विचार

लोकतंत्र और विपक्ष- दूसरी कड़ी: असहमति की पहली आवाज़ बने सिविल सोसायटी तो विपक्ष बनेगा दमदार

विपक्ष के विचार को नकारात्मक टर्म के रूप में देखना बंद करना होगा। विचार-विमर्श और विपक्ष के बिना लोकतंत्र अधूरा है। भविष्य की यही चुनौती है। चिपको, नर्मदा बांध विरोधी आंदोलन, जंगल और भाषा संरक्षण के संघर्ष- जैसे सामाजिक आंदोलनों में बहुत संभावनाएं हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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शिव विश्वनाथन

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। हमने अपने साप्ताहिक अखबार ‘संडे नवजीवन’ के ताजा अंक में इस पर खास तौर पर विचार किया है। दरअसल बात सिर्फ संसद या विधानसभाओं की नहीं है। समाज के हर वर्ग से किस तरह अपेक्षाएं बढ़ गई हैं, यह जानना जरूरी होता गया है। सिविल सोसाइटी आखिर किस तरह की भूमिका निभा सकती है, यह भी हमने जानने की कोशिश की है। कांग्रेस की आने वाले दिनों में क्या भूमिका हो सकती है, इस पर भी हमने बात की है। इस प्रयोजन की दूसरी कड़ी में हम वरिष्ठ शिक्षाविद और राजनीतिक विश्लेषक शिव विश्वनाथन के विचार आपके सामने रख रहे हैं।

जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आए, मुझे काफी सारे लोगों के इस तरह के संदेश मिले कि वे दुखी हैं और यहां तक कि वे असहाय महसूस कर रहे हैं। बाद में मेरे कई मित्रों ने कहा कि ऐसा क्या था जो उनसे छूट गया। क्या खेती-किसानी के गुणा-भाग, नोटबंदी की मूर्खता ने सही मतलब निकालना बंद कर दिया था? क्या राष्ट्र और इसकी सुरक्षा का आडंबर इतना उन्मत्त कर देने वाला था कि हम शांति के ही शत्रु हो गए? बहुसंख्यक तर्क की शक्ति से परिचित होते हुए भी ऐसा लगता है कि इसमें सामूहिक न्याय का अर्थ खो गया है।

अगर लोकतंत्र बहुसंख्यक की प्रक्रिया और चुनाव प्रतिद्वंद्विता का खेल है, तो यह अलग तरह की प्रक्रियाएं हैं जहां हिंदूवादी छोटे शहर की मानसिकता के तौर पर बहुसंख्यकवाद ने राष्ट्रीय आंदोलन के निहित आदर्शों को चुनौती दी है। आशा खोए बिना और समुदाय के तौर पर भावना रचकर इसके खिलाफ किस तरह उठ खड़ा हुआ जा सकता है?

यह साफ है कि एक नए किस्म की लड़ाई आज विकसित हो रही है, जहां भारत के विचार (आइडिया ऑफ इंडिया) को नए सिरे से रचने की जरूरत है। उस बहुसंख्यकवादी भारत के विपक्ष को कैसे तैयार किया जा सकता है जिसमें मोदी, ट्रंप, पुतिन, आबे एक-दूसरे को आईना दिखाते हैं? एक बात तो स्वीकार करनी होगी कि जिस तरह के दुःख और संताप की शुरू में बात की गई है, वह दुनिया भर में है।

हम किसी पार्टी या विचार से बात शुरू नहीं कर सकते। लेफ्ट या उदार जो भी विचार हों, वे विफल हो गए हैं, बिना किसी आधार के उन्हें विशिष्ट वर्ग का समूह मात्र बना दिया है। उससे भी बुरी बात यह हुई है कि लेफ्ट आज की तारीख में अप्रासंगिक दिखते हैं। इसे न्याय की भाषा को नए ढंग से गढ़ने, पुरानी मार्क्सवादी सोच के मुहावरों से आगे जाकर नागरिकता की बात कहने या खाली सेक्युलरवाद के अतिरेक से उबरने की जरूरत है। एक दशक आगे का समय देखकर परीक्षण के तौर पर, नई भाषा की खोज में, ज्यादा दिनों टिकने वाले आचार-विचार के लिए, अधिक अर्थपूर्ण विचार-विमर्श के लिए कोई भी व्यक्ति अपने विचार को खोता नहीं है, वह इसे नए तरीके से प्रस्तुत करता है, उसे नए ढंग से जीता है।

अब हमें विचार-विमर्श के खुलेपन पर जोर देते हुए लोगों के बीच संवाद से शुरुआत करनी चाहिए। इस संदर्भ में सिविल सोसाइटी की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसे विपक्ष के बीज को आगे ले जाना होगा। यह सिविल सोसाइटी ही है जिसने उस बीजेपी से ऊर्जा पाई है जो विचार की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े करती है। एक शासनकाल के तौर पर बीजेपी आरएसएस, बजरंग दल, हिंदू सेना और इस किस्म के अपने संगठनों को अपना विस्तार मानती है। सिविल सोसाइटी निरर्थक बन गई है। एनजीओ के साथ तुच्छ- जैसा व्यवहार होता है। और विश्वविद्यालयों को संदेह की तरह प्रदर्शित किया जाता है। सिविल सोसाइटी का यह भुरभुरापन ही है जिसमें सुधार और जिसकी पुनःसंरचना की जरूरत है।

