आकार पटेल का लेख: क्या हम पाकिस्तान जैसे ही धार्मिक राष्ट्र बन चुके हैं, मतदाता क्यों नहीं देखते असली मुद्दे !

ऐसा लगता है कि बहुत से भारतीय आर्थिक मुद्दों या फिर उनके अपने हितों से जुड़े मुद्दों के आधार पर वोटिंग नहीं कर रहे हैं। वे भी दूसरी तरह के मुद्दों को लेकर ही ज्यादा चिंतित दिखते हैं। मीडिया इसमें उनके साथ है और रोजगार जैसे मुद्दों को अनदेखा कर रही है।

फोटो : Getty Images
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आकार पटेल

मैंने कुछ महीने पहले एक किताब लिखी थी। भारत में किताबें लिखने के साथ एक समस्या है, खासतौर से अगर किताब नॉन फिक्शन हो और इतिहास से जुड़ी हो तो, बहुत से लोग ऐसी कितानों को नहीं पढ़ते हैं। ज्यादातर मामलों में किताब की शैली और लेखक की प्रसिद्धि अहम नहीं होती है। प्रिंट रन, यानी किताबों को छापने की संख्या कुछ हजार तक ही सीमित होती है। आमतौर पर एक ही बार में छपी किताबें बरसों तक चलती हैं और ये किताबें कई साल बाद भी किताबों की शेल्फ में मिल जाती हैं। मैंने 2014 में सआदत हसन मंटो के उर्दू नॉन-फिक्शन लेखन का अनुवाद करते हुए एक किताब लिखी थी।
मंटो एक मशहूर साहित्यकार हैं, लेकिन फिर भी वह किताब अभी पहले ही प्रिंट से आगे नहीं बढ़ी है। मेरी नई किताब ‘ऑवर हिंदू राष्ट्र’ में मैंने संवैधानिक वचनों के आधार पर भारत के एक सेक्युलर और लोकतांत्रिक राष्ट्र होने की स्थिति को आज के संदर्भ में जांचा-परखा है।

अगर आप सिर्फ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को ही लोकतंत्र मानते हैं, तो हम एक लोकतंत्र हैं। लेकिन बाकी दुनिया ऐसा नहीं मानती है। हाल में फ्रीडम हाऊस की रैंकिंग में भारत को आंशिक स्वतंत्र राष्ट्र कहा गया है। नागरिकों को राजनीतिक अधिकारों के लिए सिर्फ 40 फीसदी ही मार्क्स दिए गए हैं, जबकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को पूरे मार्क्स दिए गए हैं। नागरिक स्वतंत्रता और बुनियादी अधिकारों के मामले में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। इतना खराब कि स्वतंत्र चुनावों हासिल अच्छाई भी पीछे रह गई।

मैंने अपनी किताब में इन्हीं प्रक्रियाओं को एक लंबे समयांतराल में परखा है। किताब का शीर्षक ‘ऑवर हिंदू राष्ट्र’ है क्योंकि मेरे विचार से हम ऐसा बन चुके हैं। 2014 के बाद से भारत में जो कुछ हो रहा है, उसमें अब कुछ और करने की जरूरत नहीं रह गई है। पाकिस्तान में तो अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से कानून के जरिए बाहर किया गया है, लेकिन भारत में यह एक खास मंशा के तहत किया जा रहा है। दोनों देशों में यही एक अंतर रह गया है। हम पाकिस्तान जैसे ही धार्मिक राष्ट्र बन चुके हैं। पाकिस्तान के चार राज्यों में एक भी हिंदू मुख्यमंत्री नहीं है, वहीं भारत के 28 राज्यों में एक भी मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं है। देश की सत्ताधारी बीजेपी के 303 लोकसभा सांसदों में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। 15 राज्यों में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। 10 अन्य राज्यों में सिर्फ एक मुस्लिम मंत्री है जिन्हें आमतौर पर अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय दिया गया है।

