उदारवादी बुद्धिजीवियों की सीमित राजनीतिक समझ और लोकतंत्र को तबाह करते मोदी से लड़ते राहुल गांधी

राहुल लगातार बहुसंख्यकवाद को चुनौती देते हैं और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं। त्रासदी यह है कि जो लोग उदारवादी लोकतंत्र की रक्षा का दावा करते हैं, उन्होंने इसके सबसे मुखर रक्षकों में से एक पर ही लगातार हमले किए हैं।

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समकालीन भारतीय राजनीति की चंद सबसे बड़ी विशेषताओं में नरेन्द्र मोदी की सत्ता और हिन्दुत्व परियोजना का सुदृढ़ीकरण ही नहीं है, बल्कि भारत के उदारवादियों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग की वह निरंतर असमर्थता भी है जिसके कारण वे समझ नहीं पा रहे हैं कि कौन लगातार इसके खिलाफ खड़ा रहा है।

भले ही मोदी सरकार ने लगातार लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को कमजोर किया है, बहुसंख्यकवादी राजनीति को सामान्य बना दिया है और भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद को कमजोर किया है, देश के स्वघोषित उदारवादी बुद्धिजीवियों में तमाम लोग इस बदलाव के जिम्मेदारों पर नहीं, बल्कि राहुल गांधी पर निशाना साधे रहते हैं। यह अजीबोगरीब जुनून राहुल गांधी के बारे में कम, और भारत के उदारवादी वर्ग के बौद्धिक और राजनीतिक अंतर्विरोधों के बारे में अधिक बताता है।

एक दशक से अधिक समय से, राहुल गांधी हिन्दुत्व के वैचारिक आधार को चुनौती देने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले बेहद गिने-चुने राष्ट्रीय राजनीतिक नेताओं में से एक रहे हैं। उन्होंने बार-बार संवैधानिक मूल्यों, अल्पसंख्यक अधिकारों, सामाजिक न्याय, जातिगत असमानताओं, संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की बात की है। उन्होंने निरंतर मीडिया खलनायकी, सरकारी उत्पीड़न, कानूनी मुकदमों और व्यक्तिगत हमलों को झेला है। इसके बावजूद बहुलवाद और संवैधानिक लोकतंत्र में निहित राजनीतिक दृष्टिकोण को व्यक्त करना जारी रखा है।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ केवल राजनीतिक अभियान नहीं थे। वे हाल के दशकों में किसी भी भारतीय राजनेता द्वारा नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति का सीधे मुकाबला करते हुए लोकतांत्रिक राजनीति को आम नागरिकों की चिंताओं से फिर से जोड़ने के लगातार किए जाने वाले शायद सबसे बड़े प्रयास थे। फिर भी तमाम उदारवादी और बुद्धिजीवी उन्हें मोदी को हराने में मुख्य बाधा के रूप में चित्रित कर रहे हैं। क्यों? इसका जवाब काफी हद तक इतिहास में छिपा है। 

1970 के दशक से, कांग्रेस-विरोधी होना भारत के बौद्धिक हलकों के एक बड़े हिस्से के भीतर लगभग एक सांस्कृतिक पहचान बन गया है। कांग्रेस का विरोध कभी आपातकाल और केन्द्रीकृत सत्ता के प्रतिरोध से जुड़ा था। समय के साथ, हालांकि, कांग्रेस-विरोध एक राजनीतिक रुख से बदलकर एक बौद्धिक आदत बन गया। कांग्रेस को सभी राजनीतिक समस्याओं की जड़ के रूप में देखा जाने लगा, जबकि हर क्षेत्रीय चुनौती देने वाले को एक संभावित तारणहार के रूप में सराहा गया।

