विष्णु नागर का व्यंग्यः भुसभरा शेर निंदा से डरता है, किसानों, छात्रों, शाहीनबाग की दादियों से खौफ में रहता है!

ये हमारा भुसभरा शेर अपना स्तुतिगान सुन बल्लियों उछलने लगता है। खिल के बिल्कुल गेंदे का फूल हो जाता है। दिन के अड़तालीस घंटे हों और कोई उसका स्तुतिगान करे तो भी ऊबेगा नहीं, लेकिन हल्की निंदा से बहुत डरता है!

सांकेतिक फोटोः Dailymail
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विष्णु नागर

यूं तो गीदड़ का बच्चा भी आलोचना-निंदा से परे होता है, इसलिए इसका बुरा-भला भी वह नहीं मानता, मगर हम यहां शेर के बच्चे की बात करें तो अधिक सम्मानजनक लगेगा। तो भई वह है तो वाकई शेर का बच्चा या शेर। आपने कभी शेर के बच्चे के सामने उसकी आलोचना-निंदा-भर्त्सना की है? नहीं की हो तो कृपया चिड़ियाघर जाकर करके देखिए। उसके सामने उसकी जितनी भी, जिन शब्दों में भी शाब्दिक पूजा-आराधना करनी हो, कर लीजिए। उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसे पता भी नहीं चलेगा कि आप कुछ कर भी रहे हैं!

चलो बच्चा तो किसी का भी, बच्चा होता है। वह बहुत सी बातें नहीं समझता, मगर वयस्क शेर का व्यवहार भी इससे भिन्न नहीं होता। वह आराम कर रहा होगा, तो वह आराम ही करता रहेगा, मांस खा रहा होगा, तो मांस ही खाता रहेगा। उस पर आपके तीखे से तीखे शब्दबाणों का कोई असर नहीं होगा। यही वजह है कि तारीफ सुनकर वह कभी फूलकर कुप्पा नहीं होता, निंदा-आलोचना सुनकर फनफनाता-भनभनाता भी नहीं। शेर ही नहीं गधे या चूहे या मच्छर में भी यही विशेषता पाई जाती है!

ये हमारा भुसभरा शेर भी कुछ ऐसा ही है, हालांकि कुछ वैसा भी है। ये शेर अपना स्तुतिगान सुन बल्लियों उछलने लगता है। खिल के बिल्कुल गेंदे का फूल हो जाता है। दिन के अड़तालीस घंटे हों और कोई उसका स्तुतिगान करे तो ऊबेगा नहीं, लेकिन निंदा से बहुत डरता  है। वैसे यह भी सच है कि कुछ मामलों में खास नहीं भी डरता। कोई देशी बंदा, कोई अनुराग कश्यप या तापसी पन्नू इसकी निंदा कर दे, तो फिर तो कुछ न होते-होते भी, बहुत कुछ  कर दिया जाता है!

इंटरनली तो यह शेर इतना डरपोक है कि टूलकिट से भी डर जाता है, जैसे टूलकिट न हो मरा, उससे बड़ा और ताकतवर शेर हो। किसानों, विद्यार्थियों, शाहीनबाग की दादियों से भी डरा-डरा सा रहता है। अंधेरे में जैसे डरपोक हनुमान चालीसा का पाठ करता है, वैसे ही इसकी दहाड़ सुनकर भी लगता है, जैसे डरपोक  हनुमान चालीसा पाठ कर रहा हो। डरपोक का दहाड़ना भी बड़ा आनंददायक होता है। उसके दहाड़ने से किसी की बनियान तक गीली नहीं होती!

विदेशी अगर उसकी आलोचना-निंदा कर दें तो उससे भी कभी-कभी वह बहुत डर जाता है। जैसे कनाडा के पीएम ने आलोचना कर दी तो पिनपिना गया। एक-दो बार और भी इसी प्रकार पिनपिनाया है। वैसे होगा वह शेर मगर उसे जनम चूंकि मनुष्य रूप में लेना पड़ गया, इसलिए निंदा-आलोचना से बहुत डरता भी है, इतना जितना कि आज तक कोई नहीं डरा था। रोज नये-नये नियम लेकर आता है। फिर भी अभिनेता कमाल का है। भक्त उसकी म्याऊं को भी  दहाड़ समझ लेते हैं!

वैसे वाशिंगटन पोस्ट हो या न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन हो या डेर श्पीगल, टाइम्स हो या ल मां, जो कहना हो कह लो, जो गाली देना हो, दे लो, वह डरता नहीं। इतना ही नहीं, कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था भी उसकी निंदा-आलोचना करे तो उससे बेपरवाह होकर बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ पर हाथ फेरता रहता है। अपनी बूढ़ी देह को दिन में छह बार कपड़ों से सजाकर भारत के आकाश को हवाई जहाज से रौंदता रहता है। बस एक एमनेस्टी इंटरनेशनल की आलोचना जरूर उसे सहन नहीं हुई, उसका बोरिया-बिस्तर यहां से बंधवा कर ही माना। बाकी से उसे अंतर नहीं पड़ता।

अभी अमेरिका की संस्था 'फ्रीडम हाउस' ने कहा, इसके राज में भारत 'आंशिक रूप से ही स्वतंत्र’ रह गया है। स्वतंत्र से आंशिक स्वतंत्र बन गया है, मगर इस शेर को इससे खास फर्क नहीं पड़ा।चेहरे पर ज्यादा शिकन नहीं आई। थोड़ी-बहुत शिकन आई भी तो उसे उसकी लंबी दाढ़ी ने ढंक लिया। वैसे भी अमेरिका का लिहाज करना पड़ता है, इसलिए भी कि ये ट्रंप वाला नहीं, बाइडेन और कमला वाला अमेरिका है। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन तो उसकी आलोचना करते ही रहते हैं। करो भई, जी भर कर लो। जब तक गोदी-मोदी चैनल जिंदाबाद हैं, तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता!

ऐसी महान हस्ती को प्रणाम करना तो बनता ही है। आप मत करो, मैं कर लेता हूं। वैसे 'देशद्रोहियों' के प्रणाम की वह परवाह भी नहीं करता। न करे, हम तो न शेर हैं, न शेर के बच्चे हैं, न गीदड़ हैं, न मक्खी हैं। हम तो भई प्रणाम करना जानते हैं, इसलिए प्रणाम करके ही मानेंगे। चाहे शेर को समझ में आए या न आए।

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