खरी-खरीः जज़्बाती धार्मिक नारे लगा कर उकसाने वाले धर्म गुरुओं के बहकावे में न आएं मुसलमान

जब भी अल्लाह-ओ-अकबर जैसे नारों के साथ मुस्लिम पक्ष कोई राजनीतिक पहल करेगा, तब बीजेपी और संघ को हिंदू विपक्ष खड़ा करने में जरा भी समय नहीं लगेगा। जैसे 2002 में गुजरात और 1992 में अयोध्या प्रकारण में हुआ था। और फिर इस मुस्लिम क्रिया की हिंदू प्रतिक्रिया होगी।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है। अगर यह कहें कि देश आर्थिक संकट के कगार पर है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इस चिंताजनक स्थिति के संकेत बहुत साफ हैं। सरकार का पहला बजट आमतौर पर उत्साहजनक होता है। लेकिन निर्मला सीतारमण का दुर्भाग्य कहिए कि उनके पहले बजट का बाजार पर यह प्रभाव पड़ा कि शेयर बाजार में हाहाकार मच गया। बाजार में तुरंत हजारों करोड़ के वारे-न्यारे हो गए।

फिर पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने से हर चीज के भाव पर असर पड़ा। उधर ‘वेल्थटैक्स’ वृद्धि से कॉरपोरेट जगत के माथे पर लकीरें खींच गई। किसान और बेरोजगारों की आशाओं का भी कोई ऐसा निवारण नहीं नजर आया। लब्बोलुआब यह है कि सीतारमण वित्त मंत्री के तौर पर खोटा सिक्का दिखने लगीं। बेचारी सीतारमण! वह करतीं भी तो करतीं क्या! पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार खजाना लुटा चुकी थी।

उससे भी चिंताजनक बात यह है कि प्रधानमंत्री सहित सरकार के किसी अंग को अर्थव्यवस्था की चिंता न तो पहले थी और न ही अब दिखाई देती है। जबकि चिंता सबसे अधिक नेता को ही होनी चाहिए। क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था बिगड़ी तो समझिए फिर राजनीति भी बिगड़ी और राजनीति बिगड़ी तो चुनाव बिगड़े। पर न तो मोदी जी चिंतित हैं और न ही किसी और सरकारी तंत्र को अर्थव्यवस्था की फिक्र दिखाई पड़ रही है। पता नहीं कौन सा मंत्र है जिस कारण मोदी समेत बीजेपी और संघ परिवार हर प्रकार की चिंता से मुक्त है।

हकीकत यह है कि नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा मंत्र ढूंढ़ लिया है जिसके पश्चात चिंता की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। यूं तो वह राजनीतिक मंत्र सदियों पुराना है और भारत में अंग्रेजों ने उसी मंत्र की मदद से डेढ़ सौ साल तक राज किया। केवल अंग्रेज ही नहीं इतिहास में संपूर्ण संसार में ऐसी बहुत सी मिसालें मिल जाएंगी कि जब इसी मंत्र के इस्तेमाल से शासक वर्ग ने बिना किसी चिंता के राजपाट चलाया।

भले ही जनता चिंतित हो, पर इस मंत्र के उपयोग से शासक चिंता से मुक्त रहता है। इतिहासकार इस मंत्र को ‘बांटो और राज करो’ (डिवाइड एंड रूल) की संज्ञा देते हैं। कभी इस मंत्र के इस्तेमाल में अंग्रेज माहिर थे, परंतु अब नरेंद्र मोदी इस मंत्र के गुरु हैं। आखिर इस मंत्र में ऐसी क्या विशेष बात है कि लगातार संकट और चिंताएं झेल कर भी जनता नेता की आभारी रहती है और मोदी-मोदी का जाप करती रहती है।

‘बांटो और राज करो’ मंत्र का मूल सूत्र ‘धर्म’ होता है। धर्म किसी समाज को जोड़ने का काम करता है। परंतु इस मंत्र में दो धर्मों का उपयोग होता है। अर्थात् दो धार्मिक समूहों को आपस में लड़वाकर शासक मस्ती से अपना राजपाट चलाता रहता है। मोदी जी इस मंत्र के इस्तेमाल में माहिर हैं। साल 2002 में गोधरा में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने गोधरा स्टेशन पर एक रेलगाड़ी का डिब्बा बंद करके लगभग 59 कारसेवकों को जलाकर मार डाला था। बस उसके दूसरे रोज पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे। पता नहीं दंगे भड़क उठे या दंगे करवाए गए। यह अभी तक एक रहस्य है। लेकिन उन दंगों में संघ परिवार से जुड़े लोगों का नाम मुख्य रूप से सामने आया। मोदी जी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

