खरी-खरीः गांधी का धर्म एकांगी नहीं, उसमें पूरी मानवता है

गांधी का धर्म न केवल हर धर्म का सम्मान करता है बल्कि सारी मानवता को एक कुटुंब के विभिन्न अंग मानता है। गांधी की धार्मिकता केवल सत्य और नैतिकता पर आधारित है। उनकी राजनीति हिंदुत्व की संकीर्ण राजनीति के समान किसी एक पहचान या एक समुदाय तक सीमित नहीं है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

पूरी दुनिया गांधी मार्ग के जरिए रास्ता तलाश रही है। लेकिन, अपने ही देश में लोकतंत्र पर जिस तरह से खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें महात्मा गांधी के संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। हमने अपने साप्ताहिक समाचार पत्र संडे नवजीवन केे दो अंक गांधी जी पर केंद्रित करने का निर्णय लिया। इसी तरह नवजीवन वेबसाइट भी अगले दो सप्ताह तक गांधी जी के विचारों, उनके काम और गांधी जी के मूल्यों से संबंधित लेखों को प्रस्तुत करेगी। इसी कड़ी में आज पेश है ज़फ़र आग़ा का लेख।

मोहनदास करमचंद गांधी केवल एक महान नेता ही नहीं, अपितु महात्मा और राष्ट्रपिता भी थे। आधुनिक इतिहास में, सारे संसार में कोई एक भी राजनीतिक व्यक्तित्व ऐसा नहीं मिलता जिसको उसके देश की जनता गांधी के समान महात्मा और राष्ट्र निर्णायक दोनों ही मानती हो। हालांकि गांधी बीसवीं शताब्दी के जिस दौर में भारत में सक्रिय थे उसी दौर में संसार में लेनिन, माओ और चर्चिल जैसे कई ऐसे नेता मौजूद थे, जिन्होंने अपने-अपने देशों में न केवल इतिहास रचा, बल्कि अपनी जनता का भविष्य संवार दिया। परंतु वह चाहे लेनिन हों या माओ हों या फिर चर्चिल हों, सभी अब इतिहास की पुस्तकों तक सीमित हैं। गांधी केवल अकेले एक ऐसे नेता हैं जो आज भी महात्मा और राष्ट्रपिता हैं।

आखिर गांधी में ऐसी कौन सी अद्भुत बात थी कि वह आज भी इतनी ऊंचाई पर विराजमान हैं। मेरी छोटी सी समझ और अध्ययन से मुझको यह प्रतीत होता है कि गांधीजी में दो ऐसी अनूठी बातें थीं जो न केवल उनके दौर में उनको दूसरों से अलग करती थीं, बल्कि आज भी उनको केवल भारत ही नहीं सारे संसार के लिए प्रासंगिक बनाती हैं।

आखिर वह क्या अनोखी बात थी जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा और राष्ट्रपिता बना दिया। सबसे पहली गांधी को दुनिया के दूसरे तमाम आधुनिक महान नेताओं से अलग रखने वाली बात जो उनमें थी वह यह थी कि गांधी केवल एक अकेले महान नेता हैं जिन्होंने 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में धर्म को राजनीति से जोड़ दिया था। मैं ‘संडे नवजीवन’ में पहले भी लिख चुका हूं कि 20वीं शताब्दी के पहले पचास वर्षों का इतिहास एक ऐसा दौर था जिसमें संसार के लगभग सारे महान नेताओं ने धर्म को राजनीति की परिधि से संपूर्णतयः बाहर ही नहीं कर दिया था, बल्कि धर्म को जनता का दुश्मन भी निर्धारित कर दिया था। यूरोप की संपूर्ण औद्योगिक क्रांति की राजनीति चर्च अर्थात् धर्म के खिलाफ एक विद्रोह थी। सामंतवाद और धर्म के खिलाफ जो यूरोपीय राजनीति उपजी और उससे जो पूंजीवादी राजनीति जन्मी उसमें धर्म को जनता का शत्रु माना गया। इसको आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया गया।

