हमारे देश की तरह दक्षिणपंथी तानाशाही की ओर बढ़ता अमेरिका, ट्रंप की खतरनाक सक्रियता बनी लोकतंत्र के लिए खतरा

ट्रंप धार्मिक कट्टरता और नफरत की राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। आज के दौर में यही गुण नेताओं को महान बनाते हैं। ट्रंप पूरे अमेरिका को क्रिश्चियनमय करना चाहते हैं और काले लोगों के खिलाफ वे लगातार जहर भरे बयान देते हैं। उनकी भाषा भी अभद्र और हिंसक हो चुकी है।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

छद्म राष्ट्रवाद, धार्मिक उन्माद और अंध-कट्टरवाद के मिश्रण से लबरेज नेता इस दौर में जब राजनैतिक दुनिया में आता है, तो जनता उसे शासक बना देती है। फिर वही शासक उस जनता को तबाह करता रहता है, पर जनता धर्म, हिंसा और उन्माद के अफीम के नशे में चूर रहती है-शासक की क्रूरता बढ़ती जाती है, पर अफीम के नशे में डूबी जनता की प्रतिबद्धता में कमी नहीं आती। अपने देश में ऐसा ही माहौल है, पर पृथ्वी के दूसरे गोलार्ध में बसे अमेरिका में भी राजनीति का स्वरुप यही है।

हाल में 6 जनवरी को अमेरिका में ट्रंप के भड़काने के बाद उनके समर्थकों द्वारा कैपिटल, यानि संसद पर किये गए हिंसक हमले की पहली बरसी थी। यह हमला धर्म, हिंसा और उन्माद के अफीम का नतीजा है। इस दिन आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति बाईडेन ने ट्रंप का नाम लिए बिना ही जोरदार और स्पष्ट शब्दों में उन्हें इसका जिम्मेदार ठहरा दिया।

हमारे देश में अनेक राजनैतिक और सामाजिक विश्लेषक कहते हैं कि हमारे देश में नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद से जिस तरह से समाज में धर्म, हिंसा और कट्टरता का समावेश किया गया है, यदि मोदी सरकार चली भी जाए तो इनका असर अगले कई दशकों तक बना रहेगा। अमेरिका में भी ट्रंप का ऐसा ही प्रभाव है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के साथ मिलकर वाशिंगटन पोस्ट ने एक सर्वे किया, जिसके इस वर्ष पहली जनवरी को प्रकाशित नतीजों के अनुसार 34 प्रतिशत अमेरिकन मानते हैं कि सरकार के विरुद्ध हिंसा कोई गुनाह नहीं है।

ऐसा मानने वालों में सभी राजनैतिक विचारधारा के लोग हैं- 40 प्रतिशत रिपब्लिकन, 41 फीसद स्वतंत्र और 23 प्रतिशत डेमोक्रेट सरकार के विरुद्ध हिंसा को जायज मानते हैं। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के 50 प्रतिशत से अधिक समर्थक अमेरिका के प्रजातंत्र पर भरोसा ही नहीं करते, दूसरी तरफ अमेरिका की 60 प्रतिशत से अधिक जनता एक वर्ष पहले संसद पर किये गए हमले के लिए डोनाल्ड ट्रंप को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानती है।


चुनावों में हारने के बाद से ट्रंप ने लगातार यह भ्रम फैलाया कि चुनावों में और इसके नतीजों में बड़े पैमाने पर धांधली के कारण उनकी हार हुई है। हालांकि तमाम कोशिशों के बाद भी ट्रंप अपने पक्ष में एक भी सबूत या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं। पर, अपने राष्ट्रपति काल के दौरान उन्होंने जनता के सामने लगातार जिस राष्ट्रवाद, धार्मिक कट्टरता, हिंसा और उन्माद का महिमामंडन किया है, वह बिना किसी सबूत के भी अपने देश के चुनाव प्रणाली पर अविश्वास करने लगी है।

हाल में ही ऐक्सियोस-मुमेंटीव नामक संस्था द्वारा किये गए सर्वेक्षण के नतीजे प्रकाशित किये गए हैं। इसके अनुसार 40 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी नागरिक मानते हैं कि जो बाइडेन का राष्ट्रपति चुना जाना वैध नहीं है। इन नतीजों के बाद एक खतरनाक तथ्य उभर कर सामने आया है- पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष उन नागरिकों की संख्या कम हो गयी है, जो मानते थे कि ट्रंप की हार के कारणों का चुनावी प्रक्रिया से कोई नाता नहीं है| वर्ष 2020 में ऐसी आबादी 58 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2021 के अंत तक 55 प्रतिशत ही रह गई। जाहिर है, ट्रंप के झूठ का असर व्यापक होता जा रहा है।

कनाडा के एक प्रतिष्ठित राजनीति विशेषज्ञ, थॉमस होमर-दीक्सों ने हाल में ही एक लेख में कनाडा सरकार को आगाह किया है कि अमेरिका में वर्ष 2030 तक दक्षिणपंथी तानाशाही आ जायेगी, इसलिए कनाडा को अभी से तैयार रहना चाहिए। वैसे तो यह लेख कनाडा और अमेरिका से संबंधित है, पर अमेरिका में जिन खतरों की बारे में बताया गया है- उनसे भी बड़े खतरों और लोकतंत्र पर लगातार प्रहार से हमारा देश जूझ रहा है। जाहिर है, यह लेख हमारे देश के लिए और हमारे लोकतंत्र के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