बस गुजरात के 2002 के दंगों की आग से मोदी जी को ‘बांटो और राज करो’ मंत्र का तंत्र मिल गया। वह कैसे! दंगे तो होते ही अमूमन दो धार्मिक समूहों के बीच हैं। ये दो समूह गुजरात में हिंदू और मुसलमान थे। यूं भी अंग्रेजों के समय भी इन दोनों धार्मिक समूहों के बीच दंगे होते रहे हैं। इन दो धार्मिक समूहों में आपस में शंकाएं चली आ रही हैं। जरा सा आपसी तनाव होते ही भारत में हिंदू-मुस्लिम मनमुटाव हो जाता है। ‘बांटो और राज करो’ मंत्र का खिलाड़ी किसी एक समूह का संकटमोचन बनकर उस धार्मिक समूह का ‘अंगरक्षक’ बन जाता है।

गोधरा में कथित तौर पर मुस्लिम समूह ने ट्रेन जलाकर हिंदुओं को क्षति पहुंचाई थी, अतः गुजरात में हिंदुओं के मन में मुसलमानों से असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो गई। तीन दिन तक गुजरात में मुसलमानों की मारकाट होती रही, उनके घर-बार जलाए गए, उनकी महिलाओं से बलात्कार हुआ और मोदी सरकार चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। तीन दिन बाद मोदी जी निकले और उन्होंने हिंदुओं के पक्ष में भाषण देना शुरू कर दिया। दंगों के घृणामय माहौल में मोदी हिंदू संकटमोचन के रूप में उभरे और देखते-देखते वह केवल गुजरात ही नहीं, 2014 में सारे देश के हिंदू हृदय सम्राट बन गए। बस इस प्रकार मोदी जी को ‘बांटो और राज करो’ मंत्र की महारत हासिल हो गई।

परंतु गुजरात में हुआ क्या था! गोधरा में पहल मुसलमानों ने की थी। फिर हिंदू दंगाइयों ने उनको ‘ठीक सबक दिया’ और मोदी पुलिस ने हिंदू बलवाइयों को संपूर्ण संरक्षण दिया। अर्थात् इस मंत्र के उपयोग में किसी प्रकार पहल मुस्लिम पक्ष से होनी आवश्यक है। फिर जवाब में हिंदू पक्ष अपने हिसाब से मुसलमानों को ‘ठीक’ करता है और इसका श्रेय संकटमोचन लेता है।

ऐसा ही एक खेल भारत में 1992 में बाबरी मस्जिद और राम-मंदिर टक्कर के समय हुआ था। साल 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुला। तुरंत मुस्लिम पक्ष से एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बन गई। इस कमेटी ने पहले खालिस मुस्लिम मजमा इकट्ठाकर सारे उत्तर प्रदेश में नारा-ए-तकबीर- अल्लाह-ओ-अकबर जैसे नारों के साथ ‘बाबरी मस्जिद बचाओ’ रैलियां कीं। जब काफी दिनों तक मुस्लिम पक्ष की ओर से यह धार्मिक रंग की पहल चलती रही, तो विश्व हिंदू परिषद इस ऐलान के साथ कि ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ खड़ा हुआ। और उसका नारा था ‘जय श्रीराम’, जो जल्दी ही अल्लाह-ओ-अकबर का जवाब बन गया।

इन हिंदू-मुस्लिम रैलियों की तकरार में उस समय आडवाणी जी 1992 में रथयात्रा पर निकले और हिंदू संकटमोचन बन गए। लेकिन दो समुदाय की तकरार में हुआ क्या? हिंदू-मुस्लिम आपस में बंट गए। मुसलमानों की पहल और अल्लाह-ओ-अकबर जैसे नारों के जवाब में बीजेपी के ध्वज के नीचे एक हिंदू विपक्ष बन गया। अंततः बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और हजारों मुसलमान मारे गए।

याद रखिए, जब भी किसी मुस्लिम बैनर और अल्लाह-ओ-अकबर जैसे नारों के साथ मुस्लिम समुदाय कोई राजनीतिक पहल करेगा, तो वैसे ही बीजेपी और संघ समूह को हिंदू विपक्ष खड़ा करने में जरा भी समय नहीं लगेगा। जैसे 2002 में गुजरात और 1992 में अयोध्या प्रकारण में हुआ था। और देखते-देखते इस मुस्लिम क्रिया की हिंदू प्रतिक्रिया होगी, जिसमें अंततः मुस्लिम पक्ष मारा जाएगा। और फिर ‘बांटो और राज करो’ तंत्र से मोदी जैसे माहिर खिलाड़ी की विजय होगी।

