श्रीकृष्ण भी दिखा गए हैं प्रतिरोध की एक राह

श्रीकृष्ण का अपने समय में बेहद शक्तिशाली इन्द्र के खिलाफ ब्रजवासियों को एकजुट कर प्रतिरोध के लिए प्रेरित करना और प्राण-पण से उसे सफल बनाना भी ऐसी ही एक प्रेरणा है, जिसके मद्देनजर कई हल्कों में श्रीकृष्ण को 'प्रतिरोध के देव' के रूप में भी याद किया जाता है।

श्रीकृष्ण भी दिखा गए हैं प्रतिरोध की एक राह
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इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (जिसे देश के अनेक भागों में श्रीकृष्ण जयंती कहकर भी संबोधित किया जाता है) ऐसे कठिन वक्त में आई है, जब हमारी दुनिया कई-कई युद्धों से आक्रांत है तो हमारा देश सत्ताधीशों के विश्वासघात से पीड़ित नई पीढ़ी के आक्रोश से उबल रहा है। निर्मम पुलिसिया दमन के बावजूद हम इस पीढ़ी को जैसे हौसले के साथ प्रतिरोध के विभिन्न मोर्चों पर जूझते देख रहे हैं, वह उसके इसी आक्रोश की स्वाभाविक परिणति है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के प्रसंग में बात करें तो इस पीढ़ी का यह प्रतिरोध लगभग वैसा ही है, जैसा देवताओं के राजा इन्द्र के अन्यायों और अत्याचारों से त्रस्त ब्रजवासियों ने कभी श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में किया था। साफ है कि देश में अन्यायी और अत्याचारी सत्ताओं के प्रतिरोध की परम्परा कतई नयी नहीं है और उसकी प्रेरणाएं बहुत पुरानी हैं। 

श्रीकृष्ण का अपने समय में बेहद शक्तिशाली इन्द्र के विरुद्ध ब्रजवासियों को एकजुट कर प्रतिरोध के लिए प्रेरित करना और प्राण-पण से उसे सफल बनाना भी ऐसी ही एक प्रेरणा है, जिसके मद्देनजर कई हल्कों में श्रीकृष्ण को 'प्रतिरोध के देव' के रूप में भी याद किया जाता है।

कई जानकार तो उनके नेतृत्व में किए गए उस प्रतिरोध को हमारी परंपरा का अब तक का 'सबसे क्रांतिकारी कदम' बताते हैं, जबकि अनेक भक्त उसे दमनकारी सत्ताओं और साथ ही अंधविश्वासों के खिलाफ बड़ा वैचारिक व सामाजिक विद्रोह मानते और श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला की संज्ञा देते हैं।

इस लीला को याद करते हुए उनका यह विश्वास अगाध हो जाता है कि जैसे उसने ब्रजवासियों पर इंद्र के कोप का अंत सुनिश्चित किया था, वैसे ही नई पीढ़ी का वर्तमान प्रतिरोध देशवासियों को वर्तमान लोकविमुख सत्ता द्वारा उन पर थोप दी गई विडम्बनाओं से मुक्त करेगा। 

अब यह बात तो हम अपने देश और दुनिया के मुक्ति संघर्षों के लम्बे अनुभवों से जानते ही हैं कि न ऐसे एकजुट प्रतिरोध से भिड़ने वाले अन्यायी सत्ताधीशों की हार नई रह गई है और न प्रतिरोध करने वालों की जीत।


बहरहाल, पुराणों के अनुसार ब्रजमंडल (जिसमें मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, नंदगांव और गोवर्धन आदि शामिल हैं) के निवासियों पर इंद्र के अत्याचारों की कोई सीमा नहीं रह गई और उसके डर के मारे वे मन न होने पर भी हर साल उसकी पूजा करने को अभिशप्त हो गये, तो श्रीकृष्ण से यह विडंबना देखी नहीं गई। 

उन्होंने उस भयजनित पूजा को सीधी चुनौती दी और ब्रजवासियों से कहा कि पूजा तभी सच्ची पूजा कहलाती है, जब भयवश नहीं, बल्कि कृतज्ञतावश की जाये।  उन्होंने उनको यह भी समझाया कि उनका जीवन इंद्र की अनुकम्पा के बजाय गोधन, वनों और गोवर्धन पर्वत पर निर्भर है, इसलिए उनको इंद्र की पूजा की परंपरा तोड़कर गोवर्धन की पूजा शुरू करनी चाहिए और उसको प्रकृति और पर्यावरण की पूजा का पर्याय बनाना चाहिए। 

