देश का समूचा आर्थिक तंत्र लड़खड़ा चुका है, अर्थव्यवस्था के धमनी तंत्र में ब्लॉक ही ब्लॉक

आर्थिक विकास दर लगातार सात तिमाहियों से घटते-घटते 4.5 प्रतिशत पर आ गई है। इसकी मूल वजह है भरोसे का संकट। जिस भरोसे पर सारा उद्योग-धंधा टिका होता है, आज वही लड़खड़ा चुका है। यह छोटे और मझोले उद्योगों के साथ ही नहीं, बड़े कॉरपोरेट क्षेत्र के साथ भी हुआ है।

फोटोः सोशल मीडिया
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अनिल सिंह

ऊपर-ऊपर सब अच्छा दिख रहा है। अनाज के भंडार भरे पड़े हैं। प्याज जैसे कुछ तात्कालिक अपवाद छोड़ दें, तो मुद्रास्फीति काबू में है। विदेशी मुद्रा भंडार गले तक भरा है। यूपीए सरकार के आखिरी पांच वर्षों में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का औसतन 5.4 प्रतिशत हुआ करता था। लेकिन मोदी सरकार के पहले पांच वर्षों में इसका औसत घटकर 3.7 प्रतिशत पर आ चुका है। साथ ही देश में जबरदस्त राजनीतिक और आर्थिक स्थायित्व है। फिर भी हमारी आर्थिक विकास दर लगातार सात तिमाहियों से घटते-घटते सितंबर 2019 की तिमाही में 4.5 प्रतिशत पर आ गई।

यह तब हुआ, जब सरकार ने इस दौरान सार्वजनिक प्रशासन, रक्षा और अन्य सेवाओं पर 11.6 प्रतिशत ज्यादा खर्च किया। इसके बिना विकास दर मात्र 3.2 प्रतिशत रह जाती। इससे कम 4.3 प्रतिशत की विकास दर साढ़े छह साल पहले वित्त वर्ष 2012-13 की जनवरी-मार्च तिमाही में रही थी। यह दुखद है कि भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं रहा। वियतनाम, चीन, इंडोनेशिया, मिस्र और बांग्लादेश हमसे कहीं ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। हमारी विकास दर अब उभरते देशों की नहीं, बल्कि लुढ़कते अमेरिका की दर 2.10 प्रतिशत के करीब पहुंचती दिख रही है।

ऐसा क्यों और कैसे हो गया? मूल वजह है भरोसे का संकट। जिस भरोसे पर व्यापार से लेकर सारा उद्योग-धंधा टिका होता है, आज वही लड़खड़ा चुका है। यह छोटे और मझोले उद्योगों के साथ ही नहीं, बड़े कॉरपोरेट क्षेत्र तक के साथ भी हुआ है। बजाज समूह के चेयरमैन राहुल बजाज ने शनिवार (30 नवंबर) को एक समारोह में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में यूं ही नहीं कहा कि कॉरपोरेट क्षेत्र को भरोसा नहीं है कि वह केंद्र सरकार की खुलकर आलोचना करे तो उसे समझा जाएगा।

असल में समूचे अर्थ तंत्र में अंदर ही अंदर भय छाया हुआ है। अजीब-सी सिहरन है। कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। सिस्टम में नकदी की कोई कमी नहीं। बैंकों के पास पिछले कई महीनों से हर दिन औसतन दो लाख करोड़ रुपये की नकदी बची रहती है। फिर भी वे उद्योग-धंधों को ऋण देने के बजाय सरकारी बॉन्डों में एसएलआर की 18.5 प्रतिशत की सीमा से ज्यादा धन लगा रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक का निवेश तो इन बॉन्डों में 5 प्रतिशत से बढ़कर 23.5 प्रतिशत हो चुका है। बैंकों की ज्यादा मांग से सरकारी बॉन्डों के दाम बढ़ गए तो उन पर प्रभावी ब्याज की दर या यील्ड घट गई। बीते हफ्ते हुई नीलामी में 364 दिनों के ट्रेजरी बिलों की यील्ड 5.15 प्रतिशत की रेपो दर से भी नीचे 5.1389 प्रतिशत पर पहुंच गई। यह बहुत अशुभ संकेत है। दिक्कत यह है कि ऐसा करीब ढाई साल पहले अप्रैल 2017 में भी हो चुका है।


हमारा फाइनेंस या वित्तीय क्षेत्र बराबर संकेत दे रहा है कि अर्थव्यवस्था का भीतरी धरातल खिसक रहा है। ऐसा पहला संकेत सितंबर 2018 में इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएल एंड एफएस) के डिफॉल्ट से मिला था। 347 कंपनियों के इस समूह पर चढ़ा लगभग एक लाख करोड़ रुपये का कर्ज अब भी हमारे वित्तीय क्षेत्र की फांस बना हुआ है। बता दें कि आईएल एंड एफएस को मुख्य रूप से सरकारी या सरकार समर्थित संस्थाओं ने धन उपलब्ध कराया था। उसकी कमान आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए करने वाले रवि पार्थसारथी जैसे प्रतिभावान शख्स के हाथों में थी। समूह को देरी से रिटर्न देने वाले इफ्रास्ट्रक्चर को वित्तीय सहयोग देना था। लेकिन सरकार, नौकरशाहों और नेताओं की मिलीभगत से कंपनी भ्रष्टाचार तथा लूट का अड्डा बन गई। अंततः फाइनेंस, कंस्ट्रक्शन और राजनीति के गंदे गठजोड़ का पर्दाफाश हो गया।

