केवल सरकारों के हाथों नहीं मरता लोकतंत्र, सार्वजनिक विवेक और जनमत की मौत होने पर भी मर जाता है

चर्चा है कि रक्षा क्षेत्र के कुछ उच्च पदस्थ रहे सेवानिवृत्त लोग राम मंदिर के उद्घाटन में भी शामिल हो सकते हैं जबकि यह एक राजनीतिक-धार्मिक कार्यक्रम है। जाहिर है, यह हमारे सशस्त्र बलों के गैर-राजनीतिक और धर्म-तटस्थ लोकाचार को और कमजोर कर रहा है।

सार्वजनिक विवेक और जनमत की मौत होने पर भी मर जाता है लोकतंत्र
सार्वजनिक विवेक और जनमत की मौत होने पर भी मर जाता है लोकतंत्र
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अवय शुक्ला

न्यूज और ‘डीप फेक न्यूज’ के दावे-प्रतिदावे, इसके वायरल होने और फिर खंडन के हल्ला-गुल्ला के बीच असली और नकली लोकतंत्रों के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है। आखिर, किसी देश को कौन सी बातें असली लोकतंत्र बनाती हैं? क्या यह ‘प्रगतिशील और उदार’ संविधान है, एक ‘स्वतंत्र’ न्यायपालिका, एक ‘निडर’ प्रेस और मीडिया, एक ‘स्वतंत्र’ सिविल सेवा है या फिर एक ‘निर्वाचित’ सरकार? कागजी तौर पर तो इसका जवाब ‘हां’ है लेकिन हकीकत में ये खासियतें किसी सरकार के लोकतांत्रिक होने या किसी समाज के स्वतंत्र होने के लिए काफी नहीं हैं। इसके उदाहरण हमें रोजाना मिलते हैं। 

कहने को तो भारत में ऊपर उल्लेख की गईं सभी खासियतें मौजूद हैं लेकिन हकीकत कुछ और ही है। हाल के सालों में हमारे संविधान, न्यायपालिका, प्रेस, सिविल सेवाओं में क्या गलत हुआ है, इसे गिनाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि ये सभी बाकायदा दर्ज हैं और उनलोगों को पता है जिन्हें ऐसे मामलों की परवाह है। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज रोहिंटन फली नरीमन ने इस साल के उन चार घटनाक्रमों का जिक्र किया है जिन्होंने उन्हें सबसे ज्यादा परेशान किया है।

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने कहाः सुप्रीम कोर्ट ने तमाम मामलों में केन्द्र सरकार के खिलाफ तल्ख टिप्पणियां कीं लेकिन उसका सरकार के खिलाफ उसी तरह का फैसला देना अभी बाकी है, चुनाव आयोग एक तरह का ‘पारस पत्थर’ बन गया है जो सत्ताधारी पार्टी की हार को जीत के सोने में बदल सकता है; संसद मानव शरीर में मूलाधार की तरह एक अवशेषी उपांग बन गई है जिसकी उपयोगिता लंबे समय से समाप्त हो चुकी है और उसे अब तो हाशिये पर ही डाल दिया जाना चाहिए; सिविल सर्विसेज (और रक्षा बल) या तो सत्तारूढ़ व्यवस्था के अनुयायी बन गए हैं, या अपने ‘गद्देदार बिलों’ में दुबक गए हैं; मीडिया दुनिया के सबसे ‘पुराने पेशे’ को जैसे गंभीर प्रतिस्पर्धा दे रहा है।

इन्हीं सब को प्रताप भानु मेहता ने संसदीय लोकतंत्र का ‘छद्म संवैधानिक मुखौटा’ कहा है। तथ्य यह है कि हम एक कमजोर लोकतंत्र और एक लापरवाह समाज, और इस बात को कुछ अन्य, अधिक वास्तविक, लोकतंत्रों के साथ तुलना करके अच्छी तरह समझा जा सकता है। तुलना इसलिए जरूरी हो जाती है कि इससे हमारी छिपी हुई कमजोरी को पहचानना आसान हो जाता है। बात को स्पष्ट करने के लिए बस कुछ उदाहरण ही काफी हैं।


इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर हमारी सरकार और समाज की प्रतिक्रिया को लें। इजरायल की किसी भी आलोचना की अनुमति नहीं है: व्याख्यान की अनुमति नहीं है, विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध है, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने का साहस करने वालों के खिलाफ पुलिस मामला दर्ज करती है। मीडिया कहानी के दोनों पक्षों को नहीं दिखाएगा। मशहूर हस्तियां और प्रभावशाली लोगों ने चुप्पी साध रखी है। ये सभी इजरायल और विकसित दुनिया में उसके सहयोगियों की उपनिवेशवादी नीति के लिए सरकार के समर्थन से रोमांचित हैं। लेकिन उसी विकसित दुनिया में, और वास्तव में इजरायल के भीतर, इजरायल के खिलाफ व्यापक गुस्से की अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

