विष्णु नागर का व्यंग्यः बड़े भोले हैं ‘साहब’, पता ही नहीं कि वे अपनी ही सत्ता की कब्र खोद रहे हैं!

यह भारत है और इसमें कुछ भी हो सकता है। बलात्कारी बच सकता है, बलात्कृता जेल भेजी जा सकती है। तड़ीपार गृहमंत्री बन सकता है। सरकारी छत्रछाया में लिंचिंग हो सकती है और लिंचिंग करनेवालोंं का माला पहनाकर स्वागत करने दिल्ली से मंत्री दौड़ा-दौड़ा झारखंड जा सकता है।

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

कुछ अपनी कब्र खोदने के एक्सपर्ट होते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं कि उनके लिए यह काम कोई और करे। इस मामले में वे किसी के मोहताज नहीं। किसी और को कष्ट देना वे पाप समझते हैं। इनमें से कई इतने भोले होते हैं कि यह नहीं जानते कि जिसे खोद रहे हैं, वह कब्र है और उनकी अपनी कब्र है। कुछ का भोलापन बेहिसाब होता है। वे यह भी नहीं जानते कि कब्र दफ्न होने या किसी को दफनाने के काम आती है और इसे खोदने वाले खुद भी इसमें दफ्न हो सकते हैं, जबकि दूसरा बच सकता है।

कुछ इतने भोले होते हैं कि उन्हें यह भी पता नहीं होता कि यह जो काम वह कर रहे हैं, उसे खोदना कहते हैं। और जीते जी किसी को खोदने का शौक हो तो भी कम से कम अपनी कब्र खुद खोदने का शौक तो नहीं होना चाहिए और दूसरे उनके लिए कब्र खोद रहे हों तो उन्हें यथासंभव ऐसा करने से रोकना चाहिए। इसके अलावा दुनिया पर इतना भरोसा भी करना चाहिए कि वह कुछ और नहीं तो कम से कम उन्हें दफ्न तो कर ही देगी या अग्नि को समर्पित कर देगी।

कुछ और अधिक भोले और अधिक अच्छे होते हैं। वे जानते हैं कि मरना तो एक दिन उनके दुश्मन को भी है तो क्यों न उसका भला करने के लिए उसकी कब्र अभी से खोद जाएं, ताकि उनकी अपनी इमेज एक परोपकारी की बनी रहे। अपने दुश्मन का भला सोचने का ऐसा जज्बा अभी भी लोगों में पाया जाता है, यह देखकर, यह सोचकर चूंकि आंसू तो आंख से ही आ सकते हैं तो उसमें आंसू आ जाते हैं। कोई पूछता है क्यों भाई आपकी आंखों में आंसू क्यों? तो मैं कहता हूं कि डोंट वरी, ये खुशी के आंसू हैं।

अब ये अलग बात है कि ये दूसरों का हित करने चलते हैं और उनका 'हित' हो जाता है, यानी कब्र दूसरों के लिए खोदने चलते हैं, दफ्न उन्हें हो जाना पड़ता है! चलते हैं परोपकार करने मगर स्वयं का 'उपकार' हो जाता है। दुनिया समझती है कि ये आदमी ढोंगी था। मोदीजी की भी यही ट्रेजडी है ।मुझे कभी-कभी उन पर दया आती है। आप इसका बुरा मत मानना! वजह यह है कि वे बेचारे नोटबंदी से दूसरों की कब्र खोदने चले थे, मगर उन्होंने अर्थव्यवस्था की परमानेंट कब्र खोदकर साथ में अपनी सत्ता की कब्र भी खोद ली, अपना इंतजाम खुद ही कर लिया। फिर जीएसटी में यही किया, फिर कश्मीर में भी यही किया, जिसके परिणाम आने लगे हैं। फिर भी दिल नहीं माना तो नागरिकता संशोधन विधेयक ले आए। फिर... इस फिर का कोई अंत नहीं है।

मतलब, अपनी पार्टी की कब्र खोदे बिना इन्हें चैन नहीं मिलेगा, मन की बात नहीं हो पाएगी। सबक सिखाकर ही रहेंगे मतदाताओं को कि और बनाओ, बनाते जाओ मुझे प्रधानमंत्री, तुम्हारी टें न बुला दी तो मेरा नाम नरेन्द्र दामोदर दास मोदी नहीं। क्या करें, सबकी अपनी-अपनी च्वाइस है, रणनीति है। उनका यही चाल, यही चरित्र, यही चेहरा है। उनकी इस मजबूरी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की जरूरत है।

दरअसल यह भारत है और इसमें क्या कुछ भी हो सकता है। इसमें गरीबी हट सकती है, अच्छे दिन आ सकते हैं, भारत जगद्गुरु बन सकता है, गाय ऑक्सीजन लेकर ऑक्सीजन ही वातावरण में छोड़ सकती है, बलात्कारी बच सकता है, बलात्कृता जेल भेजी जा सकती है। तड़ीपार गृहमंत्री बन सकता है। सरकारी छत्रछाया में लिंचिंग हो सकती है और लिंचिंग करनेवालोंं का माला पहनाकर स्वागत करने दिल्ली से मंत्री दौड़ा-दौड़ा झारखंड जा सकता है, जैसे वह कृष्ण हो और द्रौपदी की लाज बचाने गया हो। घर में कुत्ता सिर्फ विदेशी पल सकता है मगर उनकी मां देसी नस्ल की गाय ही हो सकती है। विदेशी गाय तो उनकी मौसी होने की पात्रता भी नहीं रखती।

बीजेपी की बनते-बनते सरकार शिवसेना की बन सकती है। आर्थिक मंदी आती है तो सरकार टकटकी बांधकर उसे ऐसे देखने लगती है, जैसे वह कोई परम सुंदरी हो और इनसे 'आई लव यू' कहने आई हो। सरकार पलक-पावड़े बिछाकर, रेड कारपेट बिछाकर उसका स्वागत करने लग जाती है। राममंदिर का फैसला पक्ष में आ जाए तो सरकार, बीजेपी, संघ सब अचानक धर्मनिरपेक्षता के कलियुगी अवतार बन जाते हैं और अगले ही क्षण पूरे देश में नागरिकता का रजिस्टर बनाने दौड़ पड़ते हैं, ताकि हिंदू-मुसलमान बार-बार होता रहे, लोग पगलाते रहें, मारकाट मचाते रहें और सरकार इसे आबादी घटाने की अपनी रणनीतिक सफलता पर मुग्ध होती रहे।

इस बहाने इनकी हिंदू वोट की फसल लहलहाती रहे और इन्हें उसे काटकर मुनाफे में बेचने का मौका विपक्ष के भरपूर सहयोग से मिलता रहे! वोट की तगड़ी कमाई हो जाए, एक बार फिर जय श्रीराम हो जाए, मोदी है तो मुमकिन हो जाए और यह देश जल्दी से जल्दी भाड़ में चला जाए और ये देश से फुर्सत पाकर अमेरिका में मौज मनाएं। वहां अबकी बार ट्रंप सरकार फिर बोल आएं और ट्रंप के खिलाफ महाभियोग सफल हो जाए तो उसे भूलकर जिसकी बांह पकड़ सकें, उसकी पकड़कर वैतरणी पार हो जाएं।

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