आकार पटेल का लेख: न लोकतंत्र बचा है, न नागरिक अधिकार, आखिर ऐसा कैसे बन गया भारत!

संविधान नहीं बदलता है और न ही किसी कानून को बदलने की जरूरत है। बस इतना है कि सरकार में सत्ता के दुरुपयोग को रोकने की कितनी आंतरिक क्षमता है। सैद्धांतिक रूप से, न्यायपालिका सरकार की मनमानी को रोक सकती है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया
user

आकार पटेल

अपने सभी रूपों में भारतीय शासन का अर्थ सरकार होता है, खासतौर से केंद्र सरकार, यह सरकार दरअसल एक अजीब किस्म का प्राणी है। जैसा कि नाम से ही साफ है कि इसे लोकतांत्रिक तरीके से बना होना होता है और उदारवादी होना होता है। एक उदार लोकतंत्र में सरकार को "एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रणाली के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता को आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त और संरक्षित किया जाता है, और राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कानून के शासन द्वारा सीमित होता है।"

भारतीय सरकारों के संबंध में ये बातें सत्य भी हैं और सत्य नहीं भी हैं। एक मायने में सरकार लोकतांत्रिक है क्योंकि राजनीतिक दलों द्वारा नियंत्रित किया जाता है जो निश्चित समयावधि के लिए निर्वाचित होते हैं। व्यक्तिगत अधिकार और स्वतंत्रता, सिद्धांतत: तो मौजूद हैं, हकीकत में उनका वजूद नजर नहीं आता। राजनीतिक शक्ति कानून के शासन से सीमित नहीं होती है, बल्कि इस बात से तय ही है कि सत्ता में बैठे लोग इन अधिकारों को किस हद तक देने को तैयार हैं। जब सरकार में बैठे लोग साधारण और उदार होते हैं तो वे संवैधानिक ढांचे के भीतर अपनी स्थिति और शक्ति के प्रति सचेत होते हैं। उस स्थिति में सरकार लोकतांत्रिक और उदार दोनों दिखाई देती है।

लेकिन जब सतता में बैठे लोग अधिकारवादी या अहं में डूबे होते हैं (यानी वे लोग जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कीमत पर अपने आदेश सख्ती से लागू करते हैं) जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, तो वही सरकारें अलोकतांत्रिक प्रतीत होती हैं।

कानून का राज उन्हीं सरकारों में दिखता है जगह जहां अधिकारवादी विचारधार के साथ मनमानी शक्ति का प्रयोग करने की कोई जगह नहीं होती। इस परिभाषा के हिसाब से देखें तो भारत में कानून का राज नहीं है। दरअसल शक्ति और अधिकारों का मनमाना प्रयोग किए जाने पर मामूली सी ही रोकटोक है।

संसद में जनप्रतिनिधियों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। इंडिया गेट पर धारा 144 की घोषणा करके लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन (अनुच्छेद 19 के तहत गारंटी) की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। एक पूरे गांव को स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत) से वंचित किया जा सकता है, उसकी किलेबंदी की जा सकती है ताकि कोई आ-जा न सके। लोकतांत्रिक सरकारें ऐसे काम नहीं करतीं, लेकिन भारत में ये सब हो रहा है। अब इसकी कोई हद ही नहीं रह गई है कि सरकारें कितने मनमाने अधिकार का प्रयोग कर सकती हैं।

संविधान नहीं बदलता है और न ही किसी कानून को बदलने की जरूरत है। बस इतना है कि सरकार में सत्ता के दुरुपयोग को रोकने की कितनी आंतरिक क्षमता है।

सैद्धांतिक रूप से, न्यायपालिका सरकार की मनमानी को रोक सकती है। लेकिन, भारतीय न्यायपालिका को एक मजबूत अधिकारवादी तरीकों द्वारा प्रतिबंधित किया जा सकता है, जैसा कि किसी अन्य देश में नहीं होता। न्यायाधीशों को पुरस्कार के रूप में राज्यसभा की सीटें और राज्यपाल के पद दिए जा सकते हैं। भारतीय न्यायाधीश अपने ही खिलाफ लगे आरोपों के मामले में खुद ही जज बन सकते हैं और उनके साथी न्यायाधीश इस पर कोई आपत्ति भी नहीं करते। यह न्याय के मूल सिद्धांतों में से एक का उल्लंघन है, जिसके तहत कोई भी जज अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता है। लेकिन हाल ही में भारत में ऐसा हुआ है। यह कानून के राज वाली सरकार तो बिल्कुल नहीं है।

अब ऐसी सरकार के लिए, इसके पास उससे भी मजबूत संस्थागत क्षमता होनी चाहिए जैसी कि इसके पास है। और, इसमें नागरिकों की भागीदारी पहले से अधिक होनी चाहिए। भारतवासी इस बात पर गर्वकरते हैं कि लोकतांत्रिक दुनिया में वे सबसे अधिक मतदान करने वाले लोग हैं। मसलन अमेरिका में 2016 के जिस चुनाव में डोनल्ड ट्रंप की जीत हुई थी तो वहां 55 फीसदी मतदान हुआ था। यह 2019 के आम चुनाव से 12 फीसदी कम था, जिसमें भारतीयों ने 67 फीसदी मतदान किया था। यह एक भारी अंतर है।

लेकिन अमेरिकी नागिरक, लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया से बाहर भी भाग लेते हैं। सरकारी अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल खिलाफ वे खुलकर विरोध करते हैं। हाल के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन में यह स्पष्ट दिखा जब लाखों लोगों ने अफ्रीकी अमेरिकियों के खिलाफ बल प्रयोग का विरोध किया और सरकार को कानून और नीति में बदलाव लाना पड़ा।

भारत में इस तरह के विरोध को सरकारें बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित कर देती हैं, लेकिन ऐसा भी लगता है कि अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए खड़े होने में भारतीय नागरिकों की दिलचस्पी भी कम ही है। यह विशेष रूप से उन मुद्दों पर ज्यादा चरितार्थ होता है जिनका व्यक्तिगत हित से कुछ लेना देना नहीं होता। दूसरों के लिए खड़ा होना कानून और लोकतांत्रिक सरकारों के शासन का आधार है। भारत में सरकारें शायग सही ही मानती हैं विरोध तो सिर्फ स्थानीय है और किसी एक इलाके के लोगों से ही जुड़ा है और समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा।

तो फिर इससे आगे कैसे बढ़ें कि भारत में कानून के राज वाला शासन हो (ऐसा कुछ जो संभवतः हममें से अधिकांश चाहते हैं)? इसका जवाब आसान नहीं है और यह स्पष्ट भी नहीं है। उदाहरण के लिए, यह सिर्फ एक पार्टी की हार और दूसरे का सत्ता में आना नहीं हो सकता। क्योंकि, बेहद अधिकारवादी नेताओं की कमी नहीं है और भविष्य में समस्या फिर से सामने खड़ी होगी।

दरअसल बदलाब कुछ गहरे ही होने की जरूरत है, और फिलहाल तो यह साफ नहीं है कि इस बदलाव को लाने के लिए किसी बाहरी शक्ति की जरूरत है या कोई एक घटना ऐसा कर देगी। कानून के शासन के रूप में भारत का स्वामित्व अंततः नागरिकों के पास होना चाहिए। फिलहाल ऐसा नहीं है। उम्मीद यह है कि सरकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करेगी और राजनीतिक दल सरकारों का दुरुपयोग नहीं करेंगे। आज हम जो देख रहे हैं, वह स्पष्ट प्रमाण है कि यह काफी नहीं है।

next