काश कि यह बयान संघ प्रमुख ने शाखाओं में दिया गया होता!
यह सोचना लाज़िमी है कि नई परिभाषा के तहत अब कौन सब हिन्दू नहीं रह पाएंगे

हाल ही में कुछ बयान जो विदेश में दिए गए। शतक पूर्ण किए सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख ने न्यूयॉर्क में जो कहा, उसकी अनुगूंज भारत में सुनाई पड़ रही है। कुछ साल पहले तक भी आदर्श अल्पसंख्यक को परिभाषित किया जाता था। यही संगठन सबकी राष्ट्रवादिता का भौतिक सत्यापन करता है। अब की बार यह बताया गया कि कौन क्या करने पर हिन्दू नहीं रहेगा? बहुत खूब!
काश कि कथनी और करनी में फर्क नहीं होता। यह सोचना लाज़िमी है कि इस नई परिभाषा के तहत अब कौन सब हिन्दू नहीं रह पाएंगे। भारत के तहज़ीबी वातावरण में अभी कुछ और तरह की भी अनुगूंज कराह सुनाई पड़ती रहती हैं। यदि अंतरात्मा के कर्णों से श्रवण किया जाए, तो बयान कुछ कहता है।
यानी जिन्होंने अख़लाक़ पर पत्थर बरसाए, वे हिन्दू नहीं। गुजरात के ऊना में दलितों पर कोड़े बरसाए, वे हिन्दू नहीं। जिन्होंने किसान आंदोलनकारियों को आतंकवादी कहा, वे भी हिन्दू नहीं। एक अदने से चूड़ी वाले को पीटा, वे हिन्दू नहीं। उत्तराखंड के मंदिर प्रांगण में जिस प्यासे को पानी नहीं मिला, उसको लहूलुहान किया गया। वे हिन्दू नहीं। जिसने युगांतरकारी सत्यान्वेषी पर तीन गोलियां दागी, वूह हिन्दू नहीं। वे सरकारें, जो वोटर सूची से नाम काटकर उन्हें राशन तक से वंचित करती हैं, हिन्दू नहीं। जो बुलडोजर चलवातीं हैं, डिटेंशन सेंटर भेज देती हैं, सौ सिर कटवाने की वकालत करती हैं, वे भी नहीं। जो राम नाम लेकर करोड़ो गबन करते हैं, वे भी हिन्दू नहीं। ग्राहम स्टीन को ज़िंदा जलाने वाले भी हिन्दू नहीं। लव जेहाद के नाम पर नफरतपरस्ती हिन्दू नहीं। डिलिस्टिंग की कवायद हिन्दू नहीं।
मगर यह सब तो बहुत पहले से वे जानते हैं, जो सच्ची आस्था रखते हैं। असल में जो कोई हिंसा, व्यभिचार, नफरत भेद का इस्तेमाल करते हैं, वे आस्थावान हो नहीं सकते, न तो धार्मिक ही हो सकते हैं। चूंकि उनका मार्ग अधर्म का है, जिनका विश्वास मानवता में नहीं। वे सिर्फ हिन्दू ही नहीं होते, वे कभी इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख या नास्तिक भी नहीं हो सकते। नास्तिक भी क्योंकि मानवतावादी तो होते हैं।
काश कि यह बयान शाखाओं बारंबार दिया गया होता।
वैसे इन सबसे परे कुछ और भी ख्याल आते हैं। किसी की आस्था को कोई और प्रमाणित नहीं कर सकता। धर्म के दो स्तर हैं। उसके आध्यात्मिक पक्ष की कोई हदबंदी नहीं हो सकती। वह अनंत है। उपनिषद कहते हैं कि वह क्या नहीं है, 'नैति-नैति' ही कहा जा सकता है। वह क्या है, यह बताना मुश्किल है। अध्यात्म सरहदों से ऊपर है, जहां सोच खत्म हो जाती है। अभ्यास या सिलसिला अविरल बहता है ऐक्य बनता है। पर धर्म का प्रशासकीय ढांचा इससे अलग है। वहां सीमा होती है। चौकी बैठाते हैं, स्वयंभू पहरेदार डंडा बजाते हैं।
अध्यात्म में सरहद हो सकती है, जहां से आना-जाना कोई खास बड़ी बात नहीं। कई तहज़ीब मूल्य साझा हो जाते हैं। अली को गाते-गाते किशन कन्हैया को गाने लगते हैं। पर सीमा पक्की होती है। सीमा की जरूरत बंटवारा है। उसके बिना उसका गुजारा नहीं चलता। हर मज़हब के प्रशासकीय तंत्र में सीमाएं खिंची जाती हैं। यहां आदान-प्रदान के लिए परमिट जारी होता है। विशेषकर स्त्रियों को कोई इज़ाजत नहीं मिलती। वे आध्यात्मिक तौर पर आज़ाद होने पर भी विरले ही प्रशासकीय ढांचों की अदला-बदली कर सकती हैं। उन्हें सूफी, भक्ति, विदुषि संतों ने किया जिन्होंने फिर संसार के किसी विधान को नहीं माना।
