अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने वाली मोदी सरकार अब समझ ही नहीं पा रही कि इसे कैसे संभाला जाए

जिस असंगठित क्षेत्र का जीडीपी में आधा योगदान हो और जो नकद पर टिका हो, उसकी जान तो सरकार ने ही पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी से निकाल दी। अब मोदी सरकार को समझ नहीं आ रहा कि ढलान पर तेजी से लुढ़कती देश की अर्थव्यवस्था को रोका कैसे जाए।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

असंगठित क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश के कुल रोजगार में इस क्षेत्र का योगदान तकरीबन 92 फीसदी है। लगभग 40 करोड़ लोगों को यह क्षेत्र रोजगार देता है और देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 45 फीसदी है। पर मोदी राज में सबसे ज्यादा चोट इसी क्षेत्र पर पड़ी है, जिसका नतीजा है कि देश की विकास दर पिछले 8 साल के सबसे कम स्तर पर जाने के लिए अभिशप्त है।

असंगठित क्षेत्र में कृषि, कंस्ट्रक्शन उद्योग, खुदरा छोटे व्यापारी, फेरीवाले, मछुवारे, सब्जी वाले और तमाम छोटे-छोटे उद्यमी आदि आते हैं। मूलतः यह क्षेत्र कैश (नकदी) प्रधान है। बाजारवादी अर्थशास्त्री मानते हैं कि असंगठित क्षेत्र काला धन और कर चोरी का सबसे बड़ा स्रोत है। मोदी सरकार ने भी इस क्षेत्र की यही छवि बनाई है। नोटबंदी और फिर वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) ने असंगठित उद्योग और इस क्षेत्र के कामगारों की कमर तोड़ दी है, जिससे अब तक यह क्षेत्र उबर नहीं पाया है। पर मोदी सरकार खुश है कि उसके आर्थिक निर्णयों और नतीजों से असंगठित क्षेत्र का दायरा सिमट रहा है और संगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा है जो देश में नाम मात्र यानी 8 फीसदी लोगों को रोजगार मुहैया कराता है।

मोदी सरकार के मंत्रियों-संत्रियों को छोड़ सभी प्रतिष्ठित वित्त संस्थानों का मानना है कि वित्त वर्ष 2019-20 में विकास दर 6 फीसदी से कम रहेगी। इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 19) में विकास दर 5 फीसदी से नीचे लुढ़क सकती है। इसका संकेत साफ है कि असंगठित क्षेत्र की विकास दर इस आकलन से काफी नीचे रहेगी यानी इस क्षेत्र में आर्थिक तंगी और विकराल होगी।

असंगठित क्षेत्र पर सबसे ज्यादा मार नोटबंदी और जीएसटी की पड़ी है, जिसे मोदी सरकार अब तक मानने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार के मंत्री-संत्री कभी टैक्सी परिचालक कंपनियां ओला और उबर के तेज विस्तार का, कभी सिनेमाघरों की टिकट बिक्री का या फिर देश में हो रही शादियों और यात्रियों से ठसाठस भरे हवाई अड्डों का हवाला देकर मंदी को नकारने की बेशर्म कोशिश करते हैं और कहते हैं कि देश में पैसे की कोई तंगी नहीं है और यह सब मोदी सरकार को नाहक बदनाम करने का षड्यंत्र है।

पर जमीनी हकीकत इन बयानों से ठीक उलट है। ऑल इंडिया मैन्यूफैक्चर्स ऑर्गनाइजेशन का एक सर्वेक्षण बताता है कि अर्थव्यवस्था अब तक नोटबंदी और जीएसटी के झटकों से उबर नहीं पाई है। इस संस्था के 3 लाख सदस्य हैं। सर्वेक्षण के अनुसार छोटे उद्योगों में 2014 से लगभग एक तिहाई रोजगार कम हुए हैं, जबकि व्यापार में 40 फीसदी कमी आई है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजदीकी नजर रखने वाली ख्यात संस्था सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार पिछले एक साल में तकरीबन 1.10 करोड़ रोजगार खत्म हुए हैं, जिसकी सबसे ज्यादा मार असंगठित ग्रामीण क्षेत्र के रोजगारों पर पड़ी है। लेकिन अनाधिकारिक आंकड़े आधिकारिक रोजगार आंकड़ों को झुठलाते हैं। मोदी सरकार ने रोजगार के आंकड़ों से घबराकर श्रम ब्यूरो के रोजगार सर्वेक्षण को ही खत्म कर दिया है।

साल 2004-2007 के बीच अर्थव्यवस्था 7-8 फीसदी की दर से बढ़ रही थी जिसका चौतरफा असर दिखाई देता था। तब असंगठित क्षेत्र के उद्योगों और रोजगार में तेज उछाल साफ देखा जा सकता था। तब कंस्ट्रक्शन उद्योग में रोजगार अवसरों में सर्वाधिक वृद्धि हुई थी। लेकिन पिछले कई सालों से कंस्ट्रक्शन उद्योग भी कृषि की तरह पस्त पड़ा हुआ है, जिसका सीधा असर रोजगार अवसरों और आय पर पड़ा है। ये दोनों क्षेत्र ही देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराते हैं।

आर्थिक बदहाली के कारण आज किसान, व्यापारी, उद्यमी और युवा सबसे ज्यादा त्रस्त हैं। किसानों का अंसतोष बढ़ता जा रहा है। बेरोजगारी का आलम क्या है, इसका अंदाज सेना में भर्ती के समय उमड़ी युवाओं की भीड़ से लगाया जा सकता है। कुछ अरसे पहले रेल विभाग के निचले स्तर के पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे, जिसके लिए 2.5 करोड़ आवेदन आए जिनमें भारी संख्या में इंजीनियर, एमबीए और कॉमर्स स्नातक थे।

