हिन्दी दिवस पर विशेष: जीवित भाषाओं को मिले जीवन में जगह

हिन्दी अपने समाज में जीवित है। खतरा उसकी बोलने वाली जनता से नहीं, औपचारिकताओं से है।

सांकेतिक तस्वीर
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सितंबर आते ही हिन्दी को याद करने का मौसम आ जाता है। दफ्तरों में हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पोस्टर लगते हैं, प्रतियोगिताएं होती हैं, भाषण दिए जाते हैं, पुरस्कार बांटे जाते हैं और हिन्दी की महिमा पर कुछ गंभीर तथा कुछ अत्यंत गंभीर वाक्य बोले जाते हैं। अधिकारी हिन्दी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। कर्मचारी हिन्दी में हस्ताक्षर करने या कुछ पंक्तियां लिखने के लिए प्रेरित किए जाते हैं। सोशल मीडिया पर हिन्दी के गौरव की घोषणाएं दिखाई देती हैं।

फिर सितंबर बीत जाता है। हिंदी भी जैसे अपनी निर्धारित जगह भेज दी जाती है। यह स्थिति केवल हास्यास्पद नहीं, चिंताजनक भी है। जिस भाषा को करोड़ों लोग बोलते, पढ़ते और समझते हैं, उसे वर्ष में एक दिन या एक सप्ताह के उत्सव की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या हिन्दी इतनी कमजोर है कि उसे हर साल एक सरकारी आयोजन के माध्यम से जीवित होने का प्रमाण देना पड़े? या समस्या हिन्दी की नहीं, भाषा-दृष्टि की है?

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी घटना की स्मृति में हिन्दी दिवस मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी निर्धारित की गई। यह भारतीय भाषायी इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। लेकिन इसे समझते समय यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की कोई एक संवैधानिक 'राष्ट्रभाषा' नहीं है। हिन्दी का राजभाषा के रूप में स्थान है, जबकि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में अनेक भाषाओं को मान्यता प्राप्त है।

इस अंतर को जानना इसलिए जरूरी है कि हिन्दी के नाम पर अक्सर राष्ट्र और भाषा को एक-दूसरे का पर्याय बना दिया जाता है। हिन्दी का सम्मान किसी दूसरी भारतीय भाषा के अपमान से नहीं बढ़ता। हिन्दी की शक्ति तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, मलयालम, कन्नड़, असमिया, पंजाबी, उड़िया, उर्दू या किसी अन्य भारतीय भाषा को पीछे धकेलने में नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद में है।

भारत का राष्ट्रवाद बहुभाषी है। भारत की एकता का आधार भाषायी एकरूपता नहीं है। हिन्दी का इतिहास स्वयं इस बात का प्रमाण है। हिन्दी किसी प्रयोगशाला में तैयार की गई भाषा नहीं है। वह सदियों के भाषायी संपर्क, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से बनी है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, लोकभाषाओं और विभिन्न क्षेत्रीय भाषिक धाराओं से गुजरते हुए हिन्दी के अनेक रूप विकसित हुए। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी क्षेत्र की बोलियों और खड़ी बोली सहित अनेक भाषिक परंपराओं ने हिन्दी के व्यापक संसार को बनाया है।

कबीर की भाषा किसी व्याकरण की प्रयोगशाला से नहीं निकली। तुलसी की अवधी, सूर की ब्रजभाषा और प्रेमचंद की हिन्दी को एक ही कठोर भाषायी सांचे में नहीं रखा जा सकता। हिन्दी की प्रकृति ही बहुल और ग्रहणशील रही है। उसने संस्कृत से लिया, प्राकृत से लिया, अपभ्रंश से लिया, फारसी और अरबी से लिया, अंग्रेजी से लिया और देश की अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए। यही उसकी जीवंतता है।


जो भाषा बाहर से आए शब्दों से डरती है, वह धीरे-धीरे अपने भीतर भी डर पैदा करने लगती है। इसलिए अंग्रेजी बनाम हिन्दी का प्रश्न भी सही ढंग से उठाया जाना चाहिए। अंग्रेजी से लड़ना हिन्दी की उन्नति का कार्यक्रम नहीं है। अंग्रेजी आज ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, उच्च शिक्षा और वैश्विक संचार की महत्वपूर्ण भाषा है। उसे हटाकर हिन्दी को मजबूत करने की कल्पना न व्यावहारिक है, न आवश्यक।

समस्या अंग्रेजी नहीं है। समस्या अंग्रेजी के माध्यम से पैदा होने वाली सामाजिक असमानता है। जब किसी बच्चे की क्षमता से अधिक उसके अंग्रेजी ज्ञान को महत्व मिलने लगे, जब नौकरी की योग्यता और सामाजिक प्रतिष्ठा भाषा की एक विशेष दक्षता से तय होने लगे, जब किसी भारतीय भाषा में पढ़ा विद्यार्थी ज्ञान की दुनिया के दरवाजे पर केवल इसलिए ठिठक जाए कि उसे अंग्रेजी में प्रवेश-पत्र नहीं मिला—तब भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं रहती। वह सत्ता का औजार बन जाती है।

हिन्दी को अंग्रेजी से लड़ाने के बजाय हमें हिन्दी को इतना सक्षम बनाना होगा कि अंग्रेजी जानने वाला व्यक्ति भी हिन्दी में ज्ञान पाने को उपयोगी समझे। यहीं हिन्दी की असली परीक्षा शुरू होती है।

हम हिन्दी की उन्नति की बात करते हैं, लेकिन हिन्दी में आधुनिक ज्ञान के निर्माण को लेकर कितने गंभीर हैं? कितनी उच्चस्तरीय वैज्ञानिक पुस्तकें हिन्दी में लिखी जा रही हैं? कितने महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शोधों के अच्छे अनुवाद उपलब्ध हैं? कितने विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी बिना अंग्रेजी के अतिरिक्त बोझ के हिन्दी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है?