धर्म का यह प्रशासकीय ढांचा बाज़ार से गठजोड़ कायम करता है। नहीं तो उसकी गुजर-बसर संभव नहीं। जहां अध्यात्म को निश्चित आकार मिला नहीं कि भौतिक निर्माण शुरू हो जाता है। उसके इर्दगिर्द बाज़ार पनपता है। चढ़ावा उसका ही भाग है। बाजार आएगा, तो मुनाफ़े की बात होगी, कमाने की नियत बनेगी। वरना कौन से राम या भगवान ने कुछ मांगा है।
यह भी याद रखा जाए कि सीमाओं में बंधे राष्ट्र-राज्यों का इतिहास मात्र कुछ सौ साल का है। उससे भी थोड़ा कम ही है। इस हदबंदी के बाद कोई नया फलसफा, कोई बोध, कोई आयत उतरी नहीं। कोई संप्रदाय यदि फैला तो वह है- बाज़ार। अध्यात्म सीमित होकर कायम हो भी नहीं सकता। नानक ने अपने जीवन में दूर तक यायावरी की और उससे अपना सिलसिला कायम किया। बुद्ध चलते गए। उपनिषद 'चरैवेति चलिष्यामः निरंतर' को गाते हैं। जो सीमा बनाकर टिक गए, वे नष्ट होंगे। यह कर्नाटक के मध्यकालीन संत बसवण्णा कहते हैं। आदिवासियत और खानाबदोशी इसलिए करीबन दो लाख साल से टिकी हुई है कि वे सीमित नहीं होते। भूमि प्रकृति के चक्र को समझकर घूमते हैं। चल पड़ते हैं।
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ऐसे में कुछेक प्रतिक्रिया भी याद आती है। यह कहा गया कि बाबर के देश में वज़ीरे आला को सम्मान मिला। तब लगता है कि आखिर अपनी समझ को क्या इतना तत्कालीन रखना चाहिए कि हमें विगत की व्यवस्था ही न समझ आए। उस समय की सरहदें आज से बेहद भिन्न थीं। यह सही है कि व्यक्ति को अपने जन्मस्थान से बहुत लगाव होता है। बाबर वहीं पैदा हुआ। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। पर क्या उज़्बेकिस्तान मात्र उसका है? क्या कोई देश सिर्फ किसी शासक का होता है। या इस बयान के जरिये हम आज भी भारत को मात्र उसके शासन तंत्र का मानते हैं। फिर उज़्बेकिस्तान के साथ केवल यही एक रिश्ता तो नहीं।
कहते हैं कि लोककथाओं में प्रसिद्ध महिवाल, सोहनी का प्रेम उज़्बेकी था। उस वक़्त आज के राष्ट्र-राज्य की हदें नहीं थीं। तक्षशिला या सागल प्रांत (सियालकोट) पर किसी समय ईरानी शासक दारियूस का भी नियंत्रण रहा। मध्य एशियाई घास के मैदानों से आया समूह उत्तर पश्चिम से पंजाब तक बढ़ा। वह संस्कृत की जननी भाषा बोलने वाला समूह था। अनेक मध्य एशियाई समूह यूची, हिन्द, यवन, शक, पार्थियाई उत्तर और पश्चिमी भारत तक फैले। केवल मुगलों की बात करें, तो उनका मूल मध्य एशियाई कबीलाई है, वे तहज़ीबी तौर पर फ़ारसी हुए नवरोज मनाते रहे। उन्होंने अरब में पनपे इस्लाम को अपनाया। उनकी अगली पीढ़ीयो का जन्म उत्तर भारत में हुआ, उत्तर भारत का रंग उन पर चढ़ा, उनकी शुरुआती भाषा तुर्की रही। सो उनको इन सबमें कहां का कहा जाए?
उस समय के आधार पर अब किसी का कोई अखंड राष्ट्र बन नहीं सकता। दरअसल, उस समय भी कोई अखंड राष्ट्र नहीं था। सरहदे थीं, जो बनती-बिगड़ती रहती थीं। इनसे परे जाकर आध्यात्मिक सिलसिला निर्झर होकर बहता था। वह कहीं कैद नहीं हुआ। भारत के भूभाग का तहज़ीबी विस्तार दक्षिण एशिया तक हुआ। पर हर विस्तार में स्थानिक रंग जुड़े। भारत को मात्र भूमि मानना उनको शोभा देता है जो उसके जरिये संसाधन पर कब्जा चाहते हैं। पर भारत कहां नहीं है! जहां मानवीय करुणा है, वहां भारत है। नेल्सन मंडेला, सरहदी गांधी, डॉ. कोटनिस क्या भारत का प्रतिबिंब नहीं। भले आज की हुकूमत इनको दिमागी नक्सल कह डाले, इतना तय है कि यह सभी धार्मिक थे, मानवीयता से भरे थे और उसके लिए सर्वस्व न्योछावर कर सकते थे। फिर वे हिन्दू थे या नहीं? भारत के थे या नहीं? यह सवाल अप्रासंगिक है।
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