थोड़े समय बाद ही पूंजीवाद के खिलाफ यूरोप में ही जो दूसरी विचारधारा उपजी वह मार्क्सवाद अर्थात वामपंथ की विचारधारा थी। इस विचारधारा के दो ही मुख्य छोर थे, एक पूंजीवाद का विरोध और दूसरा, धर्म का हर स्तर पर विरोध। यह एक सत्य है कि मार्क्सवाद लगभग पूरी 20वीं शताब्दी में सारे संसार पर किसी न किसी प्रकार से छाया रहा और उसने लेनिन तथा माओ जैसे नेता पैदा किए, जिन्होंने पूरे मानव इतिहास को प्रभावित किया। परंतु मार्क्सवाद धर्म को जनता के लिए ‘अफीम’ के समान हानिकारक मानता है। अर्थात् 20वीं शताब्दी के लगभग पहले पांच दशकों की राजनीति में धर्म के विरोध का डंका बज रहा था।


भला एक ऐसे दौर में एक मामूली धोती पहने नंगे बदन घुमने वाला ‘नेकेड फकीर’ (चर्चिल ने गांधी को यही नाम दिया था) थोड़े ही समय में भारतीय उपमहाद्वीप की जनता के मन और मस्तिष्क पर अपनी राजनीति का आधार धार्मिक मूल्यों को बनाकर कैसे छा गया। उसके पास न मार्क्सवाद का पैगाम था, न ही वह कोई बड़ी आधुनिक बातें करता था। वह तो केवल धर्म, सत्य और अहिंसा जैसे शब्दों की माला जपता था, जो कि उसके समय की मुख्य राजनीतिक धारा से बिल्कुल विपरित थे।

फिर भी पहले भारत की अपार जनता और बाद में ब्रिटिश साम्राज्य ने भी उस ‘नेकेड फकीर’ को महात्मा मान लिया। आखिर क्यों! गांधी का कमाल यह था कि अंततः उनके सत्याग्रह के आगे सब हथियार डाल देते थे, क्योंकि उनका सत्याग्रह केवल और केवल नैतिकता पर आधारित होता था। बड़ी अजीब बात है कि पहले भी और आज भी धर्म सामान्यतः दो सामाजिक समूहों के बीच जंगों के लिए और इन दिनों बांटो तथा राज करो जैसी रणनीति के साथ वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। परंतु गांधी का अनूठा धर्म सबको अहिंसा और समर्पण पर मजबूर कर देता था।

कदापि इतिहास में धर्म के नाम पर जितना खून-खराबा हुआ और आज भी हो रहा है, वैसी मारकाट किसी और आड़ में पूरे इतिहास में नहीं दिखाई पड़ती है। आज भी सारी दुनिया में आइडेंटिटी पॉलिटिक्स का डंका बज रहा है। डोनाल्ड ट्रंप जैसे सुपर प्रेसिडेंट दुनिया पर छाए हुए हैं। स्वयं भारत में हिंदुत्व के नाम पर नरेंद्र मोदी खुली हिंदुत्ववादी राजनीति का इस्तेमाल करके दूसरे धर्मों का अपमान और उनके मानने वालों को दूसरे दर्जे का शहरी बनाने में जुटे हैं। इसके विपरित गांधी का धर्म एक क्रांतिकारी रणनीति और राजनीतिक हथियार बन जाता था। जिसका इस्तेमाल गांधी केवल सत्य के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करते थे। इसका क्या कारण है कि संघ का हिंदुत्व मॉब लिंचिंग को जन्म देता है और गुजरात जैसे दंगों को जन्मता है, जबकि गांधी का हिंदू धर्म और उपवास नोआखली एवं बंगाल तथा सारे भारत में फैली सांप्रदायिक अराजकता को ठंडा कर देता है।

आखिर क्यों! इसका सीधा कारण यह है कि हिंदुत्व इस विचार पर आधारित है कि आर्य वंशज ही दुनिया के सबसे उत्तम मानव हैं और दूसरे सभी धर्म तथा दूसरी संपूर्ण मानवता ही दूसरे श्रेणी की है। जबकि गांधी का धर्म न केवल हर धर्म का सम्मान करता है बल्कि सारी मानवता को एक कुटुंब के विभिन्न अंग मानता है। गांधी के यहां धर्म मात्र पहचान नहीं है। क्योंकि यदि धर्म केवल पहचान तक सिमट जाए, तो वह एक भीड़ बन जाती है और फिर वह भीड़ अपने से भिन्न पहचान वाले मानव के खिलाफ दंगाई बन जाती है। हिंदुत्व में धर्म केवल एक पहचान है, जो स्वभाविक रूप से अपने से भिन्न पहचान वालों के प्रति मॉब लिंचिंग को जन्मती है। गांधी का धर्म सत्य और मानव प्रेम है तथा गांधी इसका इस्तेमाल राजनीति के लिए करते हैं और अंततः सफल होते हैं।


