मृणाल पाण्डे का लेखः असली बनाम नकली अपनापा किस तरह नापा जाए?

खुशहाली के कई विश्व मानकों में भारत के पिछड़ने के संकेत मिल रहे हैं। मसलन, भूख की तालिका में हम 97वीं, स्वास्थ्य कल्याण में 145वीं, पर्यावरण प्रदूषण के नजरिये से हम 168वीं और प्रेस की आजादी के सूचकांकों में हम 180 देशों में 142वें पायदान पर आ चुके हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

अपनी सत्ता के आठ सालों में भाजपा चुनाव जीतने की एक सैन्य किस्म की मशीन बन गई है। ताकत में इजाफा करने को सेना जैसी चुस्ती और आक्रामक कार्यशैली जरूरी तो होते हैं लेकिन एक बुद्धिमान नेतृत्व यह भी जानता है कि इस प्रक्रिया में पार्टी मनुष्य केन्द्रित नहीं रह सकती। अगर वह शक्ति की निर्मम लड़ाई पूरे जोश से लड़ती रहे, तो देर-सबेर वह एक मानवीय और सेवाभावी सिस्टम नहीं बनाए रखती। अपने से इतर हर परछाईं, हर शक के पात्र के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों का लड़ाकू दस्ता बनती जाती है। पिछले आठ बरसों में राजग के शीर्ष नेता की छवि गोदी मीडिया की मदद पाकर खूब निखर आई है लेकिन शेष मुख्यधारा के मीडिया से उनका सालाना प्रेस वार्ताओं का क्रम खत्म हो चुका है। मीडिया से कोई सीधा संवाद, उसके सवालों की कोई जवाबदेही की जरूरत महसूस नहींं की जाती। बहुत हुआ तो सरकारी मीडिया पर ‘मन की बात’ या निरंतर होने वाले शासकीय आयोजनों के भाषणों के माध्यम से ही संदेश प्रसारित होता रहता है जिसमें स्वर भले ही अपनापे का हो लेकिन अनुभवी मीडिया वालों को बातचीत में वह सहज ऊष्मा महसूस नहीं होती जो बेहद कम बोलने वाले मनमोहन सिंह की बातों में भी मौजूद रहती थी। देश का सर कभी झुकने नहीं दिया, जैसे वाक्यों में एक आत्मतुष्ट सफल नेता का गौरव बोध ही सतह पर तैरता रहता है।

जैसे-जैसे कोविड का डर उतर रहा है, यूक्रेन की जंग और उससे बनते बिगड़ते विश्व अर्थव्यवस्था के समीकरणों का भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापारिक और राजनयिक रिश्तों पर भी नकारात्मक असर पड़ना ही था। इधर खुशहाली के कई विश्वमानकों में भारत के पिछड़ने के संकेत मिल रहे हैं। मसलन, भूख की तालिका में हम 107 देशों में 97 वीं पायदान पर हैं। स्वास्थ्य कल्याण में 195 देशों में हमारा नंबर 145 है। पर्यावरण प्रदूषण के नजरिये से हम 180 देशों में 168 और प्रेस की आजादी के सूचकांकों में हम 180 देशों में 142 वें नंबर पर आ चुके हैं। रोजमर्रा की चीजोँ के दामों को आग लगी है।

नौकरियों में छंटनी और बेरोजगारी में बढ़ोतरी का क्रम थम नहीं रहा लेकिन इन पर सर्वसत्ताधारी धड़े से कोई आश्वस्तिदायक सूचनाएं नहीं मिल रहीं। राहत की जिन योजनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर घोषित किया भी जा रहा है, उनके लिए आवंटित समुचित राशि न होने से उनका ऊंट के मुंह में जीरा वाला हाल होना ही अधिक संभव है। कई बार लगता है, इन कड़वी सचाइयों से ध्यान भटकाने के लिए ही मुख्यधारा के मीडिया में काशी के ज्ञानवापी परिसर या मध्य प्रदेश में भोजशाला के पुनरुद्धार और हनुमान चालीसा के सार्वजनिक सस्वर पाठों पर विस्मयकारी तौर से हर शाम समवेत कई तरह की कर्कश और निरर्थक बहसें छिड़वाई जा रही हैं।


अभी जुमा-जुमा कुछ माह पहले तक आप पार्टी के नेताओं ने पंजाब के गरीबों, दलितों, किसान-मजूरों के प्रति गहरा अपनत्व जता कर जनता की सहानुभूति बटोरी और सत्ता पाई। लेकिन मान सरकार का कार्यकाल अब तक निराशाजनक रहा है। जिस निर्मम तरीके से रातोंरात उन्होंने कई लोगों को राज्य द्वारा दी गई सुरक्षा को खत्म किया, वह उनकी जनता के प्रति जिम्ममेदारी के अहसास और सहानुभूति का नकलीपना उघाड़ता है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसके कुफल दीख रहे हैं जिनके तहत पंजाब कांग्रेस के एक 28 वर्षीय कार्यकर्ता और प्रतिभाशाली पॉप गायक सिद्धू मूसेवाला की सुरक्षा हटते ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। अब तक पत्रकारों के पुलिस से पूछने पर कि सुरक्षा हटाने का पैमाना क््या था, खामोशी ही हाथ लग रही है।

इस हादसे पर अन्य दलों द्वारा जताया जा रहा अपनापा और च्च-च्च भरी प्रतिक्रियाएं असली हैं या महज अगली बार वोट जुटाने की नकली थेथरी कवायद, कहना कठिन हो गया है। अगर सभी दलीय नेताओं के जनहितकारी तेवर कमोबेश नूरा कुश्तीवाले ही हैं, तो आने वाले बरसों में नेताओं और जनता के बीच कया उस तरह का जीवंत और अर्थमय अपनापा बन सकेगा जो आज हमारे राजनैतिक आसमान से सिरे से गायब है?

