आकार पटेल का लेख: विश्व रैंकिंग के हर मोर्चे पर फिसड्डी हो चुका है देश, पर 'अमृतकाल' में सरकार को इसकी परवाह नहीं

लेकिन वैश्विक संकेतक तो सामने आते ही रहेंगे और इनमें भारत की स्थिति खराब होती रहेगी। लेकिन चूंकि हम 'अमृतकाल' में प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए इन सब मामलों में हम नीचे जाते रहें कोई फर्क नहीं पड़ता और इससे हम कहां पहुंचेंगे इसकी भी चिंता नहीं करनी।

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आकार पटेल

जुलाई 2020 में केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि वह 29 वैश्विक सूचकांकों पर भारत के प्रदर्शन पर नजर रखेगी। इस सिलसिले में केंद्र के 47 मंत्रालयों और विभागों की बैठक भी हुई है और तय किया गया कि इन संकेतकों पर भारत की रैंकिंग को कैसे सुधारा जाए। चलिए देखते हैं कि इसके बाद क्या हुआ।

संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में हम एक स्थान नीचे आ गए हैं। इसका कारण लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य में औसत आय और विनिवेश में कमी होना है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खुशहाली रिपोर्ट यानी हैप्पीनेश रिपोर्ट खुशी को नहीं मापती है। यह प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी, जिंदगी जीने की उम्मीद, स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार की धारणाओं को मापती है। इस मोर्चे पर भारत 19 पायदान गिर चुका है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स, जो भूख, बच्चों में स्टंटिंग और अल्पपोषण को मापता है, इस संकेतक पर भारत 46 स्थान गिर गया है और आज पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे है।

अमेरिका में कंजर्वेटिव (यानी दक्षिणपंथी) संस्थाएं लंबे समय से स्वतंत्रता पर अपने दृष्टिकोण से दुनिया की निगरानी कर रहे हैं। कैटो ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स में भारत 44 स्थान नीचे आ गया है और इसका कारण कानून के शासन, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यापार की स्वतंत्रता में गिरावट है।

विश्व आर्थिक मंच या वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (जिसे दावोस के नाम से जाना जाता है) ग्लोबल जेंडर गैप इंडैक्स यानी वैश्विक स्तर पर लिंभ अनुपात का इंडेक्स जारी करता है। इसमें किसी देश में लैंगिक समानता पर प्रगति की निगरानी की जाती है। इसमें भी भारत 26 पायदान गिर गया है। विश्व बैंक अपने महिला, व्यापार और कानून सूचकांक के माध्यम से महिलाओं के आर्थिक अवसरों की निगरानी करता है। भारत इसमें भी 13 पायदान गिर गया है।

नागरिकों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा, गतिशीलता यानी मोबिलिटी, गतिविधियों यानी एक्टिविटीज़ और अवसरों जैसे मानकों को मापने वाले स्मार्ट सिटीज इंडेक्स में दिल्ली 18 स्थान, बेंगलुरु 16 स्थान, हैदराबाद 18 स्थान और मुंबई 15 स्थान नीचे गिरा है। एक्सेस नाउ ट्रैकर दुनिया भर में इंटरनेट शटडाउन पर नजर रखता है। भारत इस मामले में वर्ल्ड लीडर है। भारत में 2014 में 6 शटडाउन, 2015 में 14, 2016 में 79, 2017 में 134, 2019 में 121 और 2020 में 109 इंटरनेट शटडाउन हुए थे। 2021 में यह संख्या 106 थी। 2019 में कुल 213 वैश्विक शटडाउन में से, 56 प्रतिशत शटडाउन भारत में हुए थे जोकि वेनेजुएला से 12 गुना अधिक थे जो इस मामले में दूसरे नंबर पर था)। 2020 में दुनिया भर में कुल 155 इंटरनेट शटडाउन हुए थे जिसमें से अकेले भारत में 70 फीसदी भारत में ही हुए थे और इससे महामारी के दौर में भी मरीजों, छात्रों आदि पर गंभीर प्रभाव पड़ा था।


वैश्विक आरटीआई रेटिंग में भी भारत 4 स्थान नीचे गिर गया है और अब तो इस मोर्चे पर बहुत कुछ अपारदर्शी हो चुका है।

लोकतंत्र को मापने वाले संकेतकों पर भी भारत कई स्थान नीचे आया है, और इस बारे में काफी कुछ छपा-लिखा गया है।

गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के लोकतंत्र की विविधता पर नजर रखने वाले इंडेक्स में, भारत एक लोकतंत्र के रूप में अपनी स्थिति खो चुका है और हंगरी और तुर्की जैसे देशों में शामिल होकर एक 'चुनावी निरंकुशता' वाले देश के रूप में वर्गीकृत किया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया और नागरिक समाज पर, भारत 'पाकिस्तान की तरह निरंकुश और बांग्लादेश और नेपाल दोनों से भी बदतर' स्थिति में है।

फ्रीडम हाउस के विश्व सूचकांक में, भारत 'स्वतंत्र' से 'आंशिक रूप से स्वतंत्र' हो गया है और कश्मीर, जिसे अलग से स्थान दिया गया है, 'आंशिक रूप से स्वतंत्र' की श्रेणी में नहीं बल्कि से 'स्वतंत्र नहीं' की श्रेणी में चला गया है। सिविकस मॉनिटर की नेशनल सिविक स्पेस रैंकिंग एसोसिएशन, शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देखती है (जो कि अनुच्छेद 19 के तहत भारत में मौलिक अधिकार हैं)। इसमें भारत अभियक्ति को रोकने वाले देश की श्रेणी से फिसकर 'अभिव्यक्ति का दमन करने वाले' देश के रूप में दर्ज हुआ है।

इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 19 पायदान गिर गया है। भारत ने कठोर शक्ति, अर्थात् सैन्य क्षमता और दुनिया को प्रभावित करने की शक्ति खो दी है, और लोवी इंस्टीट्यूट के एशिया पावर इंडेक्स पर, भारत ने लद्दाख में घटनाओं के बाद 2020 में अपनी 'प्रमुख शक्ति' का दर्जा खो दिया है।

द वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट मॉनिटर यानी विश्व न्याय परियोजना देशों में कानून के शासन की निगरानी करती है। भारत यहां 13 पायदान गिर गया है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 10 पायदान गिर गया है। ब्लूमबर्ग की कोविड रेजिलिएशन रैंकिंग ने भारत को दुनिया में नीचे से चौथा स्थान दिया है जोकि पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी खराब स्थिति है।

विश्व वायु गुणवत्ता सूचकांक को देखें तो दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 22 भारत में हैं जबकि 2017 में इनकी संख्या 11 थी। येल पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक पर, जो पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा को देखता है, भारत 13 स्थान गिर गया और बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल से पीछे चला गया। इसी तरह क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स में यह 11 पायदान गिरकर पाकिस्तान और बांग्लादेश से फिर से पीछे हो गया। भारत सतत विकास सूचकांक में 10 स्थान गिर गया।


2020 के अगस्त में, यह बताया गया कि 'मोदी सरकार ने वैश्विक सूची में भारत की रैंक को बढ़ावा देने के लिए' छवि सुधार 'के लिए मीडिया ब्लिट्ज की योजना बनाई है। इसमें 'बड़े पैमाने पर मीडिया में पब्लिसिटी के लिए विभिन्न मंत्रालयों द्वारा बनाए गए मल्टीमीडिया अभियान और माइक्रोसाइट्स (वेबसाइटों के भीतर साइटें) शामिल किए जाएंगे'। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रचार घरेलू और वैश्विक स्तर पर भारत को लेकर लोगों की राय बदलने में मदद करेगा और वैश्विक सूचकांकों के तौर तकीकों, समस्याओं, मापदंडों और डेटा स्रोतों को सामने रखेगा।

पब्लिसिटी से भारत की रैंकिंग में बदलाव कैसे आएगा, यह नहीं बताया गया।

अगस्त 2020 के बाद भी भरात की रैंकिंग नीचे आती रही, तो सरकार ने तय किया कि वह इन आंकड़ों और संकेतकों पर ध्यान ही नहीं देगी। इसके बजाए वह यह कहेगी या कहती रहेगी कि सारे संकेतक गलत और पक्षपातपूर्ण हैं। यह वही बात हुई कि जब किसी बच्चे का खेल में मन न लगे तो वह अपने स्टंप्स उठाकर खेल ही खराब कर दे।

लेकिन वैश्विक संकेतक तो सामने आते ही रहेंगे और इनमें भारत की स्थिति खराब होती रहेगी। मुद्दा यह है कि किसी समस्या के निदान के लिए यह मानना सबसे जरूर है कि समस्या है। इसके बाद ही हम सोच सकते हैं कि क्या गलत है और क्या सही और इसे कैसे सही किया जाए। लेकिन चूंकि हम अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए इन सब मामलों में हम नीचे जाते रहें कोई फर्क नहीं पड़ता और इससे हम कहां पहुंचेंगे इसकी भी चिंता नहीं करनी।

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