लोकतंत्र और शांतिपूर्ण आंदोलन की जीत है मोदी सरकार का विवादित कृषि कानून वापस लेना

कृषि कानूनों की वापसी से साबित हो गया है कि जब इरादे अडिग हों और सामूहिक एकता हो तो सत्ता कितनी भी ताकतवर क्यों न और उसके पास संसदीय बहुमत क्यों न हो, उसे जनभावनाओं के सामने हार माननी पड़ती है।

फोटो: Getty Images
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तसलीम खान @TasleemKhan

शांतिपूर्ण आंदोलन की ताकत, विपक्षी एकता, लोकतांत्रिक तरीकों से विरोध के सामने तानाशाही तौरतरीके सदा से पराजित होते आए हैं, और विवादित कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान इसी का सबूत है।

प्रधानमंत्री ने शुक्रवार की सुबह जब देश के नाम संबोधन में देशवासियों को गुरुनानक देव जी के प्रकाश पर्व की बधाइयां देने के बाद किसानों की बात शुरु की तो साफ हो गया था कि आने वाले विधानसभा चुनावों का भय बीजेपी को अंदर-अंदर परेशान कर रहा है और किसी भी क्षण प्रधानमंत्री कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर देंगे। वही हुआ और उन्होंने अपने तौर कुछ तर्क सामने रखते हुए ऐलान किया कि केंद्र सरकार तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेगी और इस बाबत संसद के शीत सत्र में प्रस्ताव लाया जाएगा।

ध्यान रहे कि इसी 26 नवंबर को किसान आंदोलन का एक वर्ष पूरा हो रहा है। प्रधानमंत्री के ऐलान के साथ ही लोकतंत्र एक बार फिर जीत गया है। साथ ही बीते एक साल से दिल्ली की दहलीजों पर संघर्षरत किसानों की जीत हो गई है। प्रधानमंत्री ने अपने ऐलान के साथ यह भी कहा कि, "इन कृषि कानूनों को लेकर किसानों का एक तबका संतुष्ट नहीं था, लिहाजा हमें यह फैसला लेना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि "एमएसपी के नये फ्रेमवर्क पर काम करने के लिए सरकार एक कमेटी गठित करेगी। जिसमें केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के साथ ही किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि अर्थशास्त्रियों के भी प्रतिनिधि शामिल होंगे।"

केंद्र की इस घोषणा के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि भले ही सत्ता कितनी ताकतवर और अहंकारी क्यों न हो, उसे सामूहिक एकजुटता और लोकतांत्रिक विरोध के सामने घुटने टेकने ही पड़ते हैं। विपक्षी दलों, खासतौर से मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का लगातार किसानों आंदोलन के साथ खड़े रहना, गैर बीजेपी शासित राज्यों द्वारा इन कानूनों को नकार देना, लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन करना, उस भारत की जीत है जिसकी बुनियाद जनसंघर्षों और बहुलतावाद पर है।

हालांकि इस आंदोलन के दौरान 400 से अधिक किसानों को शहादत देनी पड़ी, सत्ता के अहंकार और जुल्म को सहना पड़ा। सर्दी, गर्मी और बारिश के मौसम में सत्ता के इशारे पर पुलिस बर्बरता का सामना करना पड़ा, लेकिन जब इरादे अडिग हों और सामूहिक एकता हो तो सत्ता कितनी भी ताकतवर क्यों न और उसके पास संसदीय बहुमत क्यों न हो, उसे जनभावनाओं के सामने हार माननी पड़ती है।

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