गाजा में इजरायल के नरसंहार को भारत का खुला समर्थन, पीएम मोदी ने फादरलैंड को जमकर भेजी सैन्य मदद
हमारे प्रधानमंत्री भले ही ऐसे मामलों में तटस्थ होने का स्वांग करते हों, पर तथ्य यह है कि वे खुले मन से ऐसे क्रूर और विक्षिप्त शासकों का केवल समर्थन ही नहीं करते बल्कि इन देशों पर तमाम प्रतिबधों को दरकिनार करते हुए नरसंहार के लिए सैन्य मदद भी करते हैं।

इजरायल से बड़ा नरसंहारक देश इस दौर में दूसरा कोई नहीं होगा। बहुत सारे देश पड़ोसी देशों से युद्ध कर रहे हैं और दूसरे अनेक देशों की सत्ता अपने ही नागरिकों से युद्ध कर रही है– पर, इजरायल द्वारा अपने पड़ोसी देशों- विशेष तौर पर गाजा में और लेबेनान में– में बरसों से किया जाने वाला नरसंहार अभूतपूर्व है। इजरायल द्वारा नरसंहार का आलम यह है कि गाजा को पूरा नेस्तनाबूत करने के बाद और युद्धविराम की घोषणा के बाद भी हरेक दिन गाजा में हमले हो रहे हैं और निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं। ये हमले किसी सैन्य छावनी पर नहीं बल्कि टेंट में चल रहे स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों पर किए जा रहे हैं, वहां के हालात को दुनिया के सामने रखने वाले सभी पत्रकार मारे जा रहे हैं।
दूसरी तरफ रूस की सेना यूक्रेन में जाकर नरसंहार कर रही है, म्यांमार की सेना अपने ही नागरिकों को मार रही है, अमेरिका दुनिया के कई देशों को अस्थिर करता जा रहा है, अफगानिस्तान में तालिबान ने पूरी जनता को गुलाम बना दिया है। ऐसे और भी देश हैं जहां के शासक विक्षिप्त, हिंसक और नरसंहारक हैं और अनेक प्रजातान्त्रिक देश इन शासकों का विरोध भी करते हैं।
पर, दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जो प्रजातंत्र की जननी होने का दावा करता है, सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करता है- साथ ही प्रधानमंत्री के ऐसे हरेक विक्षिप्त और हिंसक मानसिकता वाली सत्ता से कमाल की नजदीकी है। उसके लिए इजरायल तो विशेष है– प्रधानमंत्री मोदी तो उसे फादरलैंड का तमगा दे चुके हैं।
युद्ध अपराधी हमारे प्रधानमंत्री का सबसे घनिष्ठ मित्र
हमारे प्रधानमंत्री भले ही ऐसे मामलों में तटस्थ होने का स्वांग करते हों, पर तथ्य यह है कि वे खुले मन से ऐसे क्रूर और विक्षिप्त शासकों का केवल समर्थन ही नहीं करते बल्कि इन देशों पर तमाम प्रतिबधों को दरकिनार करते हुए नरसंहार के लिए सैन्य मदद भी करते हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट पहले ही युद्ध अपराधी करार दे चुका है, और इंटरनेशनल वारंट वाला यह युद्ध अपराधी हमारे प्रधानमंत्री का सबसे घनिष्ठ मित्र है।
हाल में ही ऐम्निस्टी इंटरनेशनल ने 42 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सार्वजनिक की है, इस रिपोर्ट का शीर्षक है– “मेड इन इंडिया: द सप्लाई ऑफ वेपन्स एंड अम्यूनेशंस टू इजरायल”। इस रिपोर्ट के अनुसार 7 अक्टूबर 2023 के बाद से 30 नवंबर 2025 तक भारत ने इजरायल को हथियारों और हथियारों में इस्तेमाल किए जाने वाले पुर्जों और विस्फोटकों की 2596 खेप भेजी है। इसमें भारत की हथियार उत्पादक सरकारी और निजी कंपनियां दोनों ही शामिल हैं। इसमें 390516 मिलिट्री ग्रेड हथियारों के पुर्जे, 564970 विस्फोटकों के पुर्जे और 298 मिलिट्री वाहन शामिल हैं। यह सारी खेप इजरायल में उन कंपनियों को भेजी गई हैं जो केवल सैन्य सामग्री का उत्पादन या व्यापार करते हैं।
यह पूरा कारोबार अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकार का खुला उल्लंघन है। मई 2024 में स्पेन के कार्टाजेना बंदरगाह पर एक भारतीय पोत को रुकने की अनुमति नहीं दी गई थी क्योंकि चेन्नई से गए इस पोत पर इजरायल के लिए हथियार लदे थे। इसमें 20 टन रॉकेट इंजन, 12.5 टन विस्फोटकों के साथ रॉकेट और 1500 किलो विशेष विस्फोटक शामिल थे और यह पोत इजरायल के हाइफा बंदरगाह तक जा रहा था।