धार्मिक अल्पसंख्यकों को अधिकार देने वाले विशेष कानून, जैसे कि प्रसार और व्यवसाय कानून भारत में रद्द कर दिए गए हैं। देश के कई राज्यों द्वारा पारित विभिन्न धार्मिक स्वतंत्रता देने वाले कानून दरअसल हमारी धार्मिक स्वतंत्रता को हम से छीनते हैं। पशु वध पर प्रतिबंध कब्जे के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

एक राष्ट्र के तौर पर हमें इन सबसे कोई समस्या नहीं है, और यही कारण है कि ये सब राजनीतिक मुद्दे नहीं बनते हैं (सिर्फ कुछ स्तंभकार ही इस बारे में चर्चा करते रहते हैं)। इसीलिए मैं कहता हूं कि अब ढांचागत रूप से हिंदू राष्ट्र बन चुके हैं।

दूसरी बात यह है कि भारत के अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने और ऐसे कानून और नीतियां बनाने से जो असुविधा होती है, शायद उसी के कारण भारत में लोग इस तरह मतदान करते हैं जैसे कि वे इन दिनों कर रहे हैं। भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो जीडीपी के संदर्भ में लगातार चौथे साल धीमेपन की शिकार है। लेकिन इस सब पर मीडिया का कोई ध्यान नहीं जाता। पूरे दक्षिण एशिया में भारत अकेली ऐसी अर्थव्यवस्था है जो मंदी की शिकार है, लेकिन हमें कोई चिंता नहीं है, अगर होती तो फिर यह चुनाव का मुद्दा भी होता और मीडिया में भी इसकी चर्चा होती। इसी तरह बेरोजगारी, जोकि ऐतिहासिक ऊंचाई है और 2017 से लगातार बढ़ रही है, लेकिन यह उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि महिलाओं को दूसरे धर्म में शादी करने का मामला या फिर मंदिर में कौन जाएगा कौन नहीं, ये मामला।

हमें समझाया जा रहा है कि हम एक राष्ट्रवादी पार्टी द्वारा शासित देश हैं, लेकिन हमें यह भी बताया गया है कि लद्दाख में आज भी बरसों पहले जैसे ही हालात हैं। अखबारों की रिपोर्ट्स में बताया गया कि करीब एक हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हम पहले की तरह अब गश्त नहीं कर सकते, लेकिन इस पर कोई सवाल नहीं उठता कि आखिर एक राष्ट्रवादी सरकार के रहते ऐसा क्यों हो रहा है। इस सरकार के राष्ट्रवादी आधार स्थापित हो चुके हैं और अपने नागरिकों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ यह जो कदम उठा रही है वह इसके लिए काफी हैं न कि देश पर बाहरी खतरे से निपटने के। यह दूसरा कारण है कि मैं मानता हूं कि हम एक हिंदू राष्ट्र में ही रह रहे हैं।

सवाल है कि इसके आगे क्या होगा। मेरा माना है कि इसी तरह का ही कुछ होता रहेगा। ऐसा लगता है कि बहुत से भारतीय आर्थिक मुद्दों या फिर उनके अपने हितों से जुड़े मुद्दों के आधार पर वोटिंग नहीं कर रहे हैं। वे भी दूसरी तरह के मुद्दों को लेकर ही ज्यादा चिंतित दिखते हैं। खासतौर से अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना से जुड़े मुद्दों को लेकर। मीडिया इसमें उनके साथ है और रोजगार-नौकरियां और आर्थिक मुद्दों को अनदेखा कर रही है भले ही राहुल गांधी जैसे कद का नेता इन मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहा है। एक ऐसे राष्ट्र में यह सब अद्भुत है क्योंकि हम लोकतांत्रिक हैं और सिर्फ इस बात से भड़क जाते हैं जब कोई कह दे कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत से जुड़ा हर तथ्य बताता है कि हमने गलत रास्ता चुना है और फिलहाल कोई ऐसा रास्ता नहीं दिखता जिससे इसे सुधारा जा सके।

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