भारत और नेतृत्व के बीच प्रेम और भरोसा न तो बाड़ी में उपजता है और न ही हाट में बिकता है। ताड़ना सहित मिलने वाले मां-बाप के लाड़-दुलार की तरह वह निरी मिठास का पैकेज भी नहीं होता। वह शब्दों से नहीं, ठोस काम से उपजता है और अनपढ़ जनता भी उसे तुरत समझ लेती है। जैसे जंगल में रेवड़ के बीच हर बछड़ा अपनी मां की गंध पा लेता है, जनता ऐसे नेता को देर-सबेर परख लेती है और वह उसे ही एक लंबी लड़ाई का नेतृत्व थमाती है। दिक्कत यह है कि इन दिनों हमारे नेताओं के बाल, दाढ़ियां और भंवें जनता के बीच रहते हुए जमीनी चुनौतियों को समझने की कोशिश में सफेद नहीं होते। वे गांधी-नेहरू के प्रतीकों पर कब्जा तो चाहते हैं, पर चुनाव काल के अलावा जनता के बीच जाने से कतराते हैं।

एक समय था जब चुनाव काल में अखबारी दफ्तरों में खादी का कुर्ता और गाढ़े की धोतीधारी पार्टी के लोग जनता से मिली रेजगारी की थैली लेकर विज्ञापन छपवाने को आते और कई-कई घंटे तक इंतजार करते रहते थे। आज सारे दल वह विनम्र सादगी त्याग चुके हैं। जनसभा संबोधित करनी हो, तो भी उनके लिए अपनी निजी सुरक्षा जनता के बीच जाने, घुलने-मिलने से कहीं ऊपर रहती है। वे सिक्योरिटी दस्तों से घिरे-घिराए घर या पार्टी मुख्यालयों से निकलते हैं और हवाई जहाज से उतरकर कमांडो दस्ते से घिरे हुए जनसभाओं में अचानक टपकते हैं जहां मंच और जनता के बीच खासा फासला रखा जाता है ताकि कोई अप्रिय वारदात न घट जाए।


अब आप ही कहिए, जिस नेता को अपनी ही जनता से खतरा महसूस हो, उसका लोकतांत्रिक रिश्तों को मानवीय बनाने में कितना योगदान होगा? ऐसी हवा-हवाई आवाजाही से सड़कें या शहरों की गलियां नहीं सुधरतीं, अलबत्ता ट्रैफिक जाम हो जाता है। जभी जनता की नजर में उनके तेवर नाटकीय, आक्षेप व्यक्तिपरक और सोशल मीडिया पर नेताओं के खिलाफ भाषा उग्र, अभद्र बनती चली गई है। एकाध फोहश फब्ती पर किसी के खिलाफ केस दर्ज कराने या कुछेक दिन हवालात की हवा खिलाने से भी कोई फर्क पड़ता है क्या? दलीय प्रवक्ताओं की जुबानें हर शाम मीडिया पर कम जहर उगलती हैं क्या? ऐसे में जनता के दिलों में नेता नाम की प्रजाति के खिलाफ नितांत जायज शक का क्या किया जाए?

हार्दिक पटेल जैसे नेताओं की दल बदलाई की मोटी वजह तो यह है कि जैसे-जैसे जोतों का क्षेत्र कम हुआ और लागत बढ़ी, खेतिहरों की आय लगातार घटी है और उनकी हताशा का फायदा उठा कर उनके जातीय नुमाइंदों की राजनीति में भागीदारी की संभावना बढ़ गई है। जातीय समूहों की खामोश मदद से न्यायालय द्वारा पिछड़ा आरक्षण रद्द करने के बाद भी कुकुरमुत्ता नेता विभिन्न दलों में जा कर अपना वजन बढ़़ाने में सफल हो रहे हैं।

आठ साल सत्ता का सुख भोग चुकी सरकार को अब देश में बनते गए कमजोर, पिछड़े और अगड़े वर्गों के इन नए स्वरूपों और उनकी असली-नकली मांगों के भेद को समझना ही होगा। इसके बिना किसी तरह का स्वस्थ औद्योगिक या सामाजिक विकास लाना या उसके लिए शांतिमय वातावरण बनाना नामुमकिन है। इतनी पुरानी और जटिल समस्याओं के जवाब तत्काल नहीं मिलेंगे, पर फिर भी सत्ता चाहिए तो 2024 तक वे खोजने ही होंगे। नीति आयोग के महापंडितों के मसौदे या महालेखाकार के आंकड़े भी अपनी जगह हैं, पर अब नेताओं को दोबारा बदलते देश को जमीनी स्तर पर भी समझना होगा। किस वजह से वे 2014 चुनावों में संप्रग की समाजवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के गड़बड़झाले से लेकर पड़ोसी देश के प्रति उसके नर्म रुख के साथ मनरेगा जैसी योजना को हर मंच से मुखरता से कोस कर चुनाव जीते और 2022 में क्यों उनको ही और जोर से धुकाने को बाध्य हैं? विपक्षी नेताओं पर छापे डलवा कर या अशांत सूबों में गोली चालन बढ़ाने या चंद नेताओं को जेल भेजने भर से इन तकलीफदेह सवालों का उठना बंद नहीं होगा।

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