गांधी परिवार के जुड़ाव के कारण यह रवैया और भी अधिक मुखर हो गया। वंशवादी राजनीति का विरोध एक ऐसा सुविधाजनक शॉर्टहैंड बन गया जिसके जरिये कई बुद्धिजीवियों ने राहुल गांधी के राजनीतिक रुख पर गंभीरता से विचार किए बिना उन्हें खारिज कर दिया। विडंबना यह है कि इन्हीं में से कई आलोचकों को पूरे भारत में शक्तिशाली राजनीतिक परिवारों के प्रभुत्व वाली क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। यहां तक कि बीजेपी के भी कई वरिष्ठ नेता राजनीतिक वंशों से आते हैं। वंशवाद को केवल तभी एक अक्षम्य पाप माना गया जब इसमें कांग्रेस शामिल थी। 


सालों तक, उदारवादी टिप्पणीकारों ने उत्साहपूर्वक वैकल्पिक विपक्षी नेताओं को राहुल गांधी से बेहतर विकल्पों के रूप में बढ़ावा दिया। नीतीश कुमार को उनके राजनीतिक अवसरवाद के लंबे रिकॉर्ड और जब भी उनके हितों के अनुकूल हो बीजेपी के साथ गठबंधन करने की उनकी इच्छा के बावजूद, बार-बार मोदी-विरोधी आदर्श नेता के रूप में पेश किया गया। ममता बनर्जी को, धार्मिक बहुसंख्यक समाज की भावनाओं के साथ तालमेल बिठाने की उनकी कोशिशों और एक मजबूत विपक्षी एकता तैयार करने में उनकी अनिच्छा के बावजूद, एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में सिर-माथे रखा। अरविंद केजरीवाल को भारतीय राजनीति के भविष्य के रूप में सराहा गया, भले ही उनका आंदोलन तेजी से चुनिंदा राष्ट्रवाद को अपना रहा था और अक्सर हिन्दुत्व ताकतों के साथ सहयोग करता था।

इनमें से किसी भी नेता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परियोजना के वैचारिक मूल को लगातार चुनौती नहीं दी। किसी ने भी संवैधानिक मूल्यों पर आधारित देशव्यापी लोकतांत्रिक विकल्प बनाने की मांग नहीं की। किसी ने भी देश भर में बहुसंख्यकवाद का सामना करने के लिए निरंतर प्रतिबद्धता नहीं दिखाई। फिर भी कई बुद्धिजीवियों ने राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बताते हुए उन्हें खारिज करने और दूसरों को बढ़ावा देने में भारी ऊर्जा लगाई।

आज का रिकॉर्ड खुद गवाही देता है। वफादारी में बार-बार बदलाव के बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक प्रोजेक्ट को गंभीर झटके लगे हैं और यह भौगोलिक रूप से संकुचित हो गया है। 

जबकि इसी दौरान राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति का निर्विवाद चेहरा बन गए। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 2024 में अपनी संसदीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया, मुख्य विपक्षी दल का दर्जा वापस पाया और खुद को उस केन्द्रीय ध्रुव के रूप में स्थापित किया जिसके इर्द-गिर्द बीजेपी-विरोधी राजनीति तेजी से घूम रही है। फिर भी इस वास्तविकता को स्वीकार करने के बजाय, कई उदारवादी उन पर दोष मढ़ने के कारण ढूंढना जारी रखे हुए हैं। 

इसका कारण भारत के बौद्धिक अभिजात वर्ग के सामाजिक ताने-बाने में भी हो सकता है। एक महत्वपूर्ण हिस्सा विशेषाधिकार प्राप्त उच्च जाति की पृष्ठभूमि से आता है। हालांकि वे अक्सर अमूर्त रूप में उदारवादी मूल्यों का समर्थन करते हैं, लेकिन जब राजनीति प्रक्रियात्मक लोकतंत्र से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक न्याय के सवालों की ओर बढ़ती है, तो वे स्पष्ट रूप से असहज हो जाते हैं।


