। इसलिए वह वही लेकर चला आया।

मुझे अनूपा की याद आती है जो बेंगलुरु से केयर पैकेज और आर्थिक इमदाद भेज रही थीं, और हांगकांग में बैठा रायन जो स्क्रीन के पीछे रहकर संदेश फैलाने, चंदा जुटाने और झूठे नैरेटिव की हवा निकालने में मदद कर रहा था। इस आंदोलन का भूगोल हमेशा शहर की हदों से कहीं आगे तक फैला रहा है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो सड़कों पर डटे हैं, और वे भी जो उनके डटे रहने को मुमकिन बना रहे हैं।

निगरानी वाले कैमरे आपको यह कभी नहीं दिखाएंगे। वे तो आपको यही यकीन दिलाना चाहेंगे कि हम बेकार, निकम्मे और अपने मोबाइल स्क्रीनों से चिपके ऐसे सिरफिरे हैं जो सिर्फ उपद्रव मचाने के लिए जमा हुए हैं। उनके मेटा चश्मे और हाई-टेक उपकरण-जो महिलाओं के साथ दरिंदगी होते वक्त बड़ी बेशर्मी से अंधे हो जाते हैं-लोकतांत्रिक अधिकार की हिफ़ाज़त के लिए एक-दूसरे से सटे नौजवानों की कतारों को तो कैद कर सकते हैं, मगर उनके लेंस इतने संकीर्ण हैं कि वे उस करुणा और सूझबूझ को रिकॉर्ड नहीं कर पाते जो इस संघर्ष की रूह है। और इन तमाम मुश्किलों के बाद हम उस सुनियोजित राष्ट्रीय ढोंग से लड़ते हैं जो हमें लगातार यह समझाने पर तुला रहता है कि यह सब सिर्फ हमारा वहम है और मुल्क में ‘सब चंगा सी’।

एक प्रदर्शनकारी लड़की पर उसके भाई के खाने की मेज पर आरोप मढ़ दिया गया कि वह अपनी हिरासत के बारे में ‘बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर’ पेश कर रही है। वह किसके सच को खींच रही थी? अपने खुद के सच को, या उस निरंकुश और कायर हुक्मरान के आगे घुटने टेकने वालों के पाखंड को?

किसी इंसान पर क्या बीतती होगी जब वह किसी खौफनाक दौर से गुजरे और फिर उसी को साबित करने के लिए गिड़गिड़ाना पड़े कि वाकई ऐसा हुआ था? अपनी आंखों के सामने सबूतों को तैरते देखना और फिर भी रिपब्लिक टीवी देखकर मतिभ्रम के शिकार लोगों से यह सुनना कि आपने इस पूरे मामले को खुद गढ़ा और इसका राजनीतिकरण किया है?


आप अपनी आपबीती, अपने घाव और सबूत सिर्फ एक हद तक ही दिखा सकते हैं। लेकिन जब किसी झूठ को झुठलाने के लिए सच की तुलना में कहीं ज्यादा मशक्कत करनी पड़े, तो इंसान अपनी ही जिंदगी के मुकदमे में खुद ही पूर्णकालिक वकील बनकर रह जाता है।

लिहाजा, जब राहुल गांधी ने ‘चलो दिल्ली’ मार्च के साथ बाराखंभा रोड पर कदम रखा, तो ऐसा लगा जैसे धुएं की घुटन भरे कमरे की कोई खिड़की अचानक खोल दी गई हो। पिछले चार महीनों से मैं और मेरे जैसे तमाम युवा अपने उस दर्द और संघर्ष को व्यवस्था की नजरों में दर्ज कराने की जंग लड़ रहे हैं, जिसे उन लोगों द्वारा तार-तार किया जा रहा था जो हालात से कोसों दूर थे। हम भूल चुके हैं कि एक रात चैन की मुकम्मल नींद क्या होती है। खौफ और गुस्सा हममें भीतर तक भर गया है, और यह बेपनाह थकान सब कुछ छोड़कर घर लौट जाने का बहाना जैसी लगती है। एक ऐतिहासिक लम्हे में उन्होंने हमें उस दिशाहीन भंवर से बाहर खींच लिया।