इजरायल ने दो वर्षों में 268 पत्रकारों की हत्या की
उस समय स्पेन के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य में कहा था कि इजरायल तक हथियार पहुंचाने वाले किसी पोत को हम अपने बंदरगाहों पर ठहरने की इजाजत नहीं दे सकते क्योंकि मध्य-पूर्व में शांति बहाल करने की जरूरत है, हथियारों की नहीं। इसके एक महीने बाद, जून 2024 में इजरायल ने गाजा में एक स्कूल पर हवाई हमले किए जिसमें 33 लोग मारे गए थे। इस हमले के बाद स्कूल के मलबे से विस्फोटकों के खोल निकाले गए- जिनपर “मेक इन इंडिया” की मुहर थी।
इजरायल की सेना इन हथियारों का कहां इस्तेमाल कर रही है, यह सबको पता है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जरनलिस्ट्स के अनुसार इजरायल की सेना ने 7 अक्टूबर 2023 के बाद से दो वर्षों के भीतर 268 पत्रकारों की हत्या की है, 174 पत्रकार घायल हैं और 2 पत्रकार लापता हैं। इसके अतिरिक्त 108 मीडिया कर्मियों को बंदी बनाया गया है। इजरायल ने पत्रकारों को निशाना बनाकर ड्रोन से भी चुनिंदा हमले किए हैं। वर्ष 2025 में दुनिया में 129 पत्रकार मारे गए, जिसमें से दो-तिहाई अकेले इजरायल के हमले में मरे।
संयुक्त राष्ट्र की 4 अगस्त 2026 की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, गाजा पट्टी में इजरायल ने 500 से अधिक स्कूलों को ध्वस्त कर दिया है और अब राहत शिविरों और तंबुओं में चल रहे स्कूलों को भी निशाना बना रहे हैं। हाल में ही एक तंबू में चल रहे स्कूल को निशाना बनाया गया जिसमें छठी कक्षा के एक छात्र की मौत हो गई। बैट लहिया इलाके में बचे अंतिम स्कूल को ध्वस्त कर दिया गया और वेस्ट बैंक के स्कूल पर भी हमला किया गया जिससे इसका एक हिस्सा ध्वस्त हो गया। इस विज्ञप्ति में कहा गया है कि युद्धविराम के तमाम दावों के बाद भी गाजा का क्षेत्र नागरिकों और छात्रों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है।
अब कोई युद्ध अपराधी नहीं होता
अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समझौतों के अनुसार, युद्ध की स्थिति में केवल सैन्य ठिकानों पर ही हमले किए जाने चाहिए। पर, अब स्थितियां बिल्कुल भिन्न हैं– अब युद्ध में सबसे पहले स्कूलों, अस्पतालों, राहत शिविरों और जल संसाधनों के साथ ही घनी आबादी पर बम बरसाए जाते हैं या टैंकों से हमले किए जाते हैं। यह इतना सामान्य हो चला है कि अब कोई युद्ध अपराधी नहीं होता, और यदि होता भी है तो पूरी दुनिया में उसका स्वागत होता है, वही मानवाधिकार का मसीहा करार दिया जाता है। आज तक दुश्मनों के इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं या जल संसाधनों को नेस्तनाबूत करने के कारण किसी को न्यायालयों ने अपराधी घोषित नहीं किया है।
सेफगार्डिग हेल्थ इन कान्फ्लिक्ट नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन के अनुसार वर्ष 2021 के बाद से स्वास्थ्य सेवाओं और कर्मियों पर हमले दोगुने से भी अधिक बढ़ गए हैं। अब ऐसे हमले गलती से नहीं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से किए जाते हैं और व्यापक रणनीति का यह हिस्सा रहते हैं। युद्ध में अब ऐसा किसी एक देश द्वारा नहीं बल्कि हरेक देश द्वारा किया जा रहा है। इसका इतना व्यायाक प्रसार हो गया है कि म्यांमार या सूडान जैसे देशों में तो राष्ट्रीय सेना अपने विरोधियों के इलाके में भी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले कर रही है। बुनियादी सुविधाओं पर योजनाबद्ध हमलों की शुरुआत वर्ष 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमलों के दौरान हुई। इसके बाद वर्ष 2023 में इजरायल ने गाजा और लेबनान पर हमलों के दौरान बुनियादी सुविधाओं पर हमलों को बिल्कुल “सामान्य” बना दिया।
अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले वर्ष 2024 में सर्वाधिक दर्ज किए गए, पर वर्ष 2025 में भी दुनिया के 33 देशों में ऐसे 2500 से अधिक हमले किए गए। वर्ष 2021 के बाद से फिलिस्तीन में 811 स्वास्थ्यकर्मियों की इजरायल के हमले में मौत दर्ज की गई है। यह संख्या दुनिया के किसी भी देश की तुलना में सर्वाधिक है, इसके बाद लेबनान में इजरायल के हमलों के दौरान 569 मौतें हुईं। इन दोनों आंकड़ों से स्पष्ट है कि इजरायल की युद्ध रणनीति में दुश्मनों के स्वास्थ्य सेवाओं और कर्मियों की मौत स्पष्ट तौर पर शामिल है। इसके बाद यूक्रेन में 482 स्वास्थ्यकर्मी, सूडान में 230, म्यांमार में 176, अफगानिस्तान में 101, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 97, सीरिया में 82, इथियोपिया में 77 और ईरान में 58 स्वास्थ्यकर्मी मारे गए।
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स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रहार आज नया नॉर्मल
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अकेले वर्ष 2025 में इजरायल ने 247 स्वास्थ्य केंद्रों को बमबारी में ध्वस्त किया और इन हमलों में 148 स्वास्थ्यकर्मी मारे गए। इस वर्ष जून के महीने में एक सप्ताह के भीतर ही इजरायल की वायु सेना ने 3 बड़े अस्पतालों पर बमबारी की जिसमें 150 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी जखमी हुए। वर्ष 2021 से अब तक फिलिस्तीन में 3889 स्वास्थ्य केंद्र नष्ट हो चुके हैं, यूक्रेन में 3157, म्यांमार में 1951, कांगो में 962, सूडान में 891, लेबनान में 782, अफगानिस्तान में 403, सीरिया में 370, मेक्सिको में 150 और कोलंबिया में 111 स्वास्थ्य केंद्र नष्ट किए जा चुके हैं।
पहले जब युद्ध होते थे, या आतंकवादी हमले होते थे, तब सैन्य ठिकानों, भीड़ की जगहों या शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए जाते थे, पर आज के दौर में हमले अस्पतालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, विद्यालयों, पानी आपूर्ति के ठिकानों या बिजलीघरों पर होने लगे हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2024 में स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर युद्ध या अशांत क्षेत्रों में कुल 3623 हमले किए गए, यानि हरेक दिन औसतन 10 से अधिक हमले, यह संख्या पहले के किसी भी वर्ष की तुलना में सर्वाधिक है, वर्ष 2023 की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है और वर्ष 2022 की तुलना में 62 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट में इसे आतंकवाद का एक नया स्वरूप करार दिया गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं और दूसरे बुनियादी सुविधाओं पर प्रहार आज के दौर का एक नया नॉर्मल है, पर शांति का दिखावा करती दुनिया इसे आतंकवाद नहीं मानती है। रूस और इजरायल जैसे देश पूरी दुनिया के चहेते बने बैठे हैं जबकि वे लगातार नरसंहार करते जा रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं और स्कूलों जैसे ठिकानों पर हमले केवल एक भवन पर हमला नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी आबादी के जीवन और मृत्यु से जुड़ा है, आने वाली पीढ़ी से जुड़ा है और गर्भ में पल रहे शिशु से जुड़ा है। और, दुखद तथ्य यह है कि हम जिस देश में रहते हैं वहां की सत्ता खुलेआम इन नरसंहारियों का सहयोग कर रही है और समर्थन कर रही है।
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