चुनावी नतीजों में किसानों और युवाओं ने दिया खुला संदेश, अब कब तक राष्ट्रवादी पत्तों से भटकाएगी मोदी सरकार!

कभी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी बालाकोट, कभी कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के राष्ट्रवादी पत्तों के जरिये मोदी सरकार अब तक देश की तमाम गहराती समस्याओं से जनता को भटकाने में सफल रही है। लेकिन अब क्या मोदी सरकार और मीडिया इन मुद्दों को नकार पाएगा ?

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

सर्वेक्षण करने वाली संस्था- एक्सिस, ने हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के परिणामों का सही अनुमान लगाया था। केवल उसका ही एग्जिट पोल सटीक साबित हुआ है। एक्सिस ने बताया कि बेरोजगार युवाओं और किसानों ने सत्ताधारी बीजेपी को पहले की तुलना में कम वोट दिए हैं। बेरोजगारी अरसे से चरम पर है, पर मोदी सरकार ने इसे नकारने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछले पांच-छह सालों से आय की समस्या और बढ़ते कर्ज से किसान बेदम हो चुके हैं। आय और खपत के अभाव में जीडीपी की विकास दर पिछली छह तिमाहियों से लगातार गिर रही है। कभी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी बालाकोट, कभी 370 के राष्ट्रवादी पत्तों से इन गहराती समस्याओं से मोदी सरकार अब तक जनता को भटकाने में सफल रही है। पर अब क्या मोदी सरकार और मीडिया इन मुद्दों को नकार पाएगा ?

अब तक जीडीपी विकास दर के जो भी आकलन आए हैं, वे निराश करने वाले हैं। इन तमाम आकलनों में साफ कहा गया है कि आर्थिक मंदी के घने बादल जल्द छंटने वाले नहीं है, यानी आय, मांग, खपत और निवेश की समस्या बनी रहेगी। आरबीआई, आईएमएफ, विश्व बैंक और अन्य कई नामी गिरामी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां पिछले आठ-दस महीनों में कई बार जीडीपी विकास दर के अनुमानों को घटा चुकी हैं। देश के केंद्रीय बैंक आरबीआई ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए विकास दर का अनुमान एक झटके में 6.9 फीसदी से घटा कर 6.1 फीसदी कर दिया है। यदि ऐसा वास्तव में होता है, तो 2012-13 के बाद यह सबसे कम विकास दर होगी जिससे रोजगार और निवेश स्तर को तेज झटका लग सकता है।

आरबीआई की मौद्रिक कमिटी के एक सदस्य एम.डी. पात्रा का आकलन है कि विकास दर गिरावट अभी पूरी नहीं हुई है। उच्च आवत्तिृ वाले आंकड़ों (जैसे, वाहन, तैयार उपभोक्ता सामान आदि के बिक्री के आंकड़े) से लगता है कि 2019-20 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर-19 की तिमाही में आर्थिक विकास दर में गिरावट जारी रह सकती है। इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर-19) में विकास दर में रिकवरी हो सकती है। पर इस वित्त वर्ष में खाद्य पदार्थों के महंगे होने की आशंका आरबीआई को है जो मंदी के दौर में कोढ़ में खाज साबित हो सकती है।

फिर भी आरबीआई का आकलन है कि इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर-19) में विकास दर 5.3 फीसदी रहेगी । इस वित्त वर्ष के बाकी छह महीनों (अक्टूबर से मार्च- 20) तक विकास दर 6.6 से 7.2 फीसदी रहने की उम्मीद आरबीआई ने जताई है। वैसे, अप्रैल-जून की तिमाही के लिए आरबीआई ने 5.8 फीसदी का अनुमान जताया था, जो गलत साबित हुआ और इस अवधि में विकास दर घट कर महज 5 फीसदी रह गई, जो पिछले छह सालों में सबसे कम तिमाही विकास दर है। इस विकास दर के आंकड़े पर आरबीआई का हैरान रहना स्वाभाविक है।

वैसे, आरबीआई बीते फरवरी से तीन बार विकास दर के अनुमान घटा चुका है। फरवरी 2019 में आरबीआई ने जीडीपी विकास दर का अनुमान 7.4 फीसदी पेश किया था। पिछली अप्रैल में विश्व बैंक ने भारतीय विकास दर का अनुमान 7.5 फीसदी जताया था लेकिन बीते अक्टूबर महीने में विश्व बैंक ने भी यह अनुमान घटा कर 6 फीसदी कर दिया है। इस बैंक का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय मंदी तीव्र है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अक्टूबर महीने में भारतीय विकास दर का अनुमान 7 फीसदी से घटा कर 6.1 फीसदी कर दिया है।

