मृणाल पाण्डे का लेख: लोकतंत्र साल 2021 के अंत तक

दु:ख इस बात का नहीं कि इस साल का अंत भारत की लोकतंत्र को कुछ और नगदीविहीन, असहाय और कमजोर छोड़े जा रहा है। दु:ख इस बात का भी है कि भारत ही नहीं, सारी दुनिया में उदारवादी सेकुलर और समावेशी लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को बेदर्दी से तोड़ा जाने लगा है।

फोटो: नवजीवन
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मृणाल पाण्डे

कोविड की दूसरी लहर से क्षत-विक्षत हाल में शुरू हुआ गहरी सियासी और सामाजिक हलचलों से भरा साल 2021 मिला- जुला स्वाद छोड़ कर विदा ले रहा है। एक तरफ, सालभर से ज्यादा समय से धरने पर बैठे किसानों की फतह की खुशी है, तो वहीं महंगाई-बेरोजगारी के बढ़ने और ओमिक्रॉन की आहटों से आशंकाएं भी। दु:ख इस बात का नहीं कि इस साल का अंत भारत की लोकतंत्र को कुछ और नगदीविहीन, असहाय और कमजोर छोड़ जा रहा है। दु:ख इस बात का भी है कि भारत ही नहीं, सारी दुनिया में उदारवादी सेकुलर और समावेशी लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को बेदर्दी से तोड़ा जाने लगा है। सबसे ताकतवर दो देशों- अमेरिका और चीन में नया शीत युद्ध छिड़ रहा है। दिग्भ्रांत और एशियाई अफ्रीकी मूल के शरणार्थियों की उमड़ती भीड़ से भौंचक यूरोप में नस्लवादी और धुर दक्षिणपंथी विचारधारा सर उठा रही है। और एशिया में अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी से तालिबान फिर पर पुर्जे निकालने लगा है। उधर, यूक्रेन पर काफी समय से नजर गड़ाए रूस का रुख काफी हमलावर बन रहा है। ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच बड़ी टकराहट का डर भी बढ़ रहा है।

अकल्पनीय पैमाने पर जन-टीकाकरण से भारत सहित दुनिया में कोविड का डर तो एक हद तक मिटा लेकिन उसके नए-नए अवतार विश्व में यहां-वहां सर उठाते जा रहे हैं। अमेरिका की माली हालत सुधरते-सुधरते भी ट्रंप के पोसे धुर दक्षिणपंथी स्वास्थ्य कल्याण और टीकाकरण की बाइडने सरकार की मुहिम में नित्य नए अड़ंगे लगाने से बाज़ नहीं आ रहे। दक्षिणपंथी नस्लवादी सोच का साया यूरोप पर भी कम नहीं है। हर कहीं माल का उत्पादन शुरू हुआ और शेयर बाजारों में हरे अंकुर निकलने शुरू हुए। लेकिन धन का प्रवाह और उपभोक्ता तक माल लाने ले जाने की चेन इसी सब गड़बड़झाले के कारण अब तक जुड़ नहीं सकी है। और इस बीच पर्यावरण क्षरण रातों-रात तूफान, अतिवृष्टि, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोटों और भूस्खलन से शहर-के- शहर, गांव-के-गांव उजाड़ रहा है। व्यक्तिश: यह लेखिका विस्मित है कि इस बरस खुद हमारे मुल्क में अभिव्यक्ति की आजादी, मीडिया की कार्यप्रणाली पर राजकीय गलियारों से किस तरह के हमले हो रहे हैं और होने दिए जा रहे हैं? लोकतंत्र की मशाल के सही वाहक हम बड़बोले मीडियावालों से कहीं अधिक वे अर्धसाक्षर किसान रहे जिन्होंने अपने धंधे में पलीता लगाने वालों के खिलाफ लामबंद होकर उनको नए कृषि काननू वापस लेने को मजबूर कर दिया।


यह सुनकर अच्छा लगा था कि सरकार जनजीवन में सुशासन को ही प्राथमिकता देगी, सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम रहेगा (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट)। पर 2021 उस दावे को खोपड़ी के बल खड़ा करता है। वाजिब कर चुकाने और बैंक को अपना सारा गाहक प्रोफाइल (केवाईसी की मार्फत) देने के बाद भी हम बैंक में जमा अपनी कमाई से कितना कैश कब-कब निकालें, किस तरह निकालें, जहां तक संभव हो सिर्फ डिजिटल खरीदारी करें, इस सब की बाबत सरकार नागरिकों को अचानक नित नए आदेश देती है। राज्य स्तर पर यह हाल है कि अचानक आदेश आ जाता है कि राज्य में नॉन वेज खाना खुली सड़कों पर नहीं बेचा जा सकता, उससे शाकाहारियों को तकलीफ होती है। अमुक कार्टूनिस्ट या कॉमेडियन मजाकिया लहजे में देशद्रोह फैला रहा है, उसको थाने लाया जाए। महामारी के फैलाव पर रोक लगाने के बहाने समुदाय विशेष को खुले में प्रार्थना करने से रोका जा रहा है, तो दूसरे समुदाय के प्रार्थनाघरों के भीतर घुस कर ललकारते हुए जुनूनी जत्थे उन पर बिना सबूत धर्म परिवर्तन करवाने का लांछन लगाते हुए सरे आम तोड़फोड़ कर रहे हैं। नागरिक जीवन में सरकार की मौजूदगी को कम करने की बजाय उसको अगर राजकीय हुक्मनामों पर इस हद तक निर्भर बना दिया जाए, तो राज्य के संस्थागत ढांचे पर अचानक बेपनाह बोझ पड़ेगा, पड़ रहा है।

पर जब कार्रवाई देखें तो अधिकतर मामलों में विशेष जांच एजेंसियां, खुफिया दस्ते, और कर वसूलीवाले दस्ते सघन काननूी पड़ताल तले दयनीय नजर आते हैं। मीडिया पर प्रोफेशनल चैनलों, पोर्टलों की मार्फत खबरें साझी करने के काननू सख्ततर बनाए गए, कमेटियों का गठन कर सारे डिजिटल खबरिया मंचों पर नकेल कसी गई, फिर भी आधी रात गए प्रधानमंत्री का निजी ई-मेल अकाउंट हैक होकर खुराफाती तत्व उसकी मार्फत विवादित ई-मुद्रा बिटकॉइन्स को सरकारी छूट दिए जाने की अनाप-शनाप जानकारी भेज देते हैं। पड़ताल हुई तो डिजिटल मंच की कर्ताधर्ता अमेरिकी कंपनी बताती है कि हैकिंग उसकी तरफ से नहीं हुई। तो क्या यह प्रधानमंत्री दफ्तर के भीतर छुपे किसी खुराफाती तत्व ने की? सवाल बहुत संगीन है। और नेट सुरक्षा के सरकारी चौकीदारों को कटघरे में खड़ा करता है।


दिल्ली से बाहर हालत यह कि देश के सबसे बड़े उपक्रमियों में से एक के घर के आगे विस्फोटक भरी गाड़ी बरामद होती है। शक की सुई पुलिस के एक विवादास्पद अफसर पर जाती है, तो वह गायब हो जाता है। दूसरे राज्य के बड़े बंदरगाह पर कई करोड़ की नशे की दवाएं बरामद होती हैं, पता नहीं चल पाता कि उनको किसके लिए लाया गया। पकड़ा जाता है अन्य राज्य में बॉलीवुड सितारे का बच्चा जिसके पास कोई नशीली दवा नहीं निकलती और महीने भर की जलालत के बाद अदालत जांच की ढिलाई और खुफिया विभाग की अक्षमता की कड़ी निंदा के बाद उसे बरी कर देती है।

कोविड के कारण स्कूल लंबे समय तक बंद रहे जिसका दोषी कोई नहीं। लेकिन अब सर्वे बता रहे हैं कि जब पढ़ाई ऑनलाइन हुई तो गरीब घरों के बच्चों, खासकर भारी तादाद में बेटियों की पढ़ाई अधूरी छूट गई। संसद को पूछने पर सूचना मिलती है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम के लिए आवंटित राशि का करीब 80 फीसदी हिस्सा सरकार ने पब्लिसिटी में खर्च किया है। प्याज के छिलकों की तरह हर घटनाक्रम में तमाम उलझाने वाले स्तर हैं। किसान बिलों के अलावा संसद में किसी विकास कार्य योजना के मसौदे पर गंभीर बहस न होना, इस बाबत आवाज उठाने वाले बारह विपक्षी सांसदों का सारे शीतसत्र के लिए निलंबन, न्याय व्यवस्था के पूर्व मुखिया और राज्यसभा के सांसद का कहना कि वह मनमर्जी मुताबिक ही सदन में जाते हैं। उत्तर प्रदेश में लोकदल का सपा से गठजोड़ और राज्य सरकार द्वारा विकास कार्यों की ताबड़तोड़ घोषणाएं हुईं। फिर, जेवर एयरपोर्ट और काशी गलियारे का सरकारी खर्चे पर तामझाम भरे प्रचार के साथ उद्घाटन किया गया जिसमें दिए गए भाषणों में उत्तर प्रदेश सरकार के पुनर्निर्वाचन पर जोर साफ झलकता था। माना कि सत्ता के मन में कृषक हितों को लेकर घनीभूत पीड़ा है। पर फिर साल से अधिक समय तक किसान धरने पर प्रहारों का असल ज़िम्मेवार जनता किसे माने? गौरतलब यह भी है कि इस बात पर अब तक कहीं बहस नहीं है कि कोविड से हुई मौतों, किसानों की आत्महत्या या सरकार के घोषित- स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, उज्ज्वला योजना, स्मार्ट सिटी या मेक इन इंडिया-जैसे जनहितकारी कार्यक्रमों का कोई सिलसिलेवार वैज्ञानिक आकलन अब तक सामने कब आएगा?

हम मान भी लें कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए सरकारी निगरानी तंत्र के हाथ मज़बूत करना जनहित में जरूरी था लेकिन सवाल है कि क्या सरकार की आंख-कान बने पुलिस, जांच एजंसियों, दंडाधिकारियों और न्यायपालिका के तंत्र में वाजिब सुधार किए गए? कोविड काल में यह उजागर हुआ कि ई-कामर्स और ऑनलाइन पढ़ाई के इतने लोकल-वोकल प्रचार के बाद भी हमारा सारा इंटरनेट तंत्र लगभग पूरी तरह अमीरों, संपन्न शहरी मध्यवर्ग तक सीमित है। साथ ही वह कुछ अपवाद छोड़ कर कमजोर तकनीकी के बल पर खड़ा किया गया है। लिहाजा ब्रॉडबैंड उपलब्धि तथा सर्वरों की हालत देश में अब भी एकसमान नहीं है। न ही महिलाओं की नेट तक पहुंच पुरुषों के समकक्ष बन सकी है। हमारे साइबर निगरानी काननू अर्धविकसित और गाहकों तथा सर्विस एजेंसियों के लिए नित नई अड़चनें पैदा करने वाले हैं। ई-बैंकिंग व्यवस्था को भी ग्रामीण गाहकों की सुविधा के अनुसार ठीक से ऑनलाइन होना है ताकि डिजिटल प्रणाली के लेन-देन तथा साइबर स्पेस की चोरियों तथा हैकर्स से धन की सुरक्षा की वहां भी समझ बने जहां अधिकतर गरीब खातेदार अंगूठा छाप हैं।

देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव सर पर हैं और वे अधिक से अधिक लोकतांत्रिक पारदर्शी और समावेशी हों, यह तय करने की बजाय चुनाव इस बार लाल या भगवा में से कौन जीतेगा? जात-पांत और धार्मिक पहचान के सवाल मूंछ के सवाल बने हुए हैं। नेताओं के बीच कोई फर्क है तो यही कि किसके हाथ में सत्ता का लीवर है। जिसकी सत्ता उसका सरकारी अमला और जुमला। कोई महापुरुष आज इस बिंदु पर चौरीचौरा के बाद के गांधी की तरह तकलीफदेह तरीके से सत्य के साथ प्रयोग करते हए हार का खतरा उठाएगा और अपनी असंयमी हिंसा पर उतारू अक्षौहिणी को शिविर में वापस भेज देगा, यह विचार असंभव लगता है।

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