विष्णु नागर का व्यंग्य: महाराज का मन तो बसता है विदेश में, फिर क्यों रहे देश में, तो निकल लिए एक और देश की सैर पर!

इस बार महाराज ब्राजील के दौरे पर जाएंगे। साढ़े चौदह हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर जाएंगे और इतनी अधिक दूर जाएंगे तो ऐसा तो नहीं होना चाहिए न कि वह वहां से तुरंत दिल्ली लौट आएंं।

फोटो: सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

महाराजा फिर चले,फिर-फिर चले विदेश। अभी,इसी महीने, कुछ ही दिन पहले थाइलैंड से आए थे।तशरीफ़ का टोकरा उन्होंने रखा ही था, बल्कि रखवाया ही था कि उनका जी मचलने लगा। उसे उठाकर फिर से कहीं और ज्यादा दूर,बहुत दूर जाने की वह सोचने लगे। तो फैसला लिया इस बार उन्होंने कि वह जाएंगे... ब्राजील। साढ़े चौदह हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर जाएंगेऔर इतनी अधिक दूर जाएंगे तो ऐसा तो नहीं होना चाहिए न कि वह वहां से तुरंत दिल्ली लौट आएंं।दो -चार और देश निबटाकर आराम से आएं तो हमें भी अच्छा लगेगा और उन्हें भी! हमें यह आशा ही नहीं विश्वास भी है कि महाराजा पहले की तरह इस बार भी इस बारे में तो निराश कतई नहीं करेंगे।वह कर ही नहीं सकते,संस्कारी हैं न ! निराश करेंगे तो हमारा दिल टूट जाएगा।ऐसा लगेगा कि जैसे हमारे साथ धोखा हुआ है, नोटबंदी हुई है। राष्ट्रभक्त हैं न, धोखा- और वह भी विदेश यात्रा के मामले में- वह दे ही नहीं सकते। ये वचन वह चाहें तो मैं भी उनकी तरफ से आपको दे सकता हूं। उनकी इतनी 'कड़ी प्रशंसा' करने का हक तो मैं अभी रखता हूं। हां जब नेशनल रजिस्टर आफ इंडियन सिटीजंस के द्वारा मैं बांग्लादेशी या पाकिस्तानी घोषित कर दिया जाऊंगा, तब की बात और है!

महाराजा जानेवाले हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने भी सोचा कि राष्ट्रहित में अयोध्या का फैसला इनके यहां रहते ही ले आओ। इसके बाद देश में सांप्रदायिकता की आग लगे,तो महाराजा जिम्मेदार मगर इस आग से महाराजा डरे कब हैं,जो अब डरेंगे! इधर उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में 'बुलबुल' तूफान ने भी सोचा कि मैं भी महाराजा की उपस्थिति में ही कहर ढा लूं ,तो अच्छा। तू भी ढाकर देख ले भाई। कहर ही ढायेगा न और क्या करेगा! महाराजा स्वयं भी इस कला में अतिप्रवीण हैं। देश की अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही है, जाए! गर्त में क्या भाड़ में चली जाए मगर महाराजा को फिर -फिर ,फिर -फिर, फिर-फिर विदेश जाना है तो वह जाकर ही रहेंगे।उन्हें वहां स्वागत करवाना है, हाथ मिलाना है, कस कर अपने प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति भाइयों को गले लगाना है। इससे-उससे मिलना है।आप्रवासी भारतीयों को भारतीयों से ज्यादा भारतीय मानना है। महाराजा के 'ज्ञानवर्द्धक' व्याख्यानों पर जोरदार तालियां आजकल प्रवासी भारतीय ही बजाते हैं तो उनसे बजवाकर ही जाना है। महाराजा को वहां जाकर भारत के यानी उनके द्वारा किए गए 'विकास' की जीभरकर गप्पें हांकनी हैंं,रूस और चीन के राष्ट्रपतियों से अपनी गहरी दोस्ती का ढोल बजाना है।और भी पता नहीं क्या- क्या करना है। मन तो उनका फिर से ट्रंंप से मिलकर आने का भी है मगर अभी-अभी तो वहां से आए हैं। फिर जाएंगे तो बचीखुची इज्ज़त का भी कचरा हो जाएगा। दिल मानेगा नहीं मगर दिल को महाराजा मनाएंगे, दिमाग की मजबूरन सुनेंगे। और हां इस बहाने भी कम से कम बाईस करोड़ रुपये उन्हें देश के खर्च करवाने हैंं, विकास का यह महान लक्ष्य उन्हें पूरा करना है, तो करेंगे! संकल्प लिया है तो पूरा करेंगे ही।