पिछले साल सितंबर से विकास दर 8.2 फीसदी से फिसलकर इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 5 फीसदी तक आ चुकी है और इसके अभी और कम होने की आशंका गहरा रही है। पर यह विकास दर असंगठित क्षेत्र और उसके कामगारों की बदतर होती स्थिति को बताने में नाकाम है। वैसे भी मौजूदा जीडीपी की गणना की नई प्रक्रिया विवादों में आ चुकी है।

विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि जीडीपी के सरकारी दावों की दिक्कत यह है कि इसमें असंगठित क्षेत्र का कोई सीधा आंकड़ा शामिल नहीं किया जाता है। तिमाही जीडीपी विकास दर मूलतः कॉरपोरेट और कृषि क्षेत्र के आंकड़ों पर आधारित होती है। उन्होंने पिछले सितंबर महीने में जारी एक सरकारी विज्ञप्ति के हवाले से बताया कि पिछले साल पहली तिमाही की विकास दर के आंकड़े बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज/नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों के वित्तीय परिणामों और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक पर आधारित हैं। इसमें पूरे संगठित क्षेत्र के आंकड़ों का भी इस्तेमाल नहीं हुआ है और असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों का गणना में इस्तेमाल होने का सवाल ही नहीं उठता है, क्योंकि सरकार के पास इसके कोई आधिकारिक आंकड़े ही नहीं हैं।

मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम भी जीडीपी गणना के तरीकों पर आशंकाएं जाहिर कर चुके हैं। अर्थव्यवस्था के अनेक लक्षणों और आंकड़ों के मद्देनजर प्रोफेसर अरुण कुमार ने अपने ताजा आकलन में कहा कि जो लोग 5 फीसदी जीडीपी विकास दर की बात कर रहे हैं, वे गलत हैं। यदि जीडीपी गणना में असंगठित क्षेत्र को शामिल कर लिया जाए, तो विकास दर 0-1 फीसदी पर आ चुकी है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे मंदी कहा जाता है। यह मान लेना कि जिस गति से संगठित क्षेत्र बढ़ रहा है, वैसे ही असंगठित क्षेत्र बढ़ रहा है, गलत है। असंगठित क्षेत्र की इकाइयों के बंद होने की खबरें लगातार बढ़ रही हैं। मसलन आगरा के जूता उद्योग या लुधियाना के साइकिल उद्योग को लिया जा सकता है।

प्रोफेसर अरुण कुमार के तर्कों में दम है, क्योंकि गिरते निवेश, कर्जों की कमजोर मांग, गिरती बिजली की मांग और खपत इसकी तस्दीक करते हैं। प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि मांग में लगातार गिरावट का सिलसिला नोटबंदी से शुरू हुआ फिर जीएसटी, फिर बढ़ते-डूबते कर्ज और उसके बाद एनबीएफसी (गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं) के संकट से बढ़ता ही गया। निवेश दर कम हो रही है और चार करोड़ लोग रोजगार से हाथ धो बैठे हैं। यह दुर्भाग्य ही है कि पिछले कई महीनों से जो भी आंकड़े आ रहे हैं, उनमें गिरने की अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा चल रही है।

पहले कोर इंडस्ट्रीज आंकड़ा आया। इसमें 5.2 फीसदी गिरावट दर्ज हुई, जो पिछले 14 सालों का सबसे खराब प्रदर्शन है। इसके बाद आईआईपी (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक) का आंकड़ा आया जिसमें 4.3 फीसदी की गिरावट आई जो पिछले 8 सालों में सबसे कम है। कुछ दिनों पहले ही एनएसओ के उपभोक्ता खर्च सर्वेक्षण के आधिकारिक आंकड़े एक अखबार ने छापे, जिसके अनुसार भारतीयों की हर महीने खर्च करने की क्षमता में औसतन 3.7 फीसदी की गिरावट आई है, वहीं ग्रामीण भारत में यह गिरावट 8.8 फीसदी है जो असंगठित क्षेत्र का हिस्सा है।

लेकिन अब मोदी सरकार नेइस रिपोर्ट को सार्वजनिक होने से रोक दिया है, लेकिन इससे हकीकत नहीं बदल सकती। पिछले तीन महीनों से बिजली की मांग में लगातार गिरावट आ रही है जबकि इन महीनों यानी अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में हमेशा बिजली की मांग बढ़ती है। यह कारोबारी खपत कम होने का सीधा नतीजा है। औद्योगिक माने जाने वाले राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में बिजली की मांग में आई गिरावट ज्यादा तीखी है, जिसका साफ संकेत है कि यहां बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां बंद हुई हैं।

मौजूदा आर्थिक संकट विशेषकर असंगठित क्षेत्र की बढ़ती बदहाली मोदी सरकार के आर्थिक निर्णयों और नीतियों का नतीजा है जो छोटे उद्योगों और व्यापार की कीमत पर कॉरपोरेट विकास के लिए दंडवत है। इससे देश में असंगठित क्षेत्र के कामगारों का रोजगार और आय के प्रति भरोसा गहरे से हिल गया है और उन्होंने खर्च करने से हाथ खींच लिया है और यह मांग और खपत में आई कमी का सबसे बड़ा कारण है। इस क्षेत्र को तत्काल राहत और नकद सहायता की जरूरत है। पर सरकार ने 1.45 लाख करोड़ रुपये की कर-सहायता दी है कॉरपोरेट जगत को जिससे मोदी सरकार की प्राथमिकताओं को समझा जा सकता है। पर यह तय है कि अगर असंगठित क्षेत्र की माली हालत नहीं सुधरती है, तो मोदी सरकार का 8-10 फीसदी विकास दर का सपना धरा का धरा रह जाएगा।

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