थॉमस होमर-दीक्सों कनाडा के सबसे प्रतिष्ठित राजनैतिक विश्लेषक हैं और चार दशकों से भी अधिक समय से हिंसक गृहयुद्धों का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि उनका लेख आज किसी को भी बकवास लग सकता है और अधिकतर लोग इसके निष्कर्ष को खारिज करेंगे, पर वर्ष 2014 में अमेरिका में ट्रंप चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनेंगे, इस निष्कर्ष को भी अधिकतर लोग खारिज ही करते थे और ऐसे किसी भी आकलन का मजाक उड़ाते थे। ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भले ही बेतुका और विवेकहीन लगता हो, पर आज आप जब दुनिया को देखेंगे तो पूरी दुनिया में ही ऐसे बेतुके और विवेकहीन उदाहरण भरे पड़े हैं और आज के दौर का यही सत्य है।


थॉमस होमर-दीक्सों के आकलन के अनुसार वर्ष 2025 तक अमेरिका में लोकतंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका होगा, भयानक राजनैतिक अस्थिरता होगी और गृहयुद्ध जैसे हालात बन जाएंगे, इसके बाद वर्ष 2030 तक दक्षिणपंथी तानाशाही का दौर आ जाएगा। उनके आकलन के अनुसार वर्ष 2024 के चुनावों में ट्रंप की वापसी होगी। रिपब्लिकन पार्टी द्वारा शासित राज्यों में आज भी वर्ष 2020 के चुनाव नतीजों को नकारा जा रहा है। पिछले 3-4 महीनों के दौरान अमेरिका में ट्रंप ने अनेक बड़ी रैलियां संबोधित की हैं और हरेक जगह उन्होंने पिछले चुनाव नतीजों को नकारा है और लोकतंत्र पर लगातार प्रहार किया है। पिछले चुनावों के बाद से ट्रंप लगातार चुनाव नतीजों पर केवल सवाल ही नहीं उठा रहे हैं, बल्कि अपने समर्थकों से हिंसक हमले भी करवा रहे हैं।

6 जनवरी को ट्रंप फिर से अमेरिका बचाओ रैली कराने का ऐलान कर चुके थे, पर अंत में इसे स्थगित कर दिया गया। इस तारीख को अमेरिका के इतिहास में काला दिन माना गया है, पिछले वर्ष इसी तारीख को अमेरिकी संसद भवन, कैपिटल पर ट्रंप की मौजूदगी में उनके हिंसक समर्थकों ने हमला किया था। इस हमले में 5 जानें गई थीं और 140 से अधिक पुलिस अधिकारी जख्मी हो गए थे। ट्रंप के केवल दो उद्देश्य हैं– चुनाव में धांधली से सम्बंधित प्रमाण की खोज और इसके नतीजों का प्रतिरोध।

चुनाव नतीजों के ठीक बाद कुछ समय के लिए तो महसूस हुआ कि रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप की पकड़ ढीली हो गयी है, पर इसका ठीक उल्टा हो गया। ट्रंप इस समय पहले से भी अधिक मजबूत स्थिति में हैं। पिछले चुनाव नतीजों के समर्थक रिपब्लिकन अपनी ही पार्टी में हाशिये पर कर दिए गए हैं और नतीजों के प्रखर विरोधी पार्टी में मजबूत पदों पर बिठाए जा रहे हैं। ट्रंप के साथ मिलकर चहेता फॉक्स न्यूज और अनेक कट्टर समर्थक रिपब्लिकन पार्टी को एक पार्टी नहीं बल्कि फासिस्ट व्यक्तिवादी सम्प्रदाय में बदल रहे हैं, और यही लोकतंत्र को नष्ट करने का एक कामयाब हथियार है।

थॉमस होमर-दीक्सों के अनुसार अगले चुनावों में जीत के बाद ट्रंप हरेक संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका और फिर मेनस्ट्रीम मीडिया को अपनी तरफ करने का प्रयास करेंगे। इस बार उन्हें सटीक पता होगा कि किन संस्थानों को अपनी विचारधारा के अनुरूप करना है। इसका विरोध करने वाले अफसरशाह, अधिकारी और टेक्नोक्रैट को उत्पीड़न का या फिर नौकरी गंवाने का सामना करना पड़ेगा। जाहिर है, इसका विरोध भी होगा, हिंसा भी होगी, गृहयुद्ध भी हो सकता है- एक फासिस्ट के लिए इनको कुचलना कठिन नहीं है।


ट्रंप धार्मिक कट्टरता और नफरत की राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। आज के दौर में यही गुण नेताओं को महान बनाते हैं। ट्रंप पूरे अमेरिका को क्रिश्चियनमय करना चाहते हैं और काले लोगों के खिलाफ वे लगातार जहर भरे बयान देते हैं। अब तो उनकी भाषा भी अभद्र और हिंसक हो चुकी है। इसके बाद से उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। भले ही यह अमेरिका की बात हो पर इसे आप अपने देश के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं, जहां लोकतंत्र को तानाशाही बनते हम लगातार देख रहे हैं, पर मूक दर्शक बने हैं।

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