गाजा में नरसंहार का समर्थन करने के लिए अमेरिकी मीडिया में रोजाना बिडेन की निंदा की जा रही है, यहां तक कि उनके विदेश विभाग के अधिकारी फीडबैक के माध्यम से अपनी असहमति जताते हुए एक तरह से छोटा-मोटा विद्रोह ही कर रहे हैं। जनमत उनके खिलाफ हो रहा है। नवंबर में बीबीसी के पत्रकारों ने युद्ध के कवरेज में पक्षपाती होने, फिलिस्तीनियों को अमानवीय बनाने और इजरायली अत्याचारों को दिखाने से परहेज करने के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तक किया। विश्वविद्यालय अपने इजरायल समर्थक फंडर्स के खिलाफ खड़े हो रहे हैं जो परिसरों में यहूदी विरोधी भावनाओं पर लगाम लगाना चाहते हैं और इसी वजह से कम-से-कम एक प्रेसिडेंट ने इस्तीफा दे दिया है।

गाजा में तत्काल युद्धविराम की मांग को लेकर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इनमें से कोई भी सरकार इन विरोध प्रदर्शनों को दबाने के बारे में सोच भी नहीं सकती और देर-सबेर इनका असर इन देशों की नीतियों पर पड़ेगा। इस तरह से वास्तविक लोकतंत्र अपनी ही सरकारों के दुष्ट बनने के खिलाफ अपने नागरिकों की चिंताओं को आवाज देते हैं।

लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने हाल ही में एक और उदाहरण पेश किया कि वास्तविक लोकतंत्र कैसे काम करते हैं। विभिन्न संगठनों ने पिछले महीने फिलिस्तीन के समर्थन में एक विशाल मार्च की योजना बनाई थी। गृह सचिव और ‘अंकल टॉम’ की सरकार चाहती थी कि पुलिस इसकी इजाजत न दे लेकिन पुलिस आयुक्त ने इस आधार पर इनकार कर दिया कि कानून और व्यवस्था के लिए कोई खतरा नहीं है और वह कानूनी तौर पर मार्च पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। ब्रेवरमैन ने लंदन पुलिस पर पक्षपात और चयनात्मक पक्षपात का आरोप लगाते हुए इस मुद्दे को सार्वजनिक किया। कमिश्नर अपनी बात पर अड़े रहे, मार्च शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ा, केवल कुछ दक्षिणपंथी तत्वों की गिरफ्तारी हुई, जिन्होंने इसे बाधित करने का प्रयास किया। फिर सोचिए क्या हुआ? ब्रेवरमैन के खिलाफ ऐसा तेज गुस्सा भड़का कि कुछ दिनों के भीतर ही सुनक को गृह सचिव को बर्खास्त करना पड़ा। लोकतंत्र इसी तरह काम करता है, न कि हमारी अपनी पुलिस की तरह जो किसी भी सत्तारूढ़ दल की निजी सेना बन जाती है- चाहे वह केन्द्र में हो या राज्य में।


हमारे रक्षा प्रमुख रोबदार वर्दी और कंधों पर इस आकाशगंगा से अधिक सितारों के साथ संतुष्ट और मौन हैं। वे तब भी चुप रहे जब राजनीतिक कार्यपालिका ने उनकी दशकों पुरानी संस्कृति और लोकाचार को बदला, उनकी रेजिमेंटल परंपराओं, रैंकों, वर्दी, भर्ती के तरीके को बदला और संभवत: परिचालन और सामरिक मामलों में भी हस्तक्षेप किया। और अब फिजा में इस आशय की खबरें तैरने लगी हैं कि इनमें से कुछ सेवानिवृत्त लोग राम मंदिर के उद्घाटन में भी शामिल हो सकते हैं जबकि यह एक राजनीतिक-धार्मिक कार्यक्रम है।

जाहिर है, यह हमारे सशस्त्र बलों के गैर-राजनीतिक और धर्म-तटस्थ लोकाचार को और कमजोर कर रहा है। इसकी तुलना अमेरिकी ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल मिले द्वारा अपनाए गए रुख से करें जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए सेना का इस्तेमाल करने के डोनाल्ड ट्रंप के हर कदम का विरोध किया था। उन्होंने व्हाइट हाउस को अपनी आपत्तियां स्पष्ट कर दीं और जून, 2020 में लगभग इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने स्टाफ से कहा था: अगर वे मेरा कोर्ट-मार्शल करना चाहते हैं या मुझे जेल में डालना चाहते हैं, तो ऐसा ही करें... मैं वहां से भी लड़ूंगा।’

असली लोकतंत्र, नकली लोकतंत्र के उलट अपने नागरिकों की भावनाओं का सम्मान करता है, उन्हें बल के प्रयोग से दबाता नहीं है। उसकी संस्थाएं और नागरिक समाज इतने मजबूत होते हैं कि अहम मौकों पर स्टैंड लेते हैं। हम अभी ‘नकली लोकतंत्र’ बने तो नहीं हैं लेकिन इतना जरूर है कि उस ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र केवल सरकारों के हाथों नहीं मरता: जब सार्वजनिक विवेक और जनमत की मौत हो जाती है, तो भी लोकतंत्र मर जाता है।

(लेखक अवय शुक्ला रियाटर्ड आईएएस अधिकारी हैं)

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