विष्णु नागर का व्यंग्यः संघियों-भाजपाइयों को सलाह- अब तमीज से बहस करना सीखो, यह 20 जुलाई के बाद का समय है

तुमने पार्टियां खरीद लीं, नेताओं को खरीद लिया, ईडी-सीबीआई पीछे लगा दी मगर एक नेता को भी तार्किक बहस के लिए तैयार नहीं कर सके क्योंकि तर्क और विवेक से तुम्हारी जानी दुश्मनी है। कोई तुम्हारे सर्वोच्च नेता के आगे बुद्धिमान, तार्किक दिखे, यह उन्हें मंजूर नहीं।

संघियों-भाजपाइयों को सलाह- अब तमीज से बहस करना सीखो, यह 20 जुलाई के बाद का समय है
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संघियों-भाजपाइयों वक्त आ गया है कि अब तुम तमीज से बहस करना सीखो। कुछ भी बक- बक करने से अब तक काम चल गया, अब नहीं चलेगा। आगे बहस में टिकने की क्षमता ही काम आएगी। कांवड़ ढोना नहीं, जयश्री राम करना नहीं, हिंदू-मुस्लिम खेलना नहीं। इसका समय अब गया। आगे बढ़ो। संयम से बहस करना, तर्क़ करना, तथ्य रखना सीखो। लफ्फाजी का लाभ जितना मिल सकता था, तुम्हारे नेता को मिल चुका। वह इसके जितने मजे ले सकता था, ले चुका। अब उसका बदन सूखने लगा है, मुंह से झाग आने लगे हैं। ये रणनीति अब कारगर नहीं रही। जरूरत से ज्यादा एक्सपोज़ हो चुकी है, उसका पर्दाफाश हो चुका है। उसकी मियाद खत्म हो चुकी है। एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। अब काम आएगी तो संयमित बहस, चीखना- चिल्लाना नहीं! अमित शाह मत बनो। वे अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। चीख चिल्लाहट को राष्ट्रवाद समझने लगे हैं।

यह जान लो कि अब तुम्हारे पास 2047 तक का नहीं, बल्कि 2029 का पूरा साल भी है या नहीं, कोई निश्चित रूप से नहीं जानता। दुनिया को तुम अपने फतवों, गालियों से बहुत नवाज़ चुके। देशद्रोही, नक्सली, पाकिस्तानी आदि बहुत उच्चार चुके। अब तर्कसंगत बहस ही चलेगी पर बहस के लिए वर्षों तक अध्ययन करना पड़ता है, जिज्ञासु होना पड़ता है, यह संघी- भाजपाइयों के लिए इस जन्म में संभव‌ नहीं और अगला जन्म होता नहीं! नान बायोलॉजिकल कोई होता नहीं।

मसलन तुम आज 'वंदे मातरम्, वंदे मातरम्' पर बच्चों की तरह बहुत उछल रहे हो। अमित शाह जिनकी छात्रों की जबर्दस्त पिटाई के मुद्दे पर जबान तालू से चिपक गई  थी, आजकल वंदेमातरम् के 'योद्धा' बने हुए हैं। इसे सबको पूरा गाना पड़ेगा, इसके हम दो टुकड़े नहीं होने देंगे। कांग्रेस देशविरोधी है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए केवल इसके दो शुरुआती छंद गाना स्वीकार किया था। कांग्रेस नई मुस्लिम लीग है।

अब इस तरह की फतवेबाजियां बेदम हो चुकी हैं। 20 जुलाई के बाद का समय है यह। पहले का नहीं। बहस में अपनी बात को ऐतिहासिक दस्तावेजों से साबित करना होता है। बात का संदर्भ देना होता है। मोदी-शाह नहीं बनना होता। कांग्रेस ने चुनौती दे दी है कि तुम जो कह रहे हो, वह सच नहीं है। 1937 के चुनावों में कांग्रेस मजबूत थी और मुस्लिम लीग तो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी कांग्रेस से हार चुकी थी।

आज की कांग्रेस कह रही है कि तुम्हें जो करना हो, जिस कानून का सहारा लेना हो, ले लो, मगर हम वंदेमातरम पूरा नहीं गाएंगे। 1937 से इसके दो छंद गा रहे हैं, आगे भी वे ही गाएंगे। यह निर्णय महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की अनुशंसा पर महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, नरेन्द्र देव, गोविंद वल्लभ पंत आदि बड़े नेताओं ने लिया था। क्या ये तुम्हारी तरह वोट बैंक पालिटिक्स खेलने वाले लोग थे? देशद्रोही थे? क्या नरेंद्र मोदी- अमित शाह मंडली इनसे भी बड़े राष्ट्रवादी हैं, इनसे भी अधिक प्रखर देशभक्त सिद्ध हैं?