केवल आईएमएफ या विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं ने ही भारतीय विकास दर के अनुमानों को नहीं घटाया है बल्कि अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थानों, जैसे- ओईसीडी, एशियन डेवलपमेंट बैंक, फिच, स्टैंडर्ड पूअर्स और मूडीज, ने भी वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारतीय विकास दर के अनुमानों को घटा दिया है। फिच रेटिंग्स एंजेसी ने जून महीने में विकास दर के अनुमान को 6.8 फीसदी से घटा कर 6.6 फीसदी कर दिया था। जबकि ऑरगइनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने यह अनुमान सितंबर महीने में 7.2 फीसदी से घटा कर 5.9 फीसदी कर दिया। सितंबर महीने में ही एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भी यह अनुमान 7 फीसदी से घटा कर 6.5 फीसदी कर दिया। स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स रेटिंग्स ने अक्टूबर में विकास दर का अनुमान 0.8 फीसदी घटा कर 6.3 फीसदी कर दिया।

स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स रेटिंग्स एजेंसी का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का आधार उम्मीद से ज्यादा है। मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भी अक्टूबर महीने में भारतीय विकास दर का अनुमान 6.2 फीसदी से घटा कर 5.8 फीसदी कर दिया जो अब तक आए सभी संशोधित अनुमानों में सबसे कम है। मूडीज के अनुसार, विकास दर कमजोर होने के कई कारक हैं, जिनमें घरेलू कारक सबसे अहम हैं और उनका असर अभी लंबे समय तक रहेगा। निवेश कम होने से ग्रामीण आय संकट और रोजगार के क्षीण अवसरों के कारण खपत कमजोर पड़ी है। गैर वित्तीय संस्थाओं के संकट ग्रस्त होने का असर खुदरा कर्जों पर पड़ा है। मूडीज ने कॉरपोरेट टैक्स कटौती और कमजोर जीडीपी विकास दर के कारण राजकोषीय घाटे के बढ़ने की आशंका जताई है और कहा है कि भारत का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.3 से 3.7 फीसदी हो सकता है।

मूडीज की आशंका निराधार नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने सरकारी सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया है कि टैक्स राजस्व में 2.50 लाख करोड़ रुपये तक की गिरावट आ सकती है। इन सूत्रों के अनुसार, टैक्स संग्रह पहले ही लक्ष्य से एक लाख करोड़ रुपये पीछे चल रहा था। मोदी सरकार ने मंदी दूर करने और निवेश बढ़ाने के मकसद से कॉरपोरेट जगत को टैक्स में 1.45 लाख करोड़ रुपये छूट दी है, जिससे टैक्स संग्रह में 2.50 लाख करोड़ रुपये की गिरावट की आशंका गहरा गई है। वैसे भी, इस साल के बजट में टैक्स संग्रह और बाकी अन्य अनुमान भी 11 फीसदी की नॉमिनल विकास दर पर आकलित है, जिसकी उम्मीद अब किसी को भी नहीं है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि मोदी सरकार कॉरपोरेट टैक्स में 1.45 लाख करोड़ रुपये की छूट न भी देती, तो भी सरकार के टैक्स संग्रह में गिरावट आना तय था। मोदी सरकार आर्थिक विकास को लेकर जो भी दावे करे, पर मांग में किसी बड़े उछाल की उम्मीद नहीं की जा सकती है, क्योंकि ग्रामीण भारत में आय और खपत निरतंर कमजोर बनी हुई है। नीलसन एजेंसी ने ताजा रिपोर्ट में बताया है कि एफएमसीजी सेक्टर (तैयार उपभोक्ता सामान उद्योग) की मांग वृद्धि बीती जुलाई-सितंबर की तिमाही में गिरकर पिछले साल की समान अवधि से आधी रह गई है। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में तेज गिरावट दर्ज हुई है जो पिछले सात सालों के न्यूनतम स्तर पर है। मसलन, 2018 की अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में ग्रामीण क्षेत्र में मांग वृद्धि दर एफएमसीजी सेक्टर की 20 फीसदी थी, जो 2019 की दूसरी तिमाही जुलाई-सितंबर में घटकर महज 5 फीसदी रह गई।

यह साफ इंगित करता है कि ग्रामीण भारत में आय-मांग की विकराल समस्या बनी हुई और बेरोजगारी की समस्या चरम पर है। निजी निवेश में भी लगातार कमजोरी बनी हुई है। जाहिर है कि देश की विकास दर को अच्छे दिनों के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा। बेरोजगार युवाओं और किसानों ने मतदान के जरिये अपना संदेश देकर मोदी सरकार को जता दिया है। देखते हैं कि मोदी सरकार इन चुनावी नतीजों से कोई सबक लेती है या 370 के अपने दांव पर ही अड़ी रहती है।

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