लेकिन गोवर्धन पूजा के कारण अपनी पूजा रुकने से कुपित इंद्र ने ब्रज को डुबोकर नष्ट कर देने के मंसूबे से उस पर प्रलयंकारी वर्षा शुरू कर दी। कहते हैं कि उन्होंने प्रलय के बाद छाने वाले संवर्तक मेघों को बुलाया और ब्रज पर प्रलयंकर बारिश के साथ इतनी तेज ठंडी हवाएं चलाने का आदेश दे दिया, जिससे वह थर्रा उठे। फिर क्या था, आसमान से बड़े-बड़े ओले गिरने लगे, साथ ही भयानक बिजली भी, जिससे चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। लगातार सात दिन और सात रात ऐसा ही चलता रहा तो यमुना और दूसरी नदियां उफनाने लगीं, जिससे पूरा क्षेत्र जलमग्न होने की स्थिति में आ गया और ब्रजवासियों व उनके पशुओं का जीवन संकट में पड़ गया।

फिर तो भीषण हाहाकार के बीच  सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि अब क्या हो? ऐसी कठिन घड़ी में श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के अत्याचार से हार मानकर उसके सामने झुक जाने के बजाय गोवर्धन को ऊपर उठाकर अपने सिर पर छतरी की तरह तानकर वर्षा के विरुद्ध अपना कवच बना लेने की सीख दी। फिर इस असम्भव दिख रहे कार्य को अपने बातें हाथ की सबसे छोटी उंगली कनिष्ठा से संभव कर दिखाया और सबकी रक्षा की।

अनंतर, इंद्र का अहंकार टूटा और उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी तो श्रीकृष्ण की शक्ति में आश्वस्त ब्रजवासियों ने उनके साथ मिलकर इंद्र का अहंकार टूटने का उत्सव भी मनाया। अनंतर, इस प्रतिरोध ने ही श्रीकृष्ण को मुरलीधर से गिरिधर (एक उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने में समर्थ) बनाकर उनके नायकत्व को नई प्रतिष्ठा प्रदान की।

जैसा कि पहले भी इंगित कर आये हैं, हमारे लिए इस लीला का अब भी प्रासंगिक सामाजिक संदेश यही है कि कोई अन्यायी राजा, वह कितना भी शक्तिशाली और देवता ही क्यों न हो, अपनी शक्तियों व अधिकारों का दुरुपयोग करके प्रजा पर अत्याचार करने लगे तो हर हाल में उसका प्रतिरोध करना चाहिए और बिना सोचे-समझे रूढ़ियों की राह पर चलते और उनकी लकीर पीटते रहने के बजाय तर्क व कल्याण का मार्ग चुनना चाहिए।


प्रसंगवश, श्रीकृष्ण के भक्त उनके लिए गिरिधर के अतिरिक्त योगेश्वर, लीलाधर, सम्पूर्ण पुरुष, माखनचोर, चितचोर, रास रचैया आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग करते हैं। दूसरी ओर दार्शनिक चर्चाओं में इस बात को अलग से और खास तौर पर रेखांकित किया जाता है कि समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपने लब्धप्रतिष्ठ निबंध 'राम, कृष्ण और शिव' में उन्हें राम-कृष्ण के साथ भारत में पूर्णता के तीन महान स्‍वप्नों में से एक बताया है। साथ ही कहा है कि भले ही ये तीनों स्वप्न एक दूसरे के विपरीत और अलग-अलग दिखते हैं, इनमें इस देश के रंग, सपने और उदासी एक साथ झलकते हैं।

इसी निबंध में उन्होंने आगे लिखा है कि 'राम ने निरंतर देव बनने की तो कृष्ण ने लगातार मनुष्य बनने की कोशिशें कीं और 'सम्पूर्ण पुरुष' बने। भगवान होते हुए भी वे हर पल एक साधारण और जीवंत मनुष्य की तरह पेश आए। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उनके चेहरे पर मुस्कान और आनंद बने रहे। वे कभी जीवन से भागे नहीं और हर परिस्थिति का हंसते हुए अपनी खास तरह की कूटनीतिक दूरदर्शिता से सामना किया। इतना ही नहीं, जीवन के  विरोधाभासों को भी आनंदपूर्वक नायकसुलभ गहराई से जिया।