हिंदी को सचमुच विकसित करना है तो उसे केवल साहित्य और भाषण की भाषा नहीं, ज्ञान की भाषा बनाना होगा। यहां हमारी शिक्षा-व्यवस्था की विडंबना सामने आती है। बच्चे को हिन्दी पढ़ाई जाती है, लेकिन जैसे-जैसे वह उच्च शिक्षा की ओर बढ़ता है, ज्ञान की मुख्य खिड़की अंग्रेजी हो जाती है। हिन्दी माध्यम का विद्यार्थी कई बार विषय से पहले भाषा से लड़ता है। परिणाम यह कि हिन्दी उसके लिए ज्ञान की भाषा के बजाय परीक्षा की भाषा बन जाती है। हिन्दी को पाठ्यक्रम में रखा, लेकिन ज्ञान-व्यवस्था के केन्द्र में नहीं रखा। यह अंतर समझना जरूरी है।

हिन्दी की दूसरी समस्या उसकी शुद्धतावादी प्रवृत्ति भी है। कुछ लोग हिन्दी को इतना संस्कृतनिष्ठ बनाना चाहते हैं कि वह बोलने वाले समाज से कटने लगे। दूसरी ओर बाजार और डिजिटल संस्कृति ऐसी हिन्दी विकसित कर रहे हैं जिसमें अंग्रेजी का वाक्य-विन्यास और शब्दावली तेजी से प्रवेश कर रही है। दोनों अतियों के बीच एक जीवंत हिन्दी मौजूद है—वह हिन्दी जिसे लोग बोलते हैं, लिखते हैं, बदलते हैं, नए शब्द देते हैं और दूसरी भाषाओं से ग्रहण करते हैं।

हिन्दी का भविष्य इसी जीवंतता में है। तय करना होगा कि हिन्दी को संग्रहालय की वस्तु बनाना है या आधुनिक जीवन की सक्रिय भाषा। यदि हिन्दी को केवल गौरव की वस्तु बनाया जाएगा तो वह धीरे-धीरे स्मृति की वस्तु बन जाएगी। यदि उसे ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, पत्रकारिता, शिक्षा और डिजिटल दुनिया से जोड़ा जाएगा तो वह भविष्य की भाषा बन सकती है।


इसके लिए बड़े नारों से अधिक छोटे लेकिन ठोस काम चाहिए। अच्छे शब्दकोश चाहिए। मानक वर्तनी की व्यापक शिक्षा चाहिए। संपादन की गंभीर संस्कृति चाहिए। उच्चस्तरीय अनुवाद चाहिए। विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण हिन्दी माध्यम की सामग्री चाहिए। विज्ञान और तकनीक की पुस्तकों का नियमित प्रकाशन चाहिए। डिजिटल संसार में हिन्दी के बेहतर उपकरण चाहिए। सबसे बढ़कर चाहिए भाषा के प्रति बौद्धिक सम्मान।

यह भी देखना होगा कि हिन्दी का विस्तार दूसरी भारतीय भाषाओं के विरुद्ध न हो। हिन्दी का संसार जितना अनुवादित होगा, उतना ही विस्तृत होगा। और यही वह जगह है जहां हिन्दी दिवस की वर्तमान औपचारिकता सबसे अधिक असफल दिखाई देती है।

इसलिए हिन्दी दिवस पर सबसे पहले हिन्दी की प्रशंसा करने के बजाय हमें स्वयं से कुछ असुविधाजनक प्रश्न पूछने चाहिए। क्या हिन्दी को सचमुच ज्ञान की भाषा बनाना चाहते हैं? क्या हिन्दी माध्यम के विद्यार्थी को अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी के बराबर अवसर देना चाहते हैं? क्या हिन्दी में गंभीर विज्ञान और तकनीकी साहित्य तैयार करने को तैयार हैं? क्या दूसरी भारतीय भाषाओं से सीखने और उन्हें हिन्दी में लाने के लिए तैयार हैं? क्या हिन्दी लिखते समय उसकी वर्तनी और व्याकरण के प्रति उतने ही सजग हैं जितने उसके गौरव के प्रति? सबसे बड़ा सवाल कि क्या हमें हिन्दी चाहिए या हिन्दी के नाम पर वार्षिक आयोजन?

यदि उत्तर दूसरा है, तो हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा इसी तरह चलते रहेंगे। मंच सजेंगे, भाषण होंगे, प्रमाणपत्र बांटे जाएंगे और अगले सितंबर तक हिन्दी फिर हमारी प्राथमिकताओं से बाहर हो जाएगी। लेकिन यदि हिन्दी सचमुच चाहिए तो हिन्दी दिवस को उत्सव से अधिक आत्मालोचन का दिन बनाना होगा।

हिन्दी को बचाने की जरूरत नहीं है। उसे बचाने की घोषणा करने वालों से बचाने की जरूरत है। हिन्दी अपने समाज में जीवित है। उसे खतरा उसकी बोलने वाली जनता से नहीं, हमारी औपचारिकताओं से है। भाषा तब मजबूत होती है जब उसमें लोग प्रेम करते हैं, सपने देखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, विज्ञान समझते हैं, न्याय मांगते हैं, सत्ता से सवाल करते हैं और अपने समय की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं।

जिस दिन हिन्दी यह सब पूरी क्षमता के साथ करने लगेगी, उस दिन हिन्दी दिवस मनाने की जरूरत शायद कम हो जाएगी, क्योंकि जीवित भाषाओं को कैलेंडर में जगह नहीं चाहिए। उन्हें जीवन में जगह चाहिए।

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