अगर मैं विपक्ष के नेता की सिर्फ उनका संवैधानिक फर्ज निभाने के लिए तारीफ कर रही हूं, तो यह साफ जाहिर करता है कि हम किस स्याह दौर में जी रहे हैं। मुझे ‘द थ्रीपेनी ओपेरा’ में बर्टोल्ट ब्रेख्त की कही बात याद आती है: ‘पहले रोटी आती है, फिर नैतिकता।’

मेरे पास इतना वक्त और सहूलियत नहीं है कि राहुल गांधी की नीयत का पोस्टमार्टम करने बैठूं, जबकि हकीकत यह है कि उनके इस कदम से हमारे आंदोलन को सीधा सहारा मिला है। जो लोग अपनी असहमति की कीमत अपनी रोजी-रोटी, सुरक्षा और मानसिक सुकून दांव पर लगाकर चुका रहे हैं, उनसे यह मांग करना बेतुका है कि वे पहले उस नेता की नैतिक शुचिता का प्रमाणपत्र हासिल करें जिसने कम-से-कम उनकी बात सुनने की जहमत तो उठाई।

मुझे पेड ‘खांग्रेसी’ कहकर ट्रोल करने वाले कम-से-कम अपने बुनियादी हिज्जे तो दुरुस्त कर लें। खुद को राजनीति से दूर और ‘तटस्थ’ बताने वाले जो लोग यह रट लगा रहे हैं कि वे यह सब केवल वोटों और कुर्सी की चाहत में कर रहे हैं, उनसे मेरा सीधा सवाल है: इसमें आफत क्या है? क्या किसी नेता का यह समझ लेना कोई जुर्म है कि अवाम के दर्द को आवाज देना राजनीतिक रूप से भी मुफीद हो सकता है?

और अगर मैं यह बात सरेआम कह रही हूं, तो इसलिए ताकि विपक्ष के नेता भी इसे पूरी संजीदगी से सुनें। हम याद रखेंगे कि वे आए और उन्होंने हमारी मांगों को जवाब देने के काबिल समझा। लेकिन यह एकजुटता तब भी कायम रहनी चाहिए जब कैमरे रुख मोड़ लें और इस मुद्दे की राजनीतिक उपयोगिता खत्म हो जाए। हम उनसे और ज्यादा कदम उठाने की मांग करते रहेंगे और जब भी वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरेंगे, हम उनसे सवाल पूछेंगे। दांव इतने बड़े हैं कि अहसान के बोझ तले जुबान नहीं सिली जा सकती। और सत्ता से सवाल पूछने के जिस हक की वे वकालत कर रहे हैं, उस हक के तहत उन्हें हमसे भी ऐसे ही तीखे तेवरों की उम्मीद रखनी चाहिए।


इस मुल्क के नौजवानों पर खामोश रहने या किसी की अंधी वफादारी करने का कोई कर्ज नहीं। हमारा सिर्फ इतना सा दायित्व बनता है कि हम अपनी सुरक्षा और जमीर के बीच समझौता किए बिना एक बेहतर भविष्य की मांग कर सकें।

जब मैं ये आखिरी पंक्तियां लिख रही हूं, तो क्षितिज पर सुबह की पहली किरण फूट रही है। मैं बालकनी में आती हूं, जहां बगल के फ्लैट के ब्लूटूथ स्पीकर से श्रेया घोषाल की गाई नज्म गूंज रही है-’वो सुबह हमीं से आएगी’।

मेरी दिली ख्वाहिश है कि सिर्फ एक बार यह देश इस बात पर यकीन कर ले।

(स्वर्णा भटनागर राजनीतिक और सामाजिक आंधियों को शब्दों में पिरोने का हुनर रखने वाली लेखिका)

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