फिर हमें बताएं कि वंदेमातरम को पूरा क्यों गाना चाहिए, दो छंद क्यों नहीं? फिर ये भी बताएं कि 2014 से 2025 तक खुद सरकार के नेता इसके दो छंद क्यों गाते रहे, इसका स्पष्टीकरण दें और यह गलत था तो देश से इसके लिए माफी मांगें! फिर इसकी भी क्षमा मांगें कि आजादी की लड़ाई के समय वंदेमातरम संघ-हिंदू महासभा के नेताओं की जुबान पर क्यों नहीं चढ़ा? कितनी बार इसे वीर सावरकर ने गाया? कितनी बार इसे गुरु गोलवलकर ने गाया?

तुम जो भी कहते हो, मानते हो, उस पर कांग्रेसियों से बहस करो। याद रखो स्वर ऊंचा रखने से बौद्धिक बहसें जीती नहीं जा सकती। अपनी बात को ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सिद्ध करना होता है। चाहो तो अपनी ओर से बहस में प्रधानमंत्री जी को ले आ़ओ और उधर से राहुल गांधी आ जाएं। इनमें से जो भी बहस से भागने की कोशिश करे, उसे भगोड़ा कहो। बहस में तर्क से जो भी इधर-उधर हिले, आयं-बांय-शांय बके, आवाज़ ऊंची करे, वह हारा हुआ, तर्कहीन माना जाए। पप्पू शब्द तुम्हें बहुत पसंद है। उसे राष्ट्रीय पप्पू घोषित किया जाए। इस अवसर पर देशभर में राष्ट्रीय पप्पू दिवस मनाया जाए। राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाए।

तुम कहोगे कि प्रधानमंत्री के पास क्या अकेला यही काम है? सच बताओ, उनके पास कोई और काम है? कभी-कभी किसी फाइल पर दस्तखत करने के अलावा कोई और काम वे जानते हैं?फाइल तक पढ़ना-समझना तो उनके बूते में नहीं, यह वे खुद स्वीकार कर चुके हैं। भारत को पहली बार ऐसा प्रधानमंत्री मिला है!

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चलो फिर भी फाइल के लिए रोज दस मिनट अलग रख देते हैं। बहस के लिए समय निकालने के लिए उन्हें केवल इतना करना होगा कि छह बार की बजाय पांच बार कुर्ता, जैकेट, पजामा बदलें। एक जोड़ी ड्रेस का दैनिक त्याग करें। इससे कपड़े की राष्ट्रीय बचत होगी, टेलर मास्टर का समय बचेगा और बहस की तैयारी के लिए रोज प्रधानमंत्री को काफी समय मिलेगा। देश के लिए गांधी, नेहरू, नेताजी आदि ने अपना संपूर्ण जीवन दान दे दिया जबकि देश आपसे केवल प्रतिदिन एक ड्रेस कम पहनने की अपेक्षा कर रहा है। पचास दिन नहीं, आपसे दिन के पचास मिनट मांगे जा रहे हैं।

समय बचाने के वैसे और भी उपाय हैं लेकिन इन्हें बिना पढ़े ज्ञान बघारने और हास्यास्पद बनने की आदत है, इसकी लगन लग चुकी है। यही स्थिति अमित शाह की है और बीजेपी-संघ के दूसरे सूरमाओं की भी। तर्क और प्रमाण के साथ बहस कर सकने वाला इनमें एक भी शूरवीर नहीं। एक भी नहीं। एक स्वयंसेवक, एक प्रोफेसर, पार्टी का एक भी प्रवक्ता नहीं, जो सिलसिलेवार, सुचिंतित-सुविचारित बहस कर सके। बीजेपी के बड़े-बड़े प्रवक्ताओं को तो टीवी चैनलों की डिबेट में ही राष्ट्रीय जनता दल की युवा प्रवक्ता प्रियंका भारती और आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा जैसी लड़कियां चुटकियों में जमीन सुंघाने की क्षमता रखती हैं।

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तुमने पार्टियां खरीद लीं, नेताओं को खरीद लिया, ईडी-सीबीआई उनके पीछे लगा दी मगर एक नेता को भी समझदारी भरी, तार्किक बहस के लिए तैयार नहीं कर सके क्योंकि तर्क और विवेक से तुम्हारी जानी दुश्मनी है। कोई तुम्हारे सर्वोच्च नेता के सामने बुद्धिमान, तार्किक दिखे, यह उन्हें स्वीकार्य नहीं। सब उनसे बौने दिखने चाहिए।

तो आओ फिर 'दिमागी नक्सल' पर बहस कर लेते हैं क्योंकि इसके लिए तुम्हें दिमाग की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे भी न तुम्हारे दिमाग का पता है, न तुम्हें पता है कि नक्सल क्या होता है। तुम्हारे लिए तो जो भी तुम्हारी काट का नहीं  है- 'दिमागी' भी है और नक्सल 'भी! भाइयों बहनों ग़लत तो नहीं कहा? ताली बजाओ।

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