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मृणाल पाण्डे का लेख: लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो

जब से हमारा लोकतंत्र चुनावी राजनीति के हाथों गिरवी रखा गया है, संसद के भाषणों का स्तर इधर लगातार गिरता गया है। इस समय जबकि ब्राजील के बराबर आकार का उत्तर प्रदेश जैसा राज्य विधानसभा चुनावों की कगार पर है, भाषणों में जमीनी मुद्दे लोप होते गए हैं।

फोटो: नवजीवन
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मृणाल पाण्डे

पिछले दिनों लोकसभा के भाषणों ने मार्च, 2020 की कोरोना काल की तालाबंदी के भीषण वक्त को फिर जिला दिया। लाखों बेघर प्रवासियों की भीड़ का अचानक भूखा-प्यासा सड़कों पर उतर कर कुछ न मिला, तो पैदल ही घर जाने के लिए दोषियों का हम और आप में बंटवारा होते देखा। कवि धूमिल की कुछ इस आशय की पंक्तियां मन में कौंध गईं कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है...।

इंद्रप्रस्थ की रीत रही है कि राजकीय सभाओं में जब अन्याय का प्रसंग उठने पर बड़े खेले-खाए ताकतवर सत्ताधीश, उनके मुसाहब, सिपहसालार, मनसबदार सब खामोश रहते हैं, तो कोई वेदव्यास, कोई धूमिल, कोई नागार्जुन सच के घड़े पर रखा सोने का ढक्कन हटा देता है। इधर, उपरोक्त त्रासदी पर दो मार्मिक उपन्यासों को पढ़ा, तो लगा कुछ युवा साहित्यकार अपना सदियों पुराना दाय आज भी निभा रहे हैं। संसदीय डिबेटों के उलट साहित्य हमको घटनाओं के केन्द्र में फंसे यंत्रणा झेल रहे लोगों के सामने ले जा कर खड़ा करता है। ये दोनों उपन्यास आनेवाली पीढ़ियों के लिए यही कर रहे हैं। ईमानदारी से लेखक किस्सा-दर-किस्सा, परिवार-दर-परिवार उस त्रासदी की मानवीय सचाई लोहार की बजाय उन बदहवास भागने को मजबूर घोड़ों की मार्फत उकेरते हैं जिनके लिए सरकार नाम की कोई चीज नहीं बच रही थी। बस फिचकुर और खून भरे मुंहों में लोहे का कठोर स्वाद बचा था।

उपन्यास ‘अमर देसवा’ के लेखक प्रवीण कुमार अपना उपन्यास, ‘महामारी में मारे गए पर आंकड़ों में बेदर्ज बेबस नागरिकों को, गंगा में तैरती गुमनाम लाशों को जिनके पुरखों ने कभी आजादी वाली रात तिरंगा थामे... जश्न मनाया था..., शहीद अग्रणी रक्षा दल के योद्धाओं को, तमाम सफाईकर्मियों को मसान और कब्रिस्तान में दिन-रात खटनेवाले उन लोगों को जिनकी सुध महामारी में किसी को न थी,’ समर्पित करते हुए चौंका ने वाले ढंग से यह जोड़ते हैं कि इस कथा में वर्णित चरित्र और घटनाएं काल्पनिक नहीं हैं। युवा कथाकार देवेश का एक ताजा लघु उपन्यास ‘पद्दुन कथा’ गांव-जवार की भोगी कोविड काल की सचाइयों से परदा हटाता है। ‘...लोग मानते हैं कि अगर कस कर पुरवा डोल देगा तौ करोना-फरोना उनके ...दक्खिन में चला जाएगा। इसलिए गांववाले ...कोई विशेष लोड नहीं ले रहे। जिनके परिवार का कोई दिल्ली, मुंबई में रहता है बस वे ...डर रहे हैं। ...जबकि क्रूर सच यह है कि कोरोना से गांव में मौतें बहुत हो ने लगी हैं। ...स्थिति विस्फोटक है लेकिन गांववाले इसे कोरोना नहीं, विधि का विधान मान रहे हैं।’


जब से हमारा लोकतंत्र चुनावी राजनीति के हाथों गिरवी रखा गया है, संसद के भाषणों का स्तर इधर लगातार गिरता गया है। और इस समय जबकि ब्राजील के बराबर आकार का उत्तरप्रदेश जैसा राज्य विधानसभा चुनावों की कगार पर है, भाषणों में जमीनी मुद्दे लोप होते गए हैं, और तू-तड़ाक पर ही तमाम तरह के हिसाब-किताब निपटाए जाने लगे हैं। और धृतराष्ट्र की प्रजा की ही तरह गंवई गांव की जनता साफ देख रही है कि जब सबने शासक की देखादेखी काला चश्मा लगा लिया हो, तो दृश्य जगत के बारे में उनमें आखिर कितना मतभेद हो सकता है? डर लगता है कि जब बाहरी दुनिया में लगातार भारी नए सत्ता समीकरण बन- बिगड़ रहे हैं, घर भीतर मंदी और मुद्रास्फीति का दौर है, कोविड की पूरी विदाई नहीं हुई है, उस समय संसद का यह सत्र भी इसी तरह की बहसबाजी में गणतंत्र की मूल बीमारी की सही पहचान के बगैर न बीत जाए।