ऐसे में स्वाभाविक ही है कि उनके नायकत्व में आश्वस्त जनमानस उनके जीवन-दर्शन को उनकी लीलाएं माने और लीलाओं के अगणित और असीम होने के कारण उन्हें लीलाधर कहे।

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कवि रहीम तो अपने एक दोहे में यह तक कह गये हैं कि गिरिधर होने के बावजूद कोई उन्हें कोमलगात समझे और मुरलीधर कहे तो भी वे 'कछु दुख मानत नाहिं।' इसलिए कि उनके निकट उनके जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने में जितना योगदान उनके गिरिधर होने का है, उतना ही मुरलीधर होने का भी। बल्कि कुछ मायनों में मुरलीधर होने का कुछ ज्यादा ही योगदान है।

बहरहाल, गोवर्धनलीला के अलावा रासलीला समेत उनकी दूसरी अनेक लीलाओं में कई गम्भीर दार्शनिक संदेश हैं। महाभारत युद्ध के दौरान मोहग्रस्त होकर युद्धविरत हुए अर्जुन को भगवद्गीता के माध्यम से उन्होंने जो ज्ञान दिया, अपने जीवन और उपदेशों में कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग का जैसा अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया और भोग व योग के बीच जैसा आदर्श संतुलन स्थापित करना सिखाया, उसने उनको सारे योगों का स्वामी यानी योगेश्वर बना दिया। 

तिस पर जैसे श्रीकृष्ण की लीलाएं अनंत है, वैसे ही उनके भक्तों की परम्परा भी अगाध है। जाति-धर्म और ऊंच-नीच के बंधनों से परे उनके ऐसे भक्तों की संख्या भी बहुत बड़ी है, जो हिंदू धर्मावलंबी नहीं हैं। इनमें निम्नलिखित शब्दों में अपने जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा व्यक्त कर गये रसखान के नाम से तो शायद ही कोई कृष्ण भक्त अपरिचित हो: 

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पसु हौं तो कहा बसु मेरा चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।

पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरंदर कारन।

जो खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन॥


स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, उर्दू शायर और 'इंकलाब जिंदाबाद' नारे के रचयिता मौलाना हसरत मोहानी इंकलाबी तो थे ही, श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त भी थे। उनकी कृष्ण भक्ति उनकी गंगा-जमुनी तहजीब में भी झलकती थी, उदारवादी सोच में भी और अनोखी शायरी में भी।

वे इन्द्र का अहंकार तोड़ने वाली श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से बहुत प्रभावित थे और स्वतंत्रता संघर्ष के संदर्भ में उसको बहुत प्रेरक करार देते थे। इतना ही नहीं, उनको 'हजरत कृष्ण अलैहिररहमा' कहते थे और हर जन्माष्टमी पर मथुरा और गोकुल जाकर पूरी रात उनकी भक्ति में लीन रहते थे। इतना ही नहीं, उनके प्रति गहरे प्रेम और समर्पण के प्रतीक के तौर पर एक बांसुरी हमेशा अपने पास रखते थे। उनको श्रीकृष्ण से आध्यात्मिक प्रेम भी था और व्यक्तिगत भी। अपनी कई रचनाओं में वे खुद को ऐसी 'गोपी' की तरह महसूस कर गये हैं, जो मुरलीवाले (कृष्ण) की एक झलक पाने के लिए व्याकुल रहती है। 

बंगला के महानतम कवियों में से एक काजी नजरुल इस्लाम भी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी दो अलग-अलग कविताओं में वे लिख गये हैं: अगर तुम राधा होते श्याम, मेरी तरह बस आठो पहर तुम रटते श्याम का नाम... आज बन उपवन में चंचल मेरे मन में मोहन मुरलीधारी कुंज-कुंज फिरे श्याम!

ये दोनों काव्यांश पढ़कर आपके मन-मस्तिष्क में भी कहीं कोई बांसुरी बजने लगे तो कतई चकित मत होइए। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है और लीलाएं तो ऐसी कि एक बार मन उनमें रम जाये तो 'वह सुख टरत न काहूँ मन तैं।' 

फिर इसको लेकर भी चकित क्या होना कि उनके द्वारा दिखाई गई प्रतिरोध की राह लगातार नये काफिलों की जरूरत जताती रहती है।

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