जाति जनगणना, धन का कुछ हाथों में सिमटना, असमानता, सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण) और प्रतिनिधित्व पर राहुल गांधी का जोर विशेषाधिकारों के स्थापित ढांचों को चुनौती देता है। उनकी राजनीति तेजी से संवैधानिक लोकतंत्र को गहरी सामाजिक परिवर्तन की मांगों के साथ जोड़ रही है। कई संभ्रांत उदारवादियों के लिए, यह एजेंडा संस्थागत सुधार या आर्थिक विकास के बारे में चर्चाओं की तुलना में कहीं कम सुविधाजनक है।

वास्तव में, भारत के उदारवादी तंत्र का एक बड़ा हिस्सा हमेशा से पुनर्वितरण, गरीबी उन्मूलन या संरचनात्मक समानता की तुलना में बाजार-संचालित विकास के प्रति अधिक प्रतिबद्ध रहा है। वे हिन्दुत्व की ज्यादतियों की आसानी से आलोचना करते हैं लेकिन उस राजनीति से असहज रहते हैं जो जाति और वर्ग के मौजूदा पदानुक्रम को बदलना चाहती है। इसलिए सामाजिक न्याय पर राहुल गांधी के हालिया ध्यान ने उनके और उदारवादी बुद्धिजीवियों के कुछ वर्गों के बीच तनाव का एक नया स्रोत पैदा कर दिया है।

दूसरा कारण कई टिप्पणीकारों के बीच चुनावी राजनीति की सीमित समझ है। ज्यादातर बुद्धिजीवियों ने कभी कोई राजनीतिक अभियान आयोजित नहीं किया, पार्टी का ढांचा नहीं बनाया, मतदाताओं को लामबंद नहीं किया या कोई चुनाव नहीं लड़ा। राजनीति की उनकी समझ अक्सर मीडिया नैरेटिव और शहरी बातचीत के माध्यम से आकार लेती है। वे विचारों, संस्थाओं और लोकतांत्रिक मानदंडों पर व्यापक संघर्ष की अनदेखी करते हुए चुनावों को राजनीतिक सफलता के एकमात्र पैमाने के रूप में देखते हैं।

यह संकीर्ण दृष्टिकोण राजनीतिक नेतृत्व का एक विकृत मूल्यांकन पैदा करता है। नेताओं को जन विमर्श को आकार देने, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने या अधिनायकवाद का विरोध करने में उनकी भूमिका के बजाय मुख्य रूप से तत्काल चुनावी परिणामों से आंका जाता है।

अगर केवल चुनावी जीत ही राजनीतिक योग्यता को परिभाषित करती है, तो हारने वाला हर विपक्षी नेता अप्रासंगिक हो जाता है। ऐसा तर्क लोकतंत्र को वोटों की प्रतिस्पर्धा तक सीमित कर देता है और बहुसंख्यकवादी शासन के खतरों की अनदेखी करता है। चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतंत्र चुनावों से कहीं बढ़कर है। इसके लिए संवैधानिक मर्यादाओं, अल्पसंख्यक संरक्षण, संस्थागत स्वतंत्रता और बहुलवाद के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। राहुल गांधी का राजनीतिक महत्व इसी बात में है कि उन्होंने इन सिद्धांतों को छोड़ने से इनकार कर दिया, भले ही ऐसा करने से अल्पकालिक चुनावी लाभ मिल सकता था।

इतिहास अंततः समकालीन टिप्पणीकारों की तुलना में उनके प्रति अधिक दयालु न्याय करेगा। जब अन्य लोग बहुसंख्यकवाद के साथ रणनीतिक समझौतों की तलाश में रहते हैं, तो वह लगातार इसे चुनौती देते हैं। जब अन्य लोग राजनीतिक सुविधा के अनुसार रुख बदलते हैं, तो वह संवैधानिक मूल्यों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता बनाए रखते हैं। जिन्हें कभी मोदी के जवाब के रूप में सराहा गया था, उनमें से कई अब दूर जा चुके हैं, लेकिन राहुल गांधी हार का सामना करते हुए भी इस लड़ाई के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं।

जैसे-जैसे भारत में लोकतांत्रिक असहमति के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है, यह अंतर्विरोध ऐसा हो गया है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है।

(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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