लेकिन मोदी सरकार सारा दोष पिछली सरकार पर डालती रही। इस बीच सरकारी बैंकों के डूबते ऋण या एनपीए बढ़ते रहे। मुश्किल यह हुई कि पहले जो एनपीए कॉरपोरेट क्षेत्र की 50-60 कंपनियों तक सीमित था, वह नवंबर 2016 की नोटंबदी के बाद हजारों एमएसएमई इकाइयों तक फैल गया। बैंक ही नहीं, गैर-बैकिंग कंपनियां (एनबीएफसी) तक संकट में फंस गईं। म्यूचुअल फंड भी इसके लपेटे में आ गए। फिर दीवान हाउसिंग फाइनेंस और एल्टिको कैपिटल जैसी कंपनियों के डिफॉल्ट के किस्से सामने आने लगे।

लेकिन बैंकों और एनबीएफसी की नियामक संस्था रिजर्व बैंक की नींद बहुत देर से टूटी। सरकार और बैंकों का नया सिरदर्द यह है कि प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत बांटे गए 50 हजार से 5 लाख रुपये तक के किशोर ऋणों में से डूबते ऋणों की मात्रा इस साल मार्च से सितंबर तक के छह महीनों में 71 प्रतिशत बढ़ गई है। वहीं, 5 लाख से 10 लाख तक के तरुण ऋणों में 90 दिनों तक किश्त न चुकाए गए ऋणों की मात्रा भी इस दौरान 45 प्रतिशत बढ़ गई है। यह नई सरकार की पहल है और इसका दोष वह पुरानी सरकार पर नहीं डाल सकती। इसने बैंकों पर बोझ और बढ़ा दिया है।

इसी बीच पीएमसी बैंक का घोटाला हो चुका है। इस सहकारी बैंक ने सारे नियमों को ताक पर रखकर दीवान हाउसिंग फाइनेंस के वाधवा परिवार की ही कंपनी हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एचडीआईएल) को 6500 करोड़ रुपये का ऋण दिया था। पीएमसी बैंक के लगभग 16 लाख जमाकर्ता अपने साथ किए गए विश्वासघात से सदमे में हैं। फाइनेंस की दुनिया में भरोसा तोड़ने का ताजा कृत्य कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग का है। पूंजी नियामक संस्था, सेबी ने इस पर 22 नवंबर से नया बिजनेस लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है।


कार्वी ने अपने करीब 2.40 लाख ग्राहकों का विश्वास तोड़ा है। उसने उनके खाते में पड़े शेयर अपने नाम कर लिए। फिर उन शेयरों को गिरवी रखकर लगभग 2000 करोड़ जुटाए और उसे अपनी रियल एस्सेट शाखा कार्वी रियल्टी के खाते में डाल दिया। कार्वी ब्रोकिंग ऐसा इसलिए कर पाई क्योंकि डिमैट अकाउंट खुलवाते समय हर ब्रोकर निवेशक से फॉर्म में पावर ऑफ एटॉर्नी पर दस्तखत करवा लेता है। मालूम हो कि कार्वी घोटाले के अधिकांश शिकार रिटेल निवेशक और वरिष्ठ नागरिक हैं।

हो सकता है कि आखिरकार उन्हें ज्यादा नुकसान न हो और उनके शेयर उन्हें वापस मिल जाएं। लेकिन उनके साथ जैसा विश्वासघात हुआ है, वह उसी तरह का है जैसे कोई बैंक मैनेजर जमाकर्ताओं का जमा बिना उन्हें बताए हासिल कर ले और उसे गिरवी रखकर निजी लोन ले ले। कानून और सेबी यकीनन अपना काम करेंगे। लेकिन कार्वी शेयर बाजार का बड़ा वित्तीय सेवा समूह है। यह देश का शीर्ष रजिस्ट्रार और ट्रांसफर एजेंट है। शेयर बाजार से जुड़े हर तीसरे शख्स से इसका वास्ता है। एनएसई की शीर्ष 500 कंपनियों में से 60 प्रतिशत का शेयर धारकों से संबंधित कामकाज यह संभालता है। ऐसे में इस प्रकरण से निवेशकों का भरोसा जिस कदर टूटा है, उसे फिर से जमा पाने में बहुत वक्त लग सकता है।

दरअसल, हमें यह समझना होगा कि फाइनेंस वह धमनी तंत्र है जो समूची अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह को सुगम बनाता है। इसमें कहीं ब्लॉक या व्यवधान पड़ जाए तो समूचा आर्थिक तंत्र लड़खड़ा जाता है। 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट अब भी दुनिया की याददाश्त से मिटा नहीं है। तब एकबारगी लगा था कि 1930 के दशक की मंदी दोबारा तो नहीं आ गई। इसलिए बैंकों का एनपीए, एनबीएफसी का नकदी संकट, शेयर सूचकांकों का फूलता गुब्बारा और कार्वी ब्रोकिंग जैसों की नाजायज हरकतें जो अशुभ संकेत दे रही हैं, उनको नजरअंदाज करना हमारे समूचे अर्थ तंत्र के लिए घातक साबित हो सकता है। नहीं चेते तो हम चार-पांच साल तक 4-5 प्रतिशत की विकास दर तक सिमटे रह सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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