सिविल सोसाइटी से अपेक्षित है कि वह अपने आप को ऐसे संयोजन के रूप में देखे जिसमें विभिन्न विचारों में सहमति के बिंदु तलाशने के लिए मिलजुल कर काम हो। हमारी शक्ति और ऊर्जा संस्कृति के बारे में हमारी सोच, अनेकता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और परस्पर विचार-विमर्श में बसती है। तर्क-वितर्क करने वाला भारतीय ही है जिसे सत्ता को चुनौती देनी है और इस ‘अड्डे’ यानी सिविल सोसाइटी को ही असहमति की पहली जगह बननी है।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि कोई भी शासन तर्क या विचार-विमर्श के सामाजिक जीवन के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता है क्योंकि यह दोनों को राष्ट्र विरोधी मानता है। सिविल सोसाइटी के मेंबर के तौर पर हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि अपनी अनगिनत सीमा में भारतीय होने का एकमात्र रास्ता राष्ट्र विरोधी बनना है। राष्ट्रवाद की भाषा एक अर्थी हो गई है और इसने विचारों को एक ही तरीके का बना दिया है।

सिविल सोसाइटी को विचारों का गुलदस्ता बनाना होगा, विचारों के मतभेदों का गुच्छा बनाना होगा और उन्हें बख्तरबंद पहनाना होगा। कोई भी विचार नए नागरिक शास्त्र को आमंत्रित करता है, नई संभावनाओं की रचना करता है, जबकि राष्ट्रवाद औसत दर्जे की प्रतियोगिता बन गई है। हमें शांति के संगीत की सुरक्षा, विकास और देशभक्ति के विचारों की संभावना से तुलना करनी होगी।

इन शब्दों की भक्ति उनकी अनिवार्य शक्ति में छिपी हुई है। हमें राष्ट्रराज्य की सामूहिक संहार की शब्दावली को चुनौती देनी होगी। हम भारतीय समाज के दमित-शोषित वर्गों से शुरुआत करते हैं; हाशिये पर पड़े लोग, अल्पसंख्यक, कमजोर लोग, हारे हुए लोग, ऐसे लोग जिन्हें कोई नहीं पूछता- ऐसे लोगों के जरिये हमें संभावनाओं का वैकल्पिक परिदृश्य रचना होगा। टीना (देयर इज नो अल्टरनेटिव- इसका कोई विकल्प नहीं है) टर्म विचारों की दरिद्रता बताता है, न कि विकल्पों की कमी बताता है।

भारत में विकल्प काफी सारे हैं। वे धर्म, लोक कथाओं के दायरे में, समाजवाद पर किनारे कर दिए गए विचार-विमर्श में, आदिवासी और लोक कथा कल्पना में, विज्ञानियों और समाज विज्ञानियों की किताबों में पहले से मौजूद हैं। चिपको, नर्मदा में बांध विरोधी आंदोलनों, हमारे जंगल के आंदोलनों, भाषा के संरक्षण के हमारे संघर्षों- जैसे हमारे सामाजिक आंदोलनों ने भी इस कल्पना में जोड़ा ही है।

टीना टर्म इन विकल्पों को समाप्त ही कर देता है क्योंकि मोदी इन सबके सामने औसत दर्जे के हैं। मोदी और उनका शासन काल सिर्फ तब अनिवार्य लगता है जब हम उन वैकल्पिक कल्पनाओं की विरासत को भूल जाते हैं जिन्हें भारत धारण करता है। विकल्पों के लोकतंत्र के लिए तलाश वैकल्पिक दृष्टि और वैकल्पिक राजनीति को जन्म देती है। हाल में आए कुछ सुझाव भविष्य के लिए रोमांचक होंगे लेकिन वर्तमान शासन व्यवस्था के लिए ये बेगाने हैं।

क्या हम किसी शहर के लिए दलित दृष्टि सोच सकते हैं? मैगसायसाय से सम्मानित बेजवाड़ा विल्सन जैसे एक्टिविस्ट की बातों में इस बारे में संकेत है। जैसे, विल्सन ने एक बार कहा था कि स्वच्छ भारत आंदोलन का तब तक कोई अर्थ नहीं है जब तक यह सिर्फ सेप्टिक टैंक को बंद करने और सफाईकर्मियों को हटाने की बात करता है। शहरों की बदबू हटाने के लिए आभिजात्य वर्ग को संवेदनशीलता के साथ शहर को लेकर शिक्षा देनी होगी। कोई ऐसा शहर किस तरह बना सकता है जो दलित कल्पना के लिए उचित हो?

शासन ने सूखा और खेती-किसानी के नागरिक शास्त्र की अनदेखी की है। किसानों के बीच काम करने वाले और विविधता के लिए आंदोलन करने वाले लोगों ने अनाज के इर्द-गिर्द वैकल्पिक राजनीति तैयार की है। हम इसे देविंदर शर्मा, कविता कुरुगुन्टी और वंदना शिवा के कामकाज के बारे में सोच सकते हैं। क्या हम इन वैकल्पिक कल्पनाओं के इर्दगिर्द नीति बना सकते हैं? इस शासन व्यवस्था में विकास के मॉडल ने प्रकृति की अनदेखी है। क्या हम उस तरह का आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, जैसा न्यूजीलैंड में हुआ जिसमें संविधान में प्रकृति को भी शामिल करने की बात कही गई? ऑस्ट्रेलिया में पर्यावरण बदलाव प्रतिबंधों को कड़ाई से लागू करने का आंदोलन एक अन्य उदाहरण है।

विपक्ष के विचार को नकारात्मक टर्म के रूप में सोचना हमें बंद करना होगा। विचार-विमर्श और विपक्ष के बिना लोकतंत्र अधूरा है। यह वह समय है जब हमें बहुसंख्यकवाद को अपूर्ण राजनीति के रूप में देखना चाहिए और हमें भविष्य को समग्रता के तौर पर वापस देखना होगा। भविष्य के लिए यही चुनौती है।

Published: 31 May 2019, 5:00 PM
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