जाने दो देशद्रोहियो, उन्हें जहां भी,जब भी जाना हो, जाने दो। बोलो मत, जाने दो। खर्च का क्या है, देश का माल यानी मुफ्त का माल है, जनता का माल है, रिजर्व बैंक का रिजर्व खजाना है, उसे और थोड़ा लुट जाने दो। वैसे यह उनकी 100 वें या 101वें देश की यात्रा होगी, होने दो। उन्हें विदेश यात्राओं के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के रिकॉर्ड तोड़ने हैं, तो तोड़ने दो न! 2000 करोड़ से ज्यादा महाराजा के विदेश यात्रा शौक पर पहले भी खर्च हो चुके हैं तो हुआ करे और हो जाने दो! दस साल में मनमोहन सिंह ने विदेश यात्रा पर जितना खर्च किया था ,उससे दो गुना महाराजा ने पांच साल में खर्च किया है, तो करने दो न बाबा, तुम भी खुशी मनाओ! तुम्हारा पेट दुखता है क्या, तो पेटसफा लो न,रोज तो टीवी पर विज्ञापन आता है! इंदिरा गांधी ने सोलह साल में जितने देशों की यात्राएं कीं, उतनी इन्होंने साढ़े पांच साल से भी कम समय में की हैं, तो करने दो! और भी करेंगे वह, और भी करने दो! तुमको प्राब्लम क्या है? जाने दो न बार- बार अमेरिका, रूस,जापान वगैरह। जाने दो।

आनेवाले सभी प्रधानमंत्रियों के रिकार्ड भी महाराजा तोड़कर ही मानेंगे, तो तोड़ने दो उन्हें। लोगों को उन पर व्यंग्य करने दो, कार्टून बनाने दो मगर उनकी यात्रा के शुभ अवसर पर उन्हें टोको मत, प्लीज़। कहने दो लोगों को कि महाराजा, बीच -बीच में भारत यात्रा पर भी आते हैं, यह अच्छी बात है।लोगों को हंसने, मजाक करने का मौका वह लगातार देते हैं, तो देने दो !लोगों को पूछने दो कि ये हमारे प्रधानमंत्री हैं या विदेश मंत्री? लोग कहें ये यात्राएं,फोटोआप हैं महज, इनमें ज्यादातर होनेवाले समझौते हवाई हैं तो ये भी कहने दो! मजाक का आनंद लोगों को लेने दो, सफर का मजा महाराजा को लेने दो! देश के धन का हवन उन्हें करना है, करने दो। हवन से देश का,दिल्ली का पर्यावरण सुधरता है, तो सुधरने दो।देश का पर्यावरण अब इसी तरह सुधरना है तो इसी तरह सुधरने दो न!कामना करो कि ऐसा दिन भी आए कि वह लंदन में नीरव मोदी के पड़ोस में जाकर बसें। कामना करो कि उन्हें जो आना हो आए,  जो जाना हो, जाए मगर हमें आगेपीछे सद्बुद्धि आ जाए और आ जाए तो फिर कृपा करके जाए नहीं।

और फिर भी अगर 'दिल जलता है तो जलने दो,आंसू न बहा,फरियाद न कर' गाना अच्छा लगता है तो गा लेने दो!

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