इसलिए मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में मुस्लिम समुदाय के पक्ष में किसी प्रकार के मुस्लिम बैनर तले अल्लाह-ओ-अकबर जैसे धार्मिक नारों के साथ जलसे-जुलूस की राजनीति नहीं हो सकती। अर्थात् इस माहौल में ‘स्ट्रीट पॉलिटिक्स’ से दूर रहना ही मुस्लिम पक्ष में है। परंतु पिछले दो-चार सप्ताह से मॉब लिंचिंग के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। मेरठ जैसे दर्जनों शहरों में इसकी हिंदू प्रतिक्रिया हो रही है। जिसका लाभ विश्व हिंदू परिषद उठा रहा है। दंगाई माहौल के बाद पकड़-धकड़ गरीब मुसलमानों की हो रही है, जिनको पूछने वाला कोई नहीं है।

लेकिन मुस्लिम पक्ष की ओर से कुछ धार्मिक गुरु ऐसा बयान दे रहे हैं कि हमको हथियार इकट्ठा करना चाहिए। एक मुस्लिम गुरु ने कहा है कि मुसलमान दंगाई स्थिति से बचें परंतु जब घिर जाएं तो दूसरों की भी जान ले लें, चाहे मर जाएं। ऐसे बयानों को टीवी के माध्यम से मुस्लिम क्रिया का रूप दिया जाएगा, जैसे अभी पुरानी दिल्ली और मेरठ में हुआ। फिर विश्व हिंदू परिषद उसके जवाब में हिंदू प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगा। जैसे दिल्ली और मेरठ में हुआ। अंततः मारा मुसलमान जाएगा। जैसा बाबरी मस्जिद-राम मंदिर और गोधरा एवं अहमदाबाद प्रकरण में हुआ।

इसलिए मुस्लिम समुदाय को यह भलीभांति याद रखना चाहिए कि उनके बीच ऐसे लोग जो जज्बाती धार्मिक नारे देकर हथियार इकट्ठा करो, सड़कों पर प्रदर्शन करो जैसी क्रिया कर रहे हैं, वे मुस्लिम पक्ष की बात नहीं कर रहे हैं। क्या पता उनको मुस्लिम विरोधी तत्वों ने हिंदू प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए खड़ा किया हो। आखिर अंग्रेज भी तो इसी प्रकार दो गुटों को पीछे से खड़ाकर दंगे करवाते थे और चैन से राज करते थे। इसलिए मुस्लिम पक्ष में अभी यही है कि वह शांति बरते और सब्र से काम लें। क्योंकि अगर अल्लाह-ओ-अकबर लगा, तो फिर जय सियाराम भी लगेगा और फिर होगा वही जो बाबरी मस्जिद प्रकरण और गुजरात में मुस्लिम समाज के साथ हुआ।

आपने एक बात गौर की होगी कि पिछले दो सप्ताह के अंदर कभी दिल्ली में स्कूटर पार्किंग को लेकर, तो कभी मॉब लिंचिंग के विरूद्ध प्रदर्शन को लेकर, तो कभी हिंदू-मुस्लिम नौजवानों की शादियों को लेकर देखते-देखते देश का सांप्रदायिक माहौल खराब हो रहा है। फिर ऐसे में उलेमा अगर हथियार इकट्ठा करने और मारने-मरने की बात करेंगे, तो माहौल और तेजी से खराब होगा। और मेरी समझ तो यह कहती है कि ‘एजेंटों’ के जरिये माहौल और खराब करवाया जाएगा।

इसका स्पष्ट कारण यह है कि देश की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। आर्थिक व्यवस्था जितनी तेजी से खराब होगी सांप्रदायिक स्थिति भी उतनी तेजी से खराब होगी। माहौल बिगाड़ने के लिए ‘हथियार इकट्ठा करो’ जैसे बयान देने वाले एजेंटों की आवश्यकता होगी, जो भड़काऊ बयान और भाषण देंगे। फिर हिंदू प्रतिक्रिया उत्पन्न की जाएगी। ऐसी दशा में नरेंद्र मोदी संकटमोचन बन तुरंत हिंदू हृदय सम्राट बन जाएंगे। और इस प्रकार ‘बांटो और राज करो’ मंत्र से बीजेपी का राजकाज चलता रहेगा। चाहे आर्थिक हालात कितने भी चिंताजनक हों। क्योंकि ‘बांटो और राज करो’ रणनीति से राजनीति तो चलती ही रहेगी। ऐसे में भला मोदीजी को किस बात की चिंता!

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