गांधी का धर्म पहचान के आवरण से लिप्त नहीं है। गांधी की धार्मिकता केवल सत्य और नैतिकता पर आधारित है। धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं या कावड़ियों की भीड़ नहीं अपितु धर्म तमाम आध्यात्मिकता का निचोड़ है। इस धार्मिक पद्धति में संपूर्ण मानव का सम्मान और उसकी बराबरी मौलिक सिद्धांत बन जाता है, जिसमें किसी प्रकार की घृणात्मक राजनीति की कोई गुंजाइश मुमकिन ही नहीं है। इस प्रकार ‘सर्वधर्मः कुटुम्बकम्’ की परिधि में जीने वाला व्यक्ति सत्य और अहिंसा की डोर से इस प्रकार जकड़ जाता है कि तमाम शक्ति के सामने भी अंतिम विजय उसी निःस्वार्थ व्यक्ति की होती है, क्योंकि वह केवल नैतिक मूल्यों पर अडिग है जो संसार की सबसे मूल्यवान और शक्तिशाली चीज है।

बस यही नैतिकता की राजनीति है जो गांधी का दूसरा बड़ा जौहर है, जो उनको महात्मा बना देती है। क्योंकि उनकी राजनीति हिंदुत्व की संकीर्ण राजनीति के समान किसी एक पहचान अथवा एक समुदाय तक सीमित नहीं है। गांधी की राजनीति तो संपूर्ण मानवता को अपने दामन में समेट लेती है। तब ही तो वह नोआखली के दंगों में मारे जाने वाले हिंदू हों अथवा दिल्ली में बंटवारे के जुनून का शिकार मुसलमान हों, गांधी निहत्थे तथा बेकसूर मारे जाने वालों के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर उपवास करते हैं और सांप्रदायिक अराजकता को अपने निहत्थे अहिंसा के हथियार से मार गिराते हैं और अंततः सत्य स्थापित करते हैं। बस यही बात मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना देती है, जो संसार के किसी आधुनिक नेता में नहीं नजर आती है।

परंतु इस लेख में एक बात पर तो चर्चा नहीं हो सकी और वह यह कि वह क्या बात थी जिसने गांधी को राष्ट्रपिता भी बना दिया। गांधी ने केवल स्वतंत्रता की लड़ाई ही नहीं लड़ी थी अपितु ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ जंग के समय भारत के सामने यह भी प्रश्न था कि अंग्रेजों के जाने के पश्चात भारतीय राजनीति ही नहीं बल्कि भारतीय समाज का क्या स्वरूप होगा। उसमें भाषा, धर्म, जाति, शिक्षा, उद्योग, आपसी रिश्ते, विभिन्न धर्मों एवं धार्मिक समूहों के आपसी संबंध, स्त्री अधिकार जैसे मुद्दे शामिल थे। गांधी ने न केवल इन तमाम मुद्दों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी बल्कि आज भी गांधी की विचारधारा भारतीय समाज के हर सामाजिक क्षेत्र पर अपना गहरा असर रखती है। इस परिप्रेक्ष्य में गांधी एक सामाजिक क्रांति के भी नेता थे जिन्होंने भारतीय समाज के नवनिर्माण में एक अमिट योगदान छोड़ा जो उनको राष्ट्रपिता का रूप देता है।

परंतु गांधी की 150वीं जयंती पर गांधी की सत्य और अहिंसा की राजनीति तथा उनकी राजनीतिक क्रांति को जितना बड़ा खतरा है ऐसा खतरा गांधी एवं गांधीवाद को कभी नहीं था। आज गांधी के ही देश में हिंदुत्व का डंका बज रहा है, जो गांधी की मानव प्रेम की राजनीति के खिलाफ न केवल एक समुदाय के हित में विश्वास रखता है बल्कि दूसरे हर समुदाय के विनाश की राजनीति करता है। यह गांधी और गांधीवाद के लिए एक कलंक हैं।

इसी प्रकार हिंदुत्व गांधी की समन्वय की सामाजिक क्रांति को छिन्न-भिन्न कर केवल एक देश, एक विधान, एक भाषा और एक धर्म पर आधारित समाज निर्माण की ओर अग्रसर है। इन परिस्थितियों में यदि हम दूसरा गांधी नहीं ढूंढ़ सकते हैं, तो निःसंदेह गांधीवादी राजनीति को पुनर्जीवित करके इस खतरे से निपट सकते हैं। केवल इसी में गांधी और भारत दोनों का ही हित है।

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