पिछले सात सालों के बारे में बहुत दावे किए जा रहे हैं, पर कोरोना काल ने हर भारतीय के सामने यह बात उजागर कर दी है कि अभी भी नई तकलीफों, चुनौतियों का सामना तर्क और व्यवस्थित तरीके से संकलित डाटा से नहीं किया जा रहा। केन्द्र सरकार हाथ झाड़ कर कहती है कि डाटा-फाटा उसके पास नहीं है। यह राज्य-दर-राज्य जमा करना राज्य सरकारों का दाय था। फिर अचानक तोपों का मुंह उन राज्यों की तरफ मोड़ दिया जाता है जहां विपक्षी दलों की सरकारें सत्तासीन हैं। कोविड काल की नामुराद तालाबंदी जिसने रातों रात लाखों संसाधनहीन प्रवासी कामगरों को बिना अन्नपानी, बिना सर के लिए छतों का इंतजाम किए विस्थापित कर दिया, केन्द्र ने घोषित की थी। लेकिन दोष अब महाराष्ट्र तथा दिल्ली को दिया जा रहा है कि उसने भूख और बेरोजगारी के चंगुल में अचानक जा फंसे लाखों प्रवासी मजदूरों को वापिस भेजने का गुपचुप प्रबंध करके महामारी को देश भर में फैलाने का महापाप किया है। एनडीए शासित उत्तराखंड में डॉक्टरी चेतावनियों के बावजूद जिस तरह अर्धकुंभ का महाआयोजन कर वहां लाखों पर्यटकों को देश भर से बुलवाया गया और जिस तरह उत्तर प्रदेश में महामारी पर तीखी रपटें लिखनेवाले मीडियाकर्मियों की खबर ली गई, वह किसी गिनती में नहीं आता दिखा। शायद ऐसे सीमित हमलों के पीछे यह भरोसा है कि इस देश में अधिसंख्य गरीब मतदाता आज भी तर्क नहीं, धार्मिक रूढ़ियों और अंधविश्वास के अधिक गाहक हैं। लिहाजा बीमारी बढ़ने पर ओझागिरी के फार्माकोपिया को उलट-पलट कर मंत्र-भभूत, ताबीजों के बल पर इलाज करना, ध्यान बंटाने को भव्य विशाल मूर्तियों को सारे तामझाम और रूढ़ियों के पालन के साथ यहां-वहां बिठाना चिकित्सकों के लिए फायदेमंद साबित होगा। जब तक यह सोच कायम है, किसी नए चिकित्साशास्त्र या डाटा की उम्मीद करने वाले या तो नितांत मूर्ख या फिर नास्तिक सिरफिरे देशभंजक गिरोहों से मिलीभगत रखने वाले ही बताए जाते रहेंगे।


यह इक्कीसवीं सदी का बाईसवां साल है। घर भीतर कोरोना काल की मंदी और गायब हो चुकी नौकरियों के संकट से निबटने की कोई ठोस सरकारी योजना ताजा बजट में नहीं दिखी। घर-बाहर एशिया और योरोप में ताकतों का नया ध्रुवीकरण होना शुरू हो चुका है। चीन, रूस और पाकिस्तान की धुरी क्रमश: आकार ले रही है। नाटो के पुराने योरोपीय सदस्य भी अमेरिका की दोस्ती बनाम तरह-तरह के आयातों की मिल्कियतवाली इस नई तिकड़ी से भले रिश्ते बनाने को लेकर, ‘शिवा को सराहों कि सराहौं छत्रसाल को’, की दुविधा में फंसे हुए हैं। कांग्रेस का साफ पूछना कतई वाजिब है कि भारत दोनों मोर्चों पर आखिर मंदिर मूर्ति निर्माण और बहुसंख्यक राग गाने से इतर क्या कर रहा है? चुनौती से मुंह मोड़कर भगवद् भजन करना, हजार बरस पुराने संतों के नाम पर छापा-तिलक लगाकर रथ यात्राएं निकालना इन नए हमलों की चुनौती का कैसा जवाब है?

कौवे की तरह परमुखापेक्षी, गतिहीन, जातियों में बंटा हुआ हमारा राज-समाज क्या सचमुच भागते हुए गिरने को तैयार घोड़े की टापें नहीं सुनना चाहता? क्या उसे लोहार के हथौड़े पर इतना भरोसा है कि विचारविहीनता की दुलाई ओढ़े हुए वह चुनाव-दर-चुनाव बंटती खैरातों की प्रतीक्षा करता रहेगा? मध्ययुग में यहूदी दार्शनिक इस बात पर बहस करते थे कि सुई की नोंक पर कितने फरिश्ते खड़े हो सकते हैं। हम जो कबीर और नानक और तुलसी को एक ही काल का बाशिंदा बताने की सार्वजनिक भूल कर चुके हैं, अब हजार साल पीछे के भारत से शंकर के अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्तवाद मध्वाचार्य के द्वैतवाद की बहसों का दर्शन एक गिनीज बुक का रिकॉर्ड बनाने वाली मूरत में तब्दील कर गणतंत्र की छाती पर केन्द्रीय निगरानी और दोहनवाली सामंती व्यवस्था को बिठा रहे हैं। यह करना अंतत: एक नकली और बेमतलब गणतंत्र बनाएगा जिसमें गुण या सुविचारित तरीके से सत्तर सालों में बनाया गया, उसे चलाने वाला तंत्र शामिल ही नहीं होगा। ऐसा गणतंत्र दरअसल गणतंत्र के चोले में मध्ययुगीन फूटपरस्त सामंतवाद की सबसे अंधेरी ताकतों का मित्र है। यकीन न आए तो संसदीय भाषण नहीं, साहित्य को पढ़िए। “लड़ना भी एक धर्म है। ...यह जानते हुए भी कि परिणाम अनिश्चित है, तो भी लड़ाई जारी रखनी होगी। जब लड़ ही नहीं पाए, तो सम्मान क्या खोजना? जब सम्मान ही नहीं, तो जीना ही कैसा? खामोशी से मर जाने का भी कोई मतलब है क्